'यादों की उजली पगडंडियाँ' मेरे संस्मरणों की ताजा पुस्तक है। पिछले कुछ वर्षों में मेरे संस्मरण पत्र-पत्रिकाओं में इतने अधिक छपे हैं, कि उनके बारे में ज्यादा कुछ कहने की दरकार नहीं। पर कुछ शब्द तो फिर भी कहूँगा ही। मेरे लिखे संस्मरण औरों के लिखे संस्मरणों से कुछ भिन्न हैं। भला क्यों और कैसे? इस बारे में भी दो शब्द लिखना चाहूँगा। पहली बात तो यह कि मेरे संस्मरणों की कहानी कहीं न कहीं दिल्ली से जुड़ी हुई है। मैंने कभी सोचा नहीं था कि दिल्ली आऊँगा। फिर दिल्ली आकर पत्रकारिता करूँगा और अपने जीवन के कोई पच्चीस बरस इसमें होम कर दूँगा, यह भी कहाँ सोचा था? मैं हिंदुस्तान टाइम्स की बाल पत्रिका 'नंदन' के संपादन से जुड़ा था। तो मेरी पत्रकारिता औरों की पत्रकारिता से कुछ भिन्न जरूर थी, पर थी तो पत्रकारिता ही।... दिल्ली और पत्रकारिता। पत्रकारिता और दिल्ली।...ये दोनों चीजें गड्डमड्ड होकर एक अजीब गड़बड़झाला बन जाती हैं। इसी गड़बड़झाले में से निकला मेरा बेहद दुख और तकलीफ भरा उपन्यास 'यह जो दिल्ली है। पर दिल्ली प्रवास की पूरी कथा कहाँ कह पाया...? शायद आज तक नहीं। यों सच पूछिए तो दिल्ली आना मेरी जीवन-कथा का सबसे अटपटा और अजीगोगरीब अध्याय है। खुद मेरे लिए एक उलटबाँसी। इसलिए कि दिल्ली में आकर भी मैं कभी दिल्ली का हुआ नहीं, और दिल्ली मेरी हो सके, यह तो असंभव ही था। असंभव से भी असंभवा... भला दिल्ली को मुझ सरीखे गाबदुओं से क्या लेना, जिन्हें न सभ्यता और दुनियावी एटीकेट्स आते हैं और न मिलने और बात करने का तरीका। और न ही मैं उन चतुर, चिकने चेहरों में शामिल हो सका, जो कुछ लिखने या बात कहने से पहले इन या उन महान जी की ओर ताक लेते हैं, और अंत में बस घिघियाकर रह जाते हैं। ऐसे में मुझ सरीखे कुछ असुविधाजनक लोग हैं तो जरूर, जो बस, अपनी मौज में जीते हैं। अच्छे-बुरे जैसे भी दिन हों, इसी मौज में काट लेते हैं, जो सही लगा, वह खुलकर कहते हैं, करते हैं और इसी में सुख मानते हैं। ऐसे बंदे का सामना यहाँ बड़ी बारीक-बारीक सी, विचित्र भंगिमाओं से हुआ, जो कि दिल्ली को दिल्ली बनाती हैं। हर तरफ वही थीं, अपने अलग-अलग ब्रांड और बाजारी भाव-ताव के साथ।... देखकर मैं शरद जोशी की भाषा में एकदम 'नरभसा' गया। सोचा, ओ मेरे राम जी, यह मैं किस जंजाल में आ गया? मन में हर वक्त खुट-खुट, खुट-खुट होती रहती। लगता, अब भागूँ, अब भागूँ, अब भागूँ...! पर भागूँ कैसे...? मैं तो पंजाब में अपनी अच्छी-खासी प्राध्यापकी को छोड़-छाड़कर चला आया था। अब वापस जाने के सारे रास्ते बंद। तो फिर...? मैं मन मारकर जीने लगा। पर यह आधे दिल से जीना था। बाकी का आधा दिल जैसे दिनोंदिन निस्पंद होता जा रहा था।... पर फिर ऐसे में कुछ बड़े सुखद संयोग भी हुए। पहले अद्भुत लोकयात्री देवेंद्र सत्यार्थी जी मिले, फिर रामविलास जी मिले, रामदरश जी मिले, शैलेश मटियानी मिले, विष्णु खरे मिले...! और मैं अंदर से भर सा गया। मुझे लगा, इसी दिल्ली में एक और दिल्ली है, उसे मैं क्यों भूले बैठा हूँ? वह तो मेरी और मुझ सरीखे सबकी दिल्ली है, जो अपनी ठेठ कसबाई जिंदादिली को छोड़ने को तैयार नहीं हैं, और दिल्ली को दिल्ली की तरह नहीं, बल्कि अपनी शर्तों और अपने जीवन-मूल्यों के साथ जीना चाहते हैं। और मैंने पाया कि एकाएक जीवन में स्वाद बढ़ गया है। और यह भी कि दिल्ली में मैं भी अपने इन धुरंधर साहित्यिक गुरुओं की तरह ढंग से लिख-पढ़ सकता हूँ, जी सकता हूँ। बहुत कुछ अंदर से उमग-उमगकर सामने आने लगा।... यहाँ मैं बहुतों से मिला। बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ पाया। बहुत से मित्र बने। बहुत कुछ लिखा भी। उपन्यास, कविता, कहानियाँ, आलोचना, साक्षात्कार, बच्चों का साहित्य।... जो कुछ मन में उमगता, वह कागजों पर उतरता जाता। लगने लगा, जीवन में रस है। ऐसा जीवन कोई बेमानी तो नहीं!... पर क्या यह संभव था
प्रकाश मनु सुप्रसिद्ध साहित्यकार, संपादक और बच्चों के प्रिय लेखक। मूल नाम : चंद्रप्रकाश विग। 12 मई, 1950 को शिकोहाबाद (उ.प्र.) में जनमे प्रकाश मनु के लीक से हटकर लिखे गए उपन्यासों 'यह जो दिल्ली है', 'कथा सर्कस', 'पापा के जाने के बाद' की जबरदस्त चर्चा हुई। इसी तरह कहानी और कविताओं का अपना एक अलग रंग। अभी हाल में प्रकाशित आत्मकथा का पहला खंड, 'मैं मनु' तथा 'यादें घर-आँगन की', 'बड़े साहित्यकारों के साथ (संस्मरण) पुस्तकें भी काफी सराही गई। 'यादों का कारवाँ में हिंदी के शीर्ष साहित्यकारों के संस्मरण। साहित्य अकादेमी के लिए देवेंद्र सत्यार्थी और विष्णु प्रभाकर पर मोनोग्राफ । सत्यार्थी जी की संपूर्ण जीवनी 'देवेंद्र सत्यार्थी: एक सफरनामा' प्रकाशन विभाग से प्रकाशित। बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं में डेढ़ सौ से अधिक पुस्तकें, जिन्हें बच्चे ही नहीं, बड़े भी खोज खोजकर पढ़ते और सराहते हैं। हिंदी में बाल साहित्य का पहला बृहत् इतिहास 'हिंदी बाल साहित्य का इतिहास' लिखा, जो स्वयं में मील के पत्थर सरीखा ऐतिहासिक कार्य है। इसके अलावा 'हिंदी बाल कविता का इतिहास', 'हिंदी बाल साहित्य के शिखर व्यक्तित्व', 'हिंदी बाल साहित्य के निर्माता', 'हिंदी बाल साहित्य मेरे कुछ साक्षात्कार' और 'हिंदी बाल साहित्य संभावनाओं का आकाश पुस्तकें भी। कई महत्त्वपूर्ण संपादित पुस्तकें और संचयन। कई पुस्तकों का पंजाबी, सिंधी, मराठी, गुजराती, कन्नड़ समेत अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद । पुरस्कार : बाल उपन्यास 'एक था ठुनठुनिया' पर साहित्य अकादेमी का पहला बाल साहित्य पुरस्कार। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के 'बाल साहित्य भारती पुरस्कार और हिंदी अकादमी के 'साहित्यकार सम्मान' से सम्मानित। कविता. संकलन 'छूटता हुआ घर' पर प्रथम गिरिजाकुमार माथुर स्मृति पुरस्कार।
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