भूमिका
1. संस्कृत में ऐतिहासिक रचनाओं के लेखन की परम्परा
संस्कृत साहित्य केवल अपनी प्राचीनता के लिये ही विख्यात नहीं अपितु यह विश्व साहित्य की सर्वविध नवीनतम विधाओं से भी समन्वित है। पश्चिमी विद्वानों की चाहे यह धारणा रही हो कि संस्कृत के साहित्यकार ऐतिहासिक रचनाओं को लिखने के प्रति उदासीन दिखाई देते हैं; किन्तु इसके विपरीत पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि विश्व साहित्य का ऐसा कोई भी अङ्ग-उपाङ्ग अथवा विधा दिखाई नहीं देती जिसकी सृष्टि संस्कृत साहित्य में सम्पन्न न हुई हो। ईसा पूर्व वैदिक समय से आधुनिक समय तक संस्कृत में विरचित ऐतिहासिक रचनाओं पर दृष्टिपात करें तो पाश्चात्य जगत् के विद्वानों की कपोल-कल्पित धारणा स्वतः ही निरस्त हो जायेगी। यहां यह अङ्कित करना नितान्त समुचित प्रतीत होता है कि संस्कृत में रचित ऐतिहासिक कृतियां विविध वर्णनों के साथ-साथ तत्तत् घटनाओं को यथाक्रम एवं यथावत् प्रस्तुत करने में पूर्णतया सक्षम प्रतीत होती हैं। अपने प्रस्तुत कथन की पुष्टि के लिये कुछ एक रचनाओं का उल्लेख समय-क्रम से निम्नतया किया जा रहा है
'ऋग्वेद' एवं 'वैदिक साहित्य' कर्त्ता एवं समय अनिश्चित। संस्कृत साहित्य के इतिहासकारों के अनुसार 'ऋग्वेद' आदि में कम से कम दस हजार वर्ष ईसा पूर्व भारतीय ऋषियों के वंशानुक्रम आदि का सुनिश्चित ज्ञान उपलब्ध है।
'निरुक्त' आचार्य यास्क समय 7 वीं शताब्दी ईसा पूर्व। इस ग्रन्थ से ज्ञात होता है कि विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ 'ऋग्वेद' के व्याख्याकारों में इतिहासकारों का भी एक विशेष सम्प्रदाय उस समय विद्यमान था।
'वाल्मीकि रामायण' रचयिता महर्षि वाल्मीकि। समय छठी शताब्दी ईसा पूर्व। संस्कृत के आदि कवि वाल्मीकि का रामचरित्र-वर्णन चाहे आधुनिक ऐतिहासिक शैली के अनुरूप न हो; किन्तु सूर्यवंशी राजा दशरथ-पुत्र श्रीराम के जन्म से अन्त तक का पूरा चरित्र इसमें वर्णित है।
'अर्थशास्त्र' रचयिता आचार्य कौटिल्य। समय चौथी शताब्दी ईसा पूर्व। इसमें रचयिता ने इतिहास-लेखन की आवश्यकता पर बल दिया है।
समय 'महाभारत' रचयिता महर्षिवेदव्यास। अनिश्चित। कौरव-पाण्डवों के वंशानुक्रम का आदि से अन्त तक के घटनाक्रम का विवरण उपलब्ध है।
'बुद्धचरित' लेखक महाकवि अश्वघोष। समय प्रथम शताब्दी ईस्वी। शाक्यवंशी महात्मा बुद्ध का जीवन-चरित। एवमेव अन्यान्य बौद्ध एवं जैन ग्रन्थ।
2. कवि श्रीकृष्णकौरमिश्र का समय
विशेषतया संस्कृत साहित्य के रचनाकारों की सुदीर्घकालीन परम्परा में आत्म-परिचय (समय, जन्मस्थान, माता-पिता का नाम, पारिवारिक स्थिति आदि) से सम्बद्ध सामग्री का अपनी कृति में उल्लेख न करने की प्रवृत्ति प्रचलित रही है। सम्भवतः कवियों के अन्तःकरण में 'अहम्भाव' का प्रदर्शन न करने अथवा उक्त सामग्री को दोने के प्रति उदासीनता ही कारण हो सकती है! परन्तु प्रत्येक कवि द्वारा अपनी रचना की निर्विघ्न समाप्ति के लिये सर्वप्रथम (कृति के आदि-अन्त में) 'मङ्गलाचरण' के रूप में किसी न किसी अपने अभीष्ट देवी-देवता को श्रद्धासहित 'नमन' किया गया अवश्य प्राप्त होता है। संस्कृत साहित्य की कुछ कृतियों में कवियों द्वारा अपने आश्रयदाता (किसी राजा आदि) का अथवा उस रचना में उपलब्ध सामाजिक स्थिति एवं अन्यान्य उल्लिखित सामग्री (अन्तःसाक्ष्यों) के आधार पर ही कृतिकार के समय तथा जीवनवृत्त का निर्धारण करना पड़ता है। संस्कृत साहित्य के किसी-किसी रचनाकार के समय आदि के विषय में तो केवल बहि: साक्ष्यों (परवर्ती रचनाओं में प्राप्त उद्धरणों अथवा उल्लेखों आदि) के आधार पर ही तत्तत् कवि के समय आदि को सुनिश्चित किया जाता है।
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