प्राक्कथन
सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ० युवल नौवा हरारी, प्रोफेसर हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ यरुशलम का इतिहासकारों के बारे में कहना है कि 'हम सभी चाहे किसी भी मत के अनुयायी हो, अपने विश्व की प्रचलित धाराओं पर प्रश्न उठाने में विवादित मामलों से डरना नहीं चाहिए; जिससे भूतकालीन विकास का वर्तमान समस्याओं से संबंध की व्याख्या की जा सके।' यदुवंशः प्राचीन से अर्वाचीन लिखने का फैसला उस समय किया जब जाति, धर्म के प्रति नफरत का बोल बाला बिहार ही नहीं भारत वर्ष में पराकाष्ठा पार कर चुका था।
यदुवंश परम्परा वैदिक आधार पर जिसके प्रणेता श्रीकृष्ण को माना जाता है कि विचारधारा को वैश्विक धरातल पर सर्वग्राहय माना जाता है। मनुस्मृति में वर्णित शुद्र एवं द्विज के वर्गीकरण सर्वथा भिन्न है। इसी परम्परा की वैदिक काल से अद्यतन तक की दात्रा का मौलिक स्वरूप मुझे इसके व्यापक स्वरूप की ओर आकृष्ट करता रहा एवं श्रीकृष्ण की वैश्विक सर्वग्राह्यता ने मुझे प्रेरणा प्रदान की कि मैं पूर्ण मनोयोग से तटस्थ भाव से समय प्रवाह के युगीन आदर्शों को इतिहासकार की दृष्टि से वर्णन करूँ। विषय अत्यन्त जटिल था क्योंकि भारत के इतिहास लेखन की राज्यकालों के आधार पर लिखा गया था जो किसी एक विचारधारा के सतत् प्रवाह के रूप में न दिखा कर इसे टुकड़े-टुकड़े जोड़कर बनाया गया था तथा इसे लिखने वाले पूर्वाग्रह से ग्रसित न रहे हों, निर्विवाद रूप से नहीं कहा जा सकता। डॉ० हरारी का यह अभिप्रेरक कि इतिहासकार को वर्तमान समस्याओं की भूमिका में पिछली मान्यताओं पर प्रश्न उठाना उसका दायित्व बनता है, मुझे संबल प्रदान करता रहा। वर्तमान में भारत में कट्टर जातिवाद के मुखर होने का भूतकाल से क्या संबंध है? इस विषय से ज्यादा रूचि मेरी उस विषय में थी कि कौन-सी राजकीय या प्रशासनिक परम्पराएं होंगी, जो इतिहास में विद्यमान रही हों, तथा जो लोगों को जोड़ती हो तथा जहाँ वैज्ञानिकता के आधार पर विभिन्न मत-मतान्तरों के मानने वालों में एकता का संचार करती हो। इस लालसा ने मुझे यदुवंश के इतिहास की ओर आकृष्ट किया। एक अन्य बात कृष्ण की जो मुझे अच्छी लगी कि वे योगी राज सर्वकला सम्पन्न, सामान्य ग्वाला जो नारी सुलभ गुणों के प्रति सम्मान एवं प्रेम का साक्षात स्वरूप हो, तथा जिसके संरक्षण में यशोदा, राधा, कुन्ती, द्रोपदी सभी का आदर भाव हो उस परम्परा में तो समाज पितृ-सत्तात्मक न होकर मातृ-सत्तात्मक होना चाहिए। और जब हम इस दृष्टि से इतिहास का अवलोकन करते हैं, तो हम पाते हैं कि कृष्ण का पालन-पोषण एवं मूल्यों का बोध करनेवाली, शिवाजी और चन्द्रगुप्तमौर्य को जन्म देनेवाली आदि आदर्श नारियाँ गौपालकवंश कुल में ही जन्मी थी। इस दायित्व के निर्वहन में यदुवंश का इतिहास समुचित रूप से न लिखे जाने का आभाव भी मेरे प्रयास को सम्बल देने का कार्य किया। मेरा प्रयास कहाँ तक सफल रहा यह तो आनेवाले समय में इतिहासकारों द्वारा परखा जाएगा।
स्मरणीय है कि मैंने अपने अधीन "प्राचीन भारतीय कला एवं साहित्य में पशुओं की विशेषता गौ का महत्व (2008)" और "यादवों का प्राचीन इतिहास, प्रारम्भ से 1206 ई० तक (2014)" में शोधकार्य सम्पन्न कराया। किन्तु इस कार्य से मुझे सन्तुष्टि नहीं मिली। मेरे मन में यह भावना आती रही कि यदुवंशीयों के इतिहास पर एक ठोस शोधकार्य होना चाहिए। मैंने इस पुस्तक के लेखन में यदुवंशीय समाज के अनेक व्यक्तियों से सम्पर्क भी साधा। सर्वप्रथम ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए मैं मुख्यतः बड़े भाई समान डॉ० मिथलेश कुमार राय, पटना सेन्ट्रल डिसपेन्सरी, पटना विश्वविद्याल, पटना का काफी आभारी हूँ, जिन्होंने मुझे काफी सहायता की, जब डॉ० नन्द किशोर सिंह हमारे निर्देशन में शोध-कार्य कर रहे थे, उस समय से आज तक उनके शैक्षणिक योगदानों को भुलाया नहीं जा सकता। अब तक हुए यदुवंशीयों पर विभिन्न पुस्तकों का अध्ययन भी किया। पूर्ण मन्थन करने के उपरान्त इस कार्य को करने का प्रयास किया है। मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ यह सुधि पाठक ही मूल्यांकन कर सकते हैं। त्रुटियाँ हो सकती हैं मानव हूँ किन्तु जैसे-जैसे हमें और जानकारी मिलेगी उसमें सुधार करेंगे। तीन दशकों से अध्यापन कार्य में जुटे रहने के कारण मुझे जो जानकारियाँ थी उसके अनुसार यदुवंशीयों के प्राचीन से लेकर आधुनिक काल तक के जो महत्वपूर्ण योगदान थे उसे हमने बीस अध्यायों में बाँटकर अध्ययन किया है। इस कार्य में बहुत-सी बाधाएँ आयीं, अनेक लोगों की प्रताड़ना भी सुनने को मिली, परन्तु मैं अपने मार्ग पर चलता रहा। उसी की परिणति है कि शोध-पुस्तक लेखन से प्रकाशन तक विभिन्न व्यक्तियों का सहयोग एवं समर्थन मिला। इस कार्य के प्रस्तुतिकरण के लिए मैं विशेष रूप से आभार प्रकट करता हूँ, प्रोफेसर (डॉ०) जयदेव मिश्रा विभागाध्यक्ष, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, पटना विश्वविद्यालय, पटना का जिनका सहयोग जितना अपेक्षित था उससे ज्यादा मुझे मिला। जबभी मुझे कोई शंका हुई तो उन्होंने क्षणभर में उनका समाधान किया। डॉ० अफजाल राजा खान और अशरफ राजा खान, खान स्टडि ग्रुप, भारतीय प्रशासनिक परीक्षा सेवा, दिल्ली। बी०एन० मण्डल वि०वि० में डॉ० शरफ्राज आलम व्याख्याता, मधेपुरा के भरपूर सहयोग का आभारी हूँ, डॉ० नन्द किशोर सिंह, प्राचार्य +2 विद्यालय, अरवल के शोध-पुस्तक से इस पुस्तक को वर्तमान रूप देने में काफी सहयोग मिला। महाराज सिंह यादव, वरिष्ठ लेखा परीक्षा अधिकारी (सेवा-निवृत), गाजीपुर, उ०प्र०, श्री दारोगा प्रसाद यादव का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में काफी सहयोग मिलता रहा। मैं अपनी धर्मपत्नी श्रीमती नसरीन बानो के प्रति आभार प्रकट करता हूँ, जिन्होंने इस पुस्तक को प्रकाशित करने में काफी सहयोग प्रदान किया। मुझे घर के कार्यों से मुक्त कर इस दिशा में अत्यधिक योगदान दिया। इसी क्रम में अपने बच्चों इजिनियर मो० सालिम सईद, सूलेमा साबरीन एवं मो० सालिक सईद को भी नहीं भूला सकता जिनका सहयोग सदा मिलता रहा अन्यथा पुस्तक पूर्ण होना सम्भव नहीं होता।
अन्त में मैं अपने प्रकाशक जानकी प्रकाशन के श्री नन्द किशोर सिंह एवं अनुज नितेश तथा निकहत के प्रति आभार प्रकट करता हूँ जिन्होंने इस पुस्तक का प्रकाशन बहुत अल्प समय में किया।
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