- इस अंक के साथ आपको यह रही है। बऔर प्रत्येक वर्ष की भान्ति विश्वज्योति अपनी द्यायु के ४६वें वर्ष में प्रवेश कर इस बार भी इसके नव वर्ष का प्रारम्भ दो विशेषांकों के साथ हो रहा है। इस बार इन का विषय 'जनतन्व' चुना गया है।
यह वर्ष भारत की स्वाधीनता का स्वर्णजयन्ती वर्ष भी है और भारत ने पचास वर्ष पहले अपने लिए जनतान्त्रिक शासन पद्धति को चुना था ।
जनतन्व की प्रसिद्ध परिभाषा है कि 'यह सरकार है लोगों की, लोगों के द्वारा, नोगों के वास्ते। किन्तु पिछले ५० वर्षों में जनतन्त्र का यहां जो विकास हुआ है और इस समय इसका जो रूप दिखाई दे रहा है उसे देखकर तो लोग इस परिभाषा पर केवल व्यंग्य से हंस ही सकते हैं। वे इसे कुछ यूं बदल देना चाहेंगे, "जनतन्त्र सरकार है राज-नेतालों को, अफसरशाही के द्वारा, नेताओं, अफसरों तथा उनके सगे सम्बन्धियों के वास्ते ।
यह ठीक है कि इन वर्षों में देश ने कई क्षेत्रों में बहुत प्रगति की है। किन्तु शासनव्यवस्था का जो रूप आज दिखाई दे रहा है, घोटालों में फंसे राजनेता जिस प्रकार नगे हो रहे हैं, लोकसभा और विधानसभाओं में जनता के चुने हुए प्रतिनिधि जिस प्रकार हंगामा कर रहे हैं, राजनीति का जिस प्रकार अपराधीकरण हो गया है, वह सब देख कर पूछने को जी चाहता है कि क्या यही जनतान्त्रिक शासन पद्धति है? क्या पिछली पीढ़ियों के स्वतन्त्रता-संग्रामियों ने इसी भारत के लिए संघर्ष किया था ?
भारत ही नहीं आज संसार के अधिकतर देशों में जनतन्त्र के प्रति लोगों के मन में इसी भान्ति शंकाएं उठ रही है। और विडम्बना यह है कि यह समाप्त होती हुई बीसवीं शताब्दी जनतन्त्र और तानाशाही के बीच संघर्ष की सदी कही जाती है, जिसमें जनतन्त्र विजयी रहा। अभी हाल ही में अमरीका के राष्ट्रपति बिल क्लिटन ने दूसरी बार राष्ट्रपति-पद-भार ग्रहण करते हुए इस बात पर सन्तोष प्रकट किया था कि इस समय संसार की अधिकांश जनता तानाशाही पंजों से मुक्त हो चुकी है और लोकतन्त्र में जी रही है। किन्तु विश्व में आज जो ब्यापक अव्यवस्था और अराजकता फैली हुई है, लोग जिस भान्ति हिंसा और भुखमरी के शिकार हो रहे हैं, उसे देखते हुए पूछा जा सकता है कि क्या इसी को लोकतन्त्र में जीना कहते हैं ?
किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत ने जनतन्त्र को चुन कर भूल की थी। इस प्रसंग में पाकिस्तान के भूतपूर्व प्रधानमन्त्री जुल्फिकार अली भुट्टो के एक कथन की याद बाती है। पाकिस्तान की दुर्दशा की तुलना भारत से करते हुए उसने लिखा था, "भारत को उसके अराजक जनतन्त्र (chaotic democracy) ने बचा लिया है।" उसके इस कथन में एक गहरी सच्चाई है। यहां लोगों के असन्तोष के निकास के लिए चुनाव और विधानसभाएं उपलब्ध है। बतः यहाँ की हालत इतनी बिगड़ने नहीं पाती जितनी पाकिस्तान में बिगड़ जाती है, और जिसका लाभ उठाकर जरनैलों ने वहाँ कई बार सैनिक तानाशाही लागू की है। इसी से पाकिस्तान की रोना को अत्यधिक महत्त्व मिल गया है और किसी ने इसके बारे में ठीक ही कहा है कि 'सामान्यतः देश के पास एक रोना होती है, किन्तु यहां रोना के पास एक देश है। जनतन्ख के अभाव के कारण ही पाकिस्तान से बंगला देश अलग हो गया और जनतन्त्र के कारण ही भारत अभी तक एक बना हुआ है। लोग जो इस के प्रति असन्तुष्ट और सशंकित हो गए है तो वह इसलिए कि यह अभी तक अव्यवस्थित और अपरिपक्व है । वस्तुतः यह असन्तोष और ये शकाएं हो इस बात की आशा भी दिला रही हैं कि यह अब्यवस्था और यह अपरिपक्वता दूर की जा सकेगी ।
इक्कीसवीं शताब्दी की दहलीज पर खड़े मानव को आज यह निर्णय करना है कि समाज की भावी प्रगति के लिए कौन सी शासन व्यवस्था उचित हो सकती है। क्या जनतन्त्र आधुनिक मानव के सपनों को साकार कर सकता है ? लोकतन्त्र में आज जो दोष दिखाई दे रहे हैं क्या वे अस्थायी विकार है? क्या इन्हें सुधारा जा सकता है? यदि हां, तो कैसे ? किन्तु यदि इसकी हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि इसका इलाज सम्भव नहीं तो फिर कौन सी शासन पद्धति इसका स्थान ले सकती है ? और क्या कोई ऐसी शासन पद्धति आज उपलब्ध है, या मानव को ज्ञात है ?
कुछ ऐसे ही प्रश्न थे जिन्होंने हमें स्वाधीनता के इस स्वर्ण जयन्ति वर्ष में विश्व-ज्योति के ये विशेषांक जनतन्त्र को समर्पित करने की प्रेरणा दी। विद्वान् लेखकों ने जनतन्त्र के कई पक्षों पर प्रकाश डालने की चेष्टा की है। आजा है हमारे सुधी पाठकों को ये विशेषांक कुछ नए सुझाव देंगे और विश्व तथा राष्ट्र की समस्याओं पर एक नए ढंग से देखने और सोचने की प्रेरणा देंगे ।
अब अन्त में एक सुखद कर्तब्य !
इतने वर्षों से आपकी यह पत्रिका जो नियमित रूप से प्रकाशित हो रही है तो इसका श्रेय इसके सुधी पाठकों, विद्वान् लेखकों तथा दानवीर सज्जनों को जाता है। आप सब के प्रति हम बहुत आभारी हैं और आशा करते हैं कि आप सब का सक्रिय सहयोग हमें आगे भी इसी भान्ति मिलता रहेगा ।
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