पुस्तक परिचय
गणतांत्रिक मिथिला में सामाजिक-आर्थिक परिवर्त्तन, प्राचीन मिथिला में नगरीकरण, गणतांत्रिक राज्य व्यवस्था और बौद्ध धर्म के प्रसार के सामाजिक-आर्थिक आधारों का गहन ऐतिहासिक विश्लेषण है। यह गौरतलब है कि प्रसिद्ध उत्तर वैदिक विदेह राज्य (मिथिला) में लोहे के बढ़ते व्यापक चलन ने जहाँ कृषि-कर्म को उत्तेजना प्रदान, की, वहीं कृषि अधिशेष ने शिल्प, उद्योग एवं व्यापार-वाणिज्य के असाधारण विकास का मार्ग प्रशस्त किया। परिणामस्वरूप छठी सदी ई० पू० में एक विशाल कृषक समाज, निपुण शिल्पी समुदाय, समृद्ध व्यापारी गहपति वर्ग और लोहे के मजबूत हथियारों से लैस स्थानीय क्षत्रिय कुलकों के रूप में नवीन सामाजिक-आर्थिक वर्गों का प्रादुर्भाव हुआ। मिथिला के विदेह राजतंत्र के गणतांत्रीकरण, बौद्ध धर्म के तीव्र विस्तारण और बड़े पैमाने पर होनेवाले नगरीकरण ने मगध साम्राज्य द्वारा अन्तर्लीनीकरण के पूर्व आगामी दो सदियों तक मिथिला के इतिहास को एक नई दिशा, एक नया अध्याय प्रदान किया। प्रस्तुत पुस्तक ई० पू० छठी सदी से चौथी सदी ई० पू० के मध्य मिथिला में परिघटित सामाजिक-आर्थिक परिवत्तनों के परिप्रेक्ष्य में मिथिला की भौतिक संस्कृति का समग्र अध्ययन है। यह पुस्तक गणतंत्रकालीन मिथिला के इतिहास की भौतिकवादी वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करती है, जो इतिहास के शिक्षकों, अध्येताओं और छात्रों के साथ-साथ इतिहास में रुचि रखनेवाले, सामान्य पाठकों के लिए भी पठनीय एवं उपयोगी है।
लेखक परिचय
डॉ० अमर नाथ ठाकर (जन्म 1964) सम्प्रति ए० एच० एस० ए० कॉलेज, मधुबनी में प्राचीन भारतीय इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ० अमर नाथ ठाकुर ने इतिहास के अतिरिक्त प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति और नाटक विषय में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की है। इन्हे विधि, शिक्षा तथा पुस्तकालय विज्ञान जैसे विषयों में भी स्नातक की डिग्री हासिल है। इनके अनेक आलेख राष्ट्रीय और क्षेत्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। ये विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् जैसी देश की शीर्षस्थ संस्थाओं द्वारा सम्पोषित अनेक राष्ट्रीय और क्षेत्री सेमिनारों के आयोजनकर्ता भी हैं। मिथिला लोक मंच, मिथिला यूनेस्को एसोसिएसन और पाथ-मिथिलांचल जैसी स्वयंसेवी संस्थाओं से गहरे तौर पर जुड़े डॉ० ठाकुर की सक्रिय सामाजिक कार्यकर्त्ता के रूप में एक खास छवि है। किन्तु इससे कहीं अधिक इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस और मिथिला इतिहास संस्थान से अपनी सृजनात्मक सम्बद्धता के कारण राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर इतिहास अध्ययन की मुख्य धारा के एक गम्भीर अध्येता के रूप में डॉ० ठाकुर ने एक निश्चित पहचान बनायी है।
आभार
वर्तमान उत्तर बिहार के मिथिला परिक्षेय का आर्य उपनिवेशन प्रायः ४वीं 7वीं सदियों के दौरान हुआ और जनक राजवंश के अधीन यहाँ वर्णाश्रम धर्म पर आधारित एक समृद्ध संस्कृति का उन्नयन हुआ। मध्य गंगाघाटी में छठी सदी ई०पू० में कृषि, शिल्प, उद्योग और व्यापार वाणिज्य के असाधारण विकास के परिणामस्वरूप मिथिला के सामाजिक-आर्थिक जीवन में आये भारी बदलाव ने बौद्ध धर्म और गणतांत्रिक राज्य व्यवस्था के विकास का पथ प्रशस्त किया। हालांकि चौथी सदी ई०पू० में मगध साम्राज्यवाद के प्रबल प्रहारों से मिथिला में गणतांत्रिक शासन प्रणाली का अवसान हो गया और अगामी डेढ़ हजार वर्षों तक मिथिला का कोई राजनीतिक अस्तित्व नहीं रहा, परन्तु एक राजनीतिक इकाई न रहने के बावजूद यदि मिथिला की सांस्कृतिक अस्मिता सदैव बनी रही तो मिथिला संस्कृति के अन्य पहलुओं के अतिरिक्त गणतंत्र का इसकी पहचान से अभिन्न ऐहितासिक जुड़ाव एक प्रमुख कारक था। जाहिर है कि मिथिला के इतिहास में गणतांत्रिक युग का विशेष महत्व है, जिसके सामाजिक-आर्थिक आयामों की खोज इस पुस्तक में की गई है। यह पुस्तक ल० ना० मिथिला विश्वविद्यालय के इतिहास विषय में पी-एच० डी० उपाधि के लिए तैयार शोध-प्रबन्ध का प्रकाशित रूप है। जिसके प्रणयन में अनेक संस्थाओं, गुरुजनों, मित्रों और परिजनों का सहयोग, मार्गदर्शन, सुझाव और स्नेह प्राप्त हुआ, जिनके प्रति हृदय से आभारी हूँ। पुस्तक सामग्री के संकलन में दरभंगा स्थित ल० ना० मिथिला विश्वविद्यालय और कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के केन्द्रीय पुस्तकालयों तथा सी० एम० कालेज पुस्तकालय से भरपूर मदद मिली।
प्रस्तावना
एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में आद्यैतिहासिक युग से ही मिथिला का एक विशिष्ट सांस्कृतिक परिचय रहा है और अध्ययन, चिन्तन, साहित्य और दर्शन के क्षेत्र में अपनी महान् सर्जनात्मक उपलब्धियों से इसने भारत के संश्लेषणात्मक संस्कृति के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आयर्यों की विदेह शाखा ने मिथिला भूमि में एक ऐसी विकासोन्मुख संस्कृति का शिलान्यास किया,' जिसने शीघ्र ही सम्पूर्ण आर्यावर्त में अपनी एक निश्चित पहचान बना ली। महान् जनकों के नेतृत्व में यह उपनिषदों की रचना भूमि बनी। जीवन, आत्मा एवं परमात्मा के परम सत्य की यहाँ तलाश प्रारंभ हुई और वेदांत के बीज तत्व के रूप में ब्रह्म विद्या पल्लवित तथा पुष्पित हुई, जिसने आर्य संस्कृति के बौद्धिक क्षितिज को विस्तृत किया । याज्ञवल्क्य ने यजुर्वेद की शुक्ल शाखा का प्रणयन किया और स्मृति की रचना कर अध्यात्मिक एवं लौकिक विधि को ऐसा शास्त्रीय रूप प्रदान किया जो कालांतर में ज्ञान की एक विशिष्ट शाखा के रूप में विकसित हुआ। स्मृति की इस याज्ञवल्क्य शाखा को पूर्व मध्यकाल में लक्ष्मीधर श्रीकर, हलायुध, भवदेव, श्रीधर, अनिरूद्ध, चण्डेश्वर आदि अनेक विद्वानों ने संवर्द्धित परिवर्द्धित किया। प्राचीन काल में मिथिला में गौतम ने जिस न्याय दर्शन का परिष्कार किया, उसे पूर्व मध्य युग में गंगेश उपाध्याय ने एक नवीन पद्धति प्रदान की। न्याय और मीमांसा के क्षेत्र में उद्योतकर, मंडन, प्रभाकर, पक्षधर, उदयन, वाचस्पति, मुरारी, शंकर आदि असंख्य विद्वानों ने अपने असाधारण पांडित्य से संपूर्ण उत्तर भारत में मिथिला को एक प्रमुख शिक्षा केन्द्र के रूप में प्रतिष्ठित किया ।
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