भूमिका
विदेश घूमने की ललक उसी दिन से शुरू हो गयी थी जब स्कूल में हमारे भूगोल के अध्यापक बी सिंह ने यह बताया था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अगर पुनर्निर्माण का जज्बा सीखना हो तो जर्मनी से सीखो। एक दूसरे पीरियड में बताया था कि दुनिया का सबसे ठंडा स्थान व्लदिवोस्तोक है जहाँ से ट्रांस साइबेरियन ट्रेन चलकर मास्को पहुंचती है करीब दस हजार किलोमीटर का सफर तय करके। यह दूरी वह छह दिन में पूरी करती है। तब मैं रायपुर के माधवराव सप्रे स्कूल में पढ़ता था। उसी स्कूल के और अध्यापक पंडित स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी ने मुझे लिखने और छपने की आदत डाली थी। लेकिन 13 अप्रैल, 1952 में मेरे पिता श्री अमरनाथ के असामयिक निधन ने मेरे सपनों को ओट में कर दिया। मैंने 1954 में माध्यमिक स्कूल की परीक्षा तो पास कर ली लेकिन उसके बाद पढ़ाई की निरंतरता में विघ्न पैदा हो गया। अंग्रेजी और हिंदी की टाइपिंग सीखी, नौकरी की और 1956 में दिल्ली आकर लोकसभा सचिवालय में हिंदी टाइपिस्ट नियुक्त हो गया। यहीं काम करते करते बी. ए. (ऑनर्स) किया और लेखन की ओर उन्मुख हो गया जो अन्ततः मुझे 1966 में 'दिनमान' की दहलीज तक ले गया और पत्रकारिता में मुझे गुरु के रूप में मिले श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय और ओट में या कह सकते हैं कि पृष्ठभूमि में चले गये मेरे सपनों के साकार होने की आस बंधी।
1969 में मुझे प्रतिरक्षा मंत्रालय के सौजन्य से लद्दाख जाने का अवसर मिला था। हम लोग श्रीनगर से गुमरी क्रास करने के बाद जब द्रास पहुंचे तो एक सेनाधिकारी ने बताया कि द्रास दुनिया का दूसरा सबसे ठंडा क्षेत्र है तो मुझे सहसा साइबेरिया के व्लदिवोस्तोक की याद हो आयी जो संसार का सबसे ठंडा इलाका है। द्रास ने मुझे साइबेरिया देखने के लिए प्रेरित किया और वहाँ जाने के सपने देखने शुरू कर दिये। लगा 'दिनमान' में रहते हुए यह मुमकिन भी है। वह इसलिए भी क्योंकि वात्स्यायन जी मुझे विदेश और प्रतिरक्षा की बीट दे गये थे। वर्तमान संपादक रघुवीरसहाय ने उस व्यवस्था को जारी रखा। लद्दाख से लौटने के बाद वहाँ के सभी पहलुओं पर 'दिनमान' में खूब लिखा। याद रहे यह 1969 की बात है और बिना सेना की अनुमति और सहायता के वहाँ पहुंच पाना संभव नहीं था। लद्दाख यात्रा पर मेरी एक पुस्तक भी है 'ठंडा मरुस्थल लद्दाख'।
मेरी पहली विदेश यात्रा पश्चिम जर्मनी की थी 16 फरवरी से 1 मार्च, 1975। उस समय जर्मनी दो भागों में विभक्त था पूर्व और पश्चिम में। पश्चिम में लोकतंत्री सरकार थी जबकि पूर्व में समाजवादी अर्थात कम्युनिस्ट सरकार। हमें इतनी जरूर छूट थी कि पश्चिम बर्लिन से दोनों देशों के बीच की दीवार लाँघ करके पैदल पूर्व बर्लिन की ओर जा सकते थे। अपनी तीन बार की बर्लिन यात्रा के दौरान मैं दो बार पूर्व बर्लिन का चक्कर लगा आया था जो पश्चिम की तुलना में मुझे वह 'नीरस, शुष्क और उदास-सा' दीखा। 1977 में एक यात्रा में हालांकि मुझे पूर्व जर्मनी की सरकार से न्योता था और दिल्ली में मुझे वीएना लेकर जाने की व्यवस्था भी बतायी गयी थी लेकिन ऐन वक्त पर वह पलट गयी और उसके एवज में मुझे दूसरी बार हंगरी जाना पड़ा। हो सकता है कि पूर्व जर्मनी को इस बात की आपत्ति रही हो कि मुझे पश्चिम जर्मनी दो बार न्योत चुका है और मेरी यात्रा उसे 'सन्देहजनक' लगी हो। मुझे लगता है कि हंगरी और पूर्व जर्मनी ने अपने स्तर पर बातचीत कर मुझे एक हफ्ते के लिए फिर से हंगरी को मेजबानी करने के लिए मना लिया हो। मेरे कार्यक्रम के अनुसार मुझे पूर्व बर्लिन से पोलैंड जाना था और उसके बाद मास्को। बदले प्रोग्राम के मुताबिक मुझे वीएना से ट्रेन द्वारा बुदापेश्त भेजा गया और बुदापेश्त से ट्रेन द्वारा वॉरसों, रास्ते में प्राग आता है जहाँ मुझे उठाकर मेरे पासपोर्ट पर प्राग से गुजरने की मोहर लगाई गयी।
बहरहाल मैं अभी विमान में ही था कि माइक से घोषणा हुई 'फ्रैंकफर्ट में आपका स्वागत है मिस्टर त्रिलोक दीप। हम बाहर आपकी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।' क्योंकि मेरा नाम मेरी शक्ल के अनुरूप नहीं है इसलिए एतियादन मैंने अपने कोट की ऊपरी जेब पर अपने नाम की नेम-प्लेट लगा ली। लेकिन उसे नजरंदाज कर मुझे लेने के लिए अधिकारी ने मेरे दोनों हाथ भींच कर स्वागत किया। यह मेरी पहली यूरोप की यात्रा थी इसलिए मेजबान के इस्तकबाल से बहुत मुतासिर हुआ। मैंने उनसे पूछा कि आपने मुझे पहचाना कैसे तो उन्होंने हंसकर बताया दिल्ली के दूतावास से हमें आपका हुलिया बयान कर दिया गया था। खैर इसे राजनयिक शिष्टाचार माना जाता है। मैंने देखा कि द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त होने के तीस बरस बाद जर्मनी ने अपना ऐसा कायाकल्प कर लिया था कि पता ही नहीं चलता था कि यह कभी युद्धग्रस्त था लेकिन धरोहर की जानकारी के लिए अतीत की कुछ स्मृतियों को भी सहेज कर रखा गया है। राजधानी बर्लिन पर चार मित्र देशों का अधिकार था लिहाजा जर्मनी ने बॉन में अपनी नयी राजधानी बनायी थी जो किसी पैमाने पर भी बर्लिन से कम गरिमामय नहीं दीखती थी। अपनी पहली यात्रा में मैंने फ्रैंकफर्ट के अतिरिक्त बॉन, बर्लिन, हैम्बर्ग, म्युनिख, स्टुटगार्ट आदि शहर देखे जिनका अपना-अपना ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक महत्व था। स्टुगार्ट की कुकू घड़ियाँ जगप्रसिद्ध हैं और मर्सिडीज कारें भी।
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