पता नहीं जीवन का चरित्र मानव सभ्यता के विकास के आदि काल से ही ऐसा था या उसके स्वाभाविक न्यास का वर्तमान स्वरूप ही अब ऐसा विकसित हो गया है कि आज हम परस्पर सृजित मूल्यों में विश्वास के संकट से गुजर रहे हैं। पलक झपकते ही प्रायः हम अपनी प्रतिबद्धताएं और शब्द बदलते देर नहीं लगाते। विचारों और क्रियाकलापों का कोण तात्कालिक आवश्यकताओं के अनुरूप अपनी दिशा में परिवर्तन कर लेता है। क्या सही है और क्या गलत, इसका निर्धारण हमारी दैहिक आवश्यकताएं करने लगी हैं। आत्मा से संचालित मूल्य ढूँढ़ने पर भी बड़ी कठिनाई से नसीब होते हैं। ज्ञान और नैतिकता की बातें वहीं तक सीमित हैं जहाँ तक हमारे भौतिक सुखों पर कोई आँच नहीं आती, अपना छोटा या बड़ा कोई भी कष्ट हमें इतना विचलित कर देता है कि हम सारी कायनात के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजाना चाहते हैं, तब हमारी दृष्टि में ईश्वर का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाता है। हम कुकर्म धरती पर करते हैं और उसके लिए दोष ईश्वर के मत्थे मढ़ देते हैं। संवेदना हमारे दैहिक सुखों की मोहताज हो गयी है... ऐसे में हम क्या करें और क्या न करें, यह निर्णय करना लगभग असम्भव हो गया है। निर्णय कर भी लें तब भी स्थिति में कोई सकारात्मक परिवर्तन हो जायेगा, ऐसी सम्भावना दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। अस्तित्व की रक्षा ही अन्तिम उद्देश्य बन गया है... शब्दों को अधिक विस्तार देने की मंशा नहीं है। मंशा हो तब भी कुछ कर सकेंगे, इसमें सन्देह है। तो क्या सब कुछ छोड़कर पलायन कर लें, यह प्रश्न भी अंगड़ाई लेता है कभी-कभी पर यह कोई हल है। इसे भी मन स्वीकार नहीं करता।
लगता है झूल रहे हैं हम सब दुविधाओं की अनन्त प्रतीक्षाओं के झूले में.. कभी ऊपर तो कभी नीचे, कभी इस पार तो कभी उस पार ।
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