कभी कोई सत्य कल्पना से अधिक मोहक व अविश्वसनीय सरीखा होता है। बात थोड़ी अजीब है, इससे कहते सुनते संकोच होता है। एक बार गुरुजी कह रहे थे, वेद अपौरुषेय हैं, ऋषि मंत्र दृष्टा हैं उनके सृष्टा नहीं। उन्होंने मंत्रों का दर्शन किया अपने मन में और फिर उन्हें संजो लिया सभी के कल्याण के लिए।
भला ऐसा ही हुआ है कभी, एक मन ने अविश्वासपूर्वक कहा। मन की भाषा पढ़ने में कुशल गुरुदेव बोले, मेरी बात पर विश्वास नहीं होता तुम्हें। भला कैसे करोगे विश्वास। मन तो और अधिक चंचल हो उठा बोला, यदि मुझे भी कुछ दिखाओ तो जानूं फिर मानूं। नहीं तो कल्पना व गल्प साहित्य साथ-साथ चलते हैं।
वे थोड़े क्षुब्ध हुए, बोले-श्रद्धा से ज्ञान की प्राप्त होती है व संशय करने वाला, सदेह करने वाला, नाश को प्राप्त होता है। दुष्ट मन बोला, महाराज ! विज्ञान के इस युग में तर्क की कसौटी पर परखने से रोकना अन्याय व अत्याचार कराएगा। अंधी श्रद्धा से कोई कितनी दूर जा पाएगा।
उसके बाद जो हुआ वह आपके सम्मुख है। अविश्वासी मन में विश्वास की ज्योति जगाने के लिए लीला दर्शन कराया। यह लीला उसकी है जो सब कहीं विविध नाम रूप घर लीला किया करता है। यह मानस लीला है सो इसमें काल क्रम उलट-पुलट हुआ है। लीला रसिक जानते हैं, कि भावों को भाषा देना सहज नहीं होता। बहुधा भाषा व शब्द बौने पड़ जाते हैं, भावों को बतलाते हुए। इस मनमोहन की कथा इतनी रसीली है कि अन्य सभी रस फीके पड़ जाते हैं। इस कथा पर सभी मनुष्यों का बल्कि जीव मात्र का समान रूप से अधिकार है। इसके किसी भी अंश या समूची लीलाओं के प्रकाशन व अनुवाद का अधिकार भी सभी का है-ऐसा मेरा विश्वास है। मैंने कुछ नहीं लिखा, जो कुछ दीख पड़ा, गुरु कृपा से उसी को शब्दों के वस्त्र पहनाने का प्रयत्न जरूर किया है-मेरा इतना ही दोष है। कहीं अर्थ का अनर्थ भी हुआ ही होगा-उसके लिए क्षमा चाहूंगा।
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