विश्व के विकास क्रम में जीव की उत्पत्ति हुई और जैविक विकास क्रम में मनुष्य की उत्पत्ति हुई। मनुष्य बौद्धिक प्राणी होने के कारण उचित अनुचित, शुभ-अशुभ, अच्छाई बुराई आदि समस्याओं का गहन और विस्तृत विवेचन करने लगा और इस विवेचन से एक शास्त्र का आर्विभाव हुआ जिसका नाम नीतिशास्त्र पड़ा। नीतिशास्त्र सिर्फ शुद्ध सैद्धांतिक शास्त्र नहीं बल्कि प्रयोगात्मक शास्त्र है और अपने प्रयोगात्मक स्वरूप के कारण चिकित्सा पद्धति के व्यवहार और शोध में जो प्रगति हुई, उससे जो नैतिक विवाद या नैतिक प्रश्न सामने आए हैं, यह उनका भी अध्ययन करता है। इस प्रकार प्रयोगात्मक नीतिशास्त्र की एक शाखा के रूप में मेडिकल एथिक्स का आर्विभाव हुआ। वर्तमान समाज में मेडिकल एथिक्स से संबंधित अनेक समस्याएँ हैं, इन्हीं समस्याओं में से एक समस्या हमारे वर्तमान समाज में सरोगेसी के प्रयोग से उत्पन्न नैतिक प्रश्नों का है, जिन पर मैंने अपनी पुस्तक के द्वारा प्रकाश डालने का प्रयास किया है। मैंने अपने पुस्तक में यह बतलाने का प्रयास किया है कि 'सरोगेसी' चिकित्सा विज्ञान की एक अद्भुत देन है मानव जीवन को, परन्तु इसके बावजूद अगर यह कुछ लोगों के लिए वरदान है तो समाज के कुछ दूसरे वर्ग के लोगों के लिए यह अभिशाप बनता जा रहा है। सरोगेसी के प्रयोग से हमारे समाज में किस प्रकार की नैतिक समस्याओं का जन्म हो रहा है और इनके कारण हमारी भारतीय संस्कृति और परम्पराओं पर इसका कितना बुरा प्रभाव पड़ रहा है। सरोगेसी के सकारात्मक स्वरूप से हम सभी अवगत हैं, परन्तु अपनी पुस्तक के द्वारा इसके नकारात्मक प्रभाव पर सभी का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास की हूँ। मैंने अपने पुस्तक लेखन में यह दिखलाने का प्रयास किया है कि सरोगेसी की प्रक्रिया में एक बांझ दंपत्ति के सुख के लिए सरोगेट बनने बाली महिलाओं को किस तरह की परेशानियाँ होती हैं? समाज में उनकी क्या स्थिति रहती है ? सरोगेसी से जो बच्चे जन्म लेते हैं और उन्हें किस तरह की समस्याओं का सामना करना होता है? सरोगेसी की प्रक्रिया के बढ़ते चलन का या इसके दुरूपयोग से हमारे भारतीय संस्कृति और परम्पराओं को किस तरह की क्षति हो रही है ? अध्ययन की सुविधा को ध्यान में रखते हुए मैंने अपनी पुस्तक "सरोगेसी: वरदान या अभिशाप" को चार अध्यायों में विभक्त किया है। प्रथम अध्याय में दर्शनशास्त्र की एक शाखा नीतिशास्त्र के अन्तर्गत प्रायोगिक नीतिशास्त्र की विषय-वस्तु के रूप में सरोगेसी का विवेचन किया है। इसमें सरोगेसी का अर्थ, परिभाषा और महत्व बतलाया गया है। साथ ही सरोगेसी के प्रकारों का भी विस्तृत विवेचन किया गया है। द्वितीय अध्याय में मैंने भारतीय सामाजिक पृष्ठभूमि में सरोगेसी की स्थिति का विवेचन किया है। सरोगेसी के परमार्थवाद से स्वार्थवाद की ओर बढ़ते कदम को दर्शाया गया है। यह किस प्रकार प्राकृतिक अशुभ से नैतिक अशुभ बनता जा रहा है और इसके फलस्वरूप हमारे समाज में किस प्रकार की नैतिक समस्याओं का जन्म हो रहा है। सरोगेसी के बढ़ते दुरूपयोग का हमारी भारतीय सामाजिक संस्थाओं पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। तृतीय अध्याय में सरोगेसी से संबंधित कुछ ज्वलंत घटनाओं का विवेचन किया गया है और वर्तमान समय में किस प्रकार सरोगेसी का पूर्णतया व्यवसायीकरण हो गया है, यह बतलाया गया है। सरोगेसी की प्रक्रिया में माँ और बच्चे का वस्तुनीकरण हो गया है। कुछ IVF सेंटर के निरीक्षण से प्राप्त आंकड़ों को भी दर्शाया गया है। चतुर्थ अध्याय में मैने नारीवाद और नारी सशक्तिकरण को समझाया है और यह दिखाने का प्रयास किया है कि नारी सशक्तिकरण के युग में भी जहाँ सभी तरफ महिलाओं के उत्थान की चर्चा हो रही है वहीं सरोगेसी का किस प्रकार दुरूपयोग हो रहा है। नारी के द्वारा नारी का शोषण हो रहा है। इस शोषण पर रोक के लिए किसी ने कोई कदम नहीं उठाया। सरकार ने कुछ नियम जरूर बनाए हैं, परन्तु उसका खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। ये सारी बातें बतलाने का प्रयास किया है।
यह पुस्तक मुख्यतः सेरोगेसी और सेरोगेट माँ की सामाजिक स्थिति का नीतिशास्त्रीय अध्ययन है। इस पुस्तक के माध्यम से वर्तमान समाज में सरोगेसी के विभिन्न नैतिक पहलुओं से पाठकगण को परिचित करने का प्रयास किया गया है। सरोगेसी कोई आधुनिक विचारधारा नहीं बल्कि इतिहास के पन्नों को पलटने पर सरोगेसी के अनेक दृष्टांतों का ज्ञान होता है। परन्तु आज के समय में इस प्रक्रिया में त्याग और समर्पण की भावना का समापण कर इसका पुर्णतया व्यवसायीकरण हो चुका है। इसमें बच्चा एक उत्पादन की वस्तु और सरोगेट माँ के कोख का एक मशीन की तरह व्यवहार किया जा रहा है। वर्तमान समय में जिस तरह इसके उपयोग में तेजी आयी है, इससे प्रतीत होता है कि भविष्य में बहुत तरह की सामाजिक समस्याएँ उभरने वाली है। बहुत-सी महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्थाओं परिवार, विवाह, रिश्ते नाते की मजबूत नींव हिलने लगी है और अगर इसी तरह सरोगेसी प्रचलन में रहा तो वो दिन दूर नहीं जब ये संस्थाएँ समाप्ति की ओर रहेगी और सामाजिक व्यवस्था चरमरा जाएगी। अतः यह आवश्यक हैं कि सरोगेसी के सदुपयोग की ओर कदम बढ़ाया जाए और आने वाली पीढ़ी सरोगेसी के दुरूपयोग से होने वाले खतरों को जान पाए और इसे एक परोपकारी कृत्य बनाए रखने के लिए जागरूक होकर यथोचित कदम बढ़ाएँ।
डॉ० संगीता कुमारी जन्म-01 जनवरी, 1978 ई० जन्म स्थान बोकारो स्टील सिटी, झारखंड स्नातक- महिला महाविद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय परास्नातक दर्शनशास्त्र विभाग, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय शोध- दर्शनशास्त्र विभाग, पटना विश्वविद्यालय, पटना वर्तमान में Asst. Prof., Gopal Narayan Singh University में कार्यरत । सामाजिक कार्य सन् 1999 से 2001 तक मानव सेवा संस्थान के अंतर्गत सामाजिक कार्यों में कार्यरत रही है। सन् 2001 से 2015 तक समाज हित कल्याण समिति के मार्ग दर्शन में समाज सेवा में अग्रसर रही है। वर्तमान में Association for Social and Rural Development के अंतर्गत गाँव में निःशुल्क शिक्षा कार्यक्रम, गरीब महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने हेतु निःशुल्क सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण, गरीबों को निःशुल्क कंप्युटर प्रशिक्षण कार्यक्रम और अनेक समाज सेवा के कायर्यों में सजक रूप से कार्यरत है।
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