सिद्धसेन दिवाकर जैन तर्कशास्त्र और ज्ञान-मीमांसा के एक प्रमुख लेखक हैं। अन्य द्वात्रिंशिकाओं की भाँति न्यायावतार में बत्तीस श्लोक हैं। यह एक विलक्षण उपलब्धि की बात है कि सिद्धसेन दिवाकर ने इतनी छोटी परिधि में मौलिक जैन सिद्धान्तों के अनुरूप तर्कशास्त्र और ज्ञान-मीमांसा के सभी महत्त्वपूर्ण समस्यायों को समाविष्ट किया है। प्रत्येक श्लोक गूढ़ अर्थवत्ता से सारगर्भित है जिसके निहितार्थ को प्रकाशित करने का दायित्व इस कृति के उत्तरकालीन भाष्यकारों पर छोड़ दिया गया है। सिद्धसेन को जैन ज्ञान-मीमांसा पर प्रामाणिक पाठ्य-ग्रन्थ लिखना अभिप्रेत नहीं था। किन्तु, उन्होंने दिङ्नाग तथा ब्राह्मण परम्परावादी न्याय दर्शन की कृतियों का पूरा लाभ उठाया है और प्रबल तकाँ द्वारा प्रभावशाली भाषा में बौद्ध मतों की आलोचना की है। हमने मूल श्लोकों का यथातथ्य यथार्थ अनुवाद किया है तथा प्रत्येक श्लोक से सम्बद्ध व्याख्या में उनके निहितार्थ के विस्तृत प्रतिपादन से उन्हें अनुपूरित किया है। हमारी अभिरूचि विशुद्ध दार्शनिक है और सिद्धसेन के गूढ़ कथनों को दर्शनशास्त्र के आधुनिक विद्यार्थियों के लिए सुबोध बनाने हेतु उनके पूर्ववर्ती तथा परवर्ती विचारकों के मतों को हमने उद्धृत किया है। हमने सिद्धर्षि के भाष्य तथा देवभद्र सूरि के उप-भाष्य से युक्त डॉ. पी. एल. वैद्य के संस्करण का अनुसरण किया है। ये दोनों टीकाएँ बहुत ही विद्वत्तापूर्ण कृतियाँ हैं तथा मूल ग्रन्थ के अभीष्टार्थ की गहराई तक पहुँची हैं। अपनी व्याख्या में हमने भाष्यों का पूर्ण विस्तार से उपयोग किया है, यद्यपि हमने अविकल अनुवाद नहीं दिया है।
सिद्धसेन ने बिना स्पष्टतः नाम उद्धृत किये बौद्ध रचनाकारों की आलोचना की है। उसमें दिङ्नाग तथा धर्मकीर्ति की भी शब्दावलियों से सुस्पष्ट समानताएँ हैं। प्रो. जैकोबी तथा डॉ. पी. एल. वैद्य ने इस आशय के विचार व्यक्त किये हैं कि सिद्धसेन धर्मकीर्ति की आलोचना करते हैं। प्रो. डी. मालवणिया ने पूर्ववर्ती बौद्ध लेखकों के पूर्ण उद्धरण यह दरसाने के लिए दिये हैं कि जिन मतों की आलोचनां हुई है वे धर्मकीर्ति से प्राचीनतर हैं। और धर्मकीर्ति से दिवाकर की उत्तरकालीनता की सिद्धि हेतु कोई निर्णायक प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है। यह सिद्ध करने के लिए सिद्धसेन दिवाकर सन्मति तर्क तथा न्यायावतार के कर्ता हैं तथा उनके काल और दिङ्नाग के काल में अधिक अन्तर नहीं है, सबल तर्क प्रस्तुत किये गये हैं। इस कालक्रम सम्बन्धी समस्या में हम पड़ने का विचार नहीं रखते, जिसका विवेचन पं. सुखलालजी संघवी तथा प्रो. डी. मालवणिया ने किया है एवं जैकोबी और वैद्य के मतों के विरूद्ध अपना दृष्टिकोण प्रमाणित करने का प्रयत्न किया है। कालक्रम से सम्बन्धित समस्या को अपेक्षाकृत अधिक असंदिग्ध एवं स्पष्ट सिद्ध करने का अतिरिक्त तर्क और लिखित प्रमाण हमारे पास उपलब्ध नहीं हैं। फिर भी कुछ ऐसी समस्याएँ अवश्य हैं जो किसी एक के पक्ष में पूर्ण सहमति व्यक्त करने में हमें दुविधा में डाल देती हैं।
हम न्यायबिन्दु में धर्मकीर्ति द्वरा प्रतिपादित प्रत्यक्ष की परिभाषा को ही लें। यह धारणात्मक निरूपण से पूर्णतः रहित है तथा सम्यक् ज्ञान के एक विशिष्ट प्रकार के रूप में मान्य है। प्रत्यक्ष में किसी ऐसे निश्चित विशेष वस्तु अर्थात् स्वलक्षण का साक्षात् ज्ञान होता है जो अन्य वस्तुओं से पूर्णतः पृथक होता है और इन वस्तुओं की पुनः कोई सामान्य प्रकृति नहीं होती । वर्गधारणाएँ, वस्तुवादियों द्वारा, एक वर्ग के अन्तर्गत सम्मिलित प्रत्येक तथा सभी विशेषों में अन्तर्निहित वस्तुनिष्ठ सामान्यों पर आधृत मानी जाती हैं। धर्मकीर्ति ने यह सिद्ध करने में अथक श्रम किया है कि ये सामान्य, मात्र धारणात्मक निरूपणों के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं तथा वस्तुनिष्ठ यथार्थ वस्तुओं से इन्हें कुछ लेना-देना नहीं है । अतः, विशेषों का विचार करनेवाला प्रत्यक्ष प्रातिभ ज्ञान कोई निर्णय नहीं होता । यह एक प्रकार का विशुद्ध अन्तर्ज्ञान है जिसका अनुभव तो किया जा सकता है, किन्तु वर्णन नहीं किया जा सकता। वस्तु-विशेष का लक्षण पूर्णतः वैयक्तिक होता है तथा यथार्थ से कतई विशिष्ट एवं पृथक नहीं होता। अतः. प्रत्यक्ष का प्रथम निषेधात्मक गुण शब्दों द्वारा अभिव्यक्त धारणाओं के निषेध में अन्तनिहित होना बताया जाता है। निस्सन्देह, किसी स्वतः वर्णित वस्तु-विशेष के अन्तर्ज्ञान का कोई व्यावहारिक परिणाम नहीं होता। इसकी धारणा नहीं वन सकती; यह या वह के रूप में वर्णित होने की बात तो दूर रही। यह व्यक्ति-विशेष का सूचक होता है। और प्रत्येक व्यक्ति यह होता है। किन्तु, यह कई होते हैं। वे एक सामान्य धारणा एवं गूढार्थ अभिव्यंजक शब्द से अनुप्राणित होते हैं और परिणामतः अपनी व्यक्तिपरकता खो देते हैं। अन्तर्ज्ञान से निःसृत प्रत्यक्ष, यथा नीला का, यह नीला है या यह नीला के रूपों में अपने को प्रकट करता है। इस प्रकार यह तथा नीला में विशेष नीला का अनिवार्यतः द्विधाकरण है। अव्यक्त या व्यक्त विधेय सामान्य धारणा का प्रतीक होता है जिसे दिड्नाग. धर्मकीर्ति तथा उनके अनुयायियों द्वारा एक आत्मनिष्ठ निरूपण के रूप में माना गया है। इस प्रकार दिङ्नाग के द्वारा प्रत्यक्ष को धारणाओं तथा शब्दों के साहचर्य से मुक्त' प्रत्यक्ष-बोध के रूप में परिभाषित किया गया है। यह प्रत्यक्ष का स्वतः पर्याप्त वर्णन माना जाता है। किन्तु, न्यायबिन्दु में धर्मकीर्ति ने अभ्रान्तम् एक अन्य गुणबोधक विशेषण जोड़ दिया है। इस अभिनव परिवर्तन से अति प्राचीन काल से ही अविकल रूप से एक विवाद की आँधी को हवा मिली है। यह अब भी मिथ्या धारणा की संभाव्यता से मुक्त नहीं है। सम्यक् ज्ञान का ही एक प्रकार होने के कारण प्रत्यक्ष का भ्रान्ति से मुक्त होना अनिवार्य है और फलतः विशेष गुण अभ्रान्त निरर्थक पुनरूक्ति के आरोप के प्रति उत्तरदायी प्रतीत होता है। यदि यह भ्रान्त है, यह सम्यक् ज्ञान का प्रकार नहीं हो सकता, क्योंकि सम्यक् ज्ञान भ्रान्त नहीं हो सकता तथा भ्रान्त ज्ञान सम्यक् नहीं हो सकता जैसा कि सिद्धसेन। के मन्तव्य से प्रकट होता है।
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