हमारे परम आराध्यतम नित्यलीला प्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोतरशत्त श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद की असीम कृपा से 'विवाह: एक अटूट बंधन' नामक इस पुस्तक को श्रद्धालु पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हुए मैं अपार प्रसन्नता का अनुभव करता हूँ।
सुखी वैवाहिक जीवन प्रत्येक गृहस्थ युगल के लिए एक स्वप्न होता है। पति-पत्नी सदैव एक-दूसरे से असंतुष्ट रहने के कारण व्यथित रहते हैं। माता-पिता के बीच अस्थिर संबंधों के कारण बच्चों को भी कठिनाई होती है। यदि वैवाहिक संबंध अलगाव या संबंध विच्छेद में परिवर्तित हो जाता है, तो परिवार के सदस्य आजीवन व्यथित रहते हैं। इसलिए वैवाहिक जीवन महत्त्वपूर्ण है। पूर्व काल में, पुत्र या पुत्री को विवाहित जीवन के विषय में अग्रजों या गुरु द्वारा शिक्षित किया जाता था। परिवर्तनशील समयानुसार यह शिक्षा लुप्त होती जा रही है। शिक्षा और प्रशिक्षण हमें अनुशासित बनाते हैं और सफलता का मार्ग दिखाते हैं। एक बार जब आप अपना मार्ग निर्धारित कर लेते हैं, तो आप नियमों का अभ्यास कर सकते हैं और सफलता का अनुभव कर सकते हैं।
यह पुस्तक युवाओं को उन नियमों से परिचित कराती है जो वैवाहिक जीवन में शांतिपूर्वक रहने के लिए अनिवार्य हैं। इन नियमों का पालन करना बहुत कठिन नहीं है। दाम्पत्य जीवन में प्रवेश करने से पूर्व यह जान लेना चाहिए कि अपने साथी का चुनाव कैसे करना है। यदि कोई व्यक्ति अपने स्वभाव, गुण, रुचि, प्राथमिकताओं और अपेक्षाओं के अनुरूप व्यक्ति से विवाह करता है, तो संघर्ष कम होते हैं। उदाहरणार्थ एक राक्षस को एक राक्षसी से विवाह करना चाहिए, और एक देवता को एक देवी से विवाह करना चाहिए।
इस पुस्तक में ऐसी अनेक विधियों का वर्णन किया गया है, जो युवाओं को उपयुक्त जीवनसाथी के चयन में सहायक हैं। जीवनसाथी के चयन के पश्चात् व्यक्ति को यह ज्ञान होना आवश्यक है कि किस प्रकार उनके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करना है। उदाहरणार्थ, यदि कोई अपनी रुचि के अनुसार मोटर कार लेता है, तो उसे ड्राइविंग का ज्ञान होना चाहिए और मोटर कार का उचित रख-रखाव भी आवश्यक है। वैसे ही विवाह करना कोई दुष्कर कार्य नहीं है, लेकिन विवाह से पूर्व वैवाहिक जीवन की जटिलताओं को भली-भाँति जान लेना चाहिए।
यह पुस्तक पाठकों को सुखमय वैवाहिक जीवन व्यतीत करने और जीवनसाथी के साथ व्यवहार करने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण और मार्गदर्शन प्रदान करेगी। इस विषय पर, वैदिक विज्ञान में कई विधियों का उल्लेख किया गया है और यह पुस्तक वर्तमान व्यावहारिक अनुभवों के साथ शास्त्रों के आदेश प्रदान करती है।
आध्यात्मिक जीवन ग्रहण करने के पश्चात् कई गृहस्थ भक्त अपने पारिवारिक दायित्वों को त्यागने का प्रयास करते हैं, उनकी उपेक्षा करते हैं और अशांति उत्पन्न करते हैं। इसकी परिणति उत्तेजित मन और भक्तिमय सेवा से मन का उचटना में होती है। उपरोक्त दायित्वों का निर्वाह करते हुए किस प्रकार शांतिपूर्वक शुद्ध भक्तिमय सेवा करें, इस विषय में यह पुस्तक गृहस्थ भक्तों की सहायता करती है।
इस पुस्तिका के लेखक जो श्रील प्रभुपाद के परम प्रिय शिष्य हैं, श्रीमान् क्रतु दास जी का जन्म 5 जुलाई 1944 को लाछरस गाँव, गुजरात, भारत में हुआ। अपने मातृक गाँव में जन्म लेने वाले लेखक का परिवार वैष्णव था। लेखक की माताजी श्रीमती शांताबेन और पिताजी श्रीमान् भवानभाई, ने जन्म से ही उन्हें कृष्णभावनाभावित होने का सुअवसर प्रदान किया और उन्हें कृष्ण भक्ति के मार्ग पर अग्रसर किया। उनकी माताजी ने उन्हें बचपन से ही सभी वैदिक ग्रंथों, यथा महाभारत, श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत का गहन अध्ययन करवाया। उनके पिताजी उन्हें कृष्ण कथा और भजनों का आस्वादन करवाते थे और उनके दादाजी प्रतिदिन उन्हें भगवान् श्रीराम के विग्रह के दर्शन के लिए मंदिर लेकर जाते थे। लेखक में बचपन से ही नेतृत्व के गुण थे। वह वाकल हाई स्कूल, मोभा रोड, वडोदरा, गुजरात छात्र संघ के अध्यक्ष थे। वडोदरा से सिविल इंजीनियरिंग पूर्ण करने के बाद उन्होंने सन् 1972 में अमेरिका की सेंट लुइस यूनिवर्सिटी से मास्टर्स ऑफ साइंस की डिग्री प्राप्त की।
सन् 1968 में उन्होंने श्रीमती अमृतकेलि देवी दासी से विवाह किया, जो स्वयं एक धार्मिक महिला हैं एवं भगवान् श्रीकृष्ण की समर्पित भक्त हैं। ये दोनों सन् 1970 में इस्कॉन के संपर्क में आये एवं सन् 1974 से टोरंटो इस्कॉन मंदिर में पूर्णकालीन सेवक बने। सन् 1976 में उन्हें श्रील प्रभुपाद के प्रथम दर्शन हुए एवं उन्होंने लेखक एवं माताजी को अपने शिष्यों के रूप में स्वीकार करते हुए आशीर्वाद दिया। अगले ही वर्ष उन्होंने श्रील प्रभुपाद से दीक्षा प्राप्त की।
अमेरिका एवं कनाडा में एक सफल सिविल इंजीनियर के पद पर कार्यरत होते हुए भी वे कभी पश्चिमी सभ्यता से आकर्षित नहीं हुए। श्रील प्रभुपाद से प्रेरित होकर लेखक ने अपने इंजीनियर पद का त्याग कर दिया और इस्कॉन के पूर्ण उपासक बन गए। वे सुबह-शाम प्रचार कार्यों एवं अन्य सेवाओं में व्यस्त रहने लगे। वे टोरंटो, शिकागो एवं वैंकूवर मंदिर के सामूहिक प्रचार कार्यों के संचालक थे। सन् 1987 में वे इस्कॉन बैंकूवर मंदिर के अध्यक्ष बने। उन्होंने बैंकूवर एवं वेस्ट वर्जिनिया में न्यू वृंदावन मंदिर के निर्माण में भी सिविल इंजिनियर की भूमिका निभाई।
पश्चिमी देशों में लम्बे समय तक प्रचार करने के उपरान्त, श्रीमान् क्रतु दास जी सन् 1993 में भारत लौट आये एवं गुजरात में प्रचार करने लगे।
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