ये तरकश के तीर भारतीय काव्य में, विशेषकर हिन्दी-काव्य में दोहा एक मुक्तक छन्द के रूप में प्राचीन काल से आज तक लोकमानस में रचा-बसा है और उसने हिन्दी कविता के आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल से लेकर इस समकाल में भी अपनी रचनात्मकता, सार्थकता और लोकप्रियता को सिद्ध किया है। परम्परागत दोहों से आधुनिक दोहा का सौन्दर्यबोध स्वाभाविक रूप में बदला है। अध्यात्म, भक्ति और नीतिपरक दोहों के स्थान पर अब वह उस आमजन का चित्रण करता है, जो उपेक्षित है, पीड़ित है, शोषित है, बेबस है। इस समूह के दोहे अपने नए अंदाज में तीव्र व आक्रामक तेवर लिए हुए हैं। अतः जो भिन्नता है वह समय सापेक्ष है। इसमें आस्वाद का अंतर प्रमुखता से उभरा है। इन दोहों में आज का युगसत्य और युगबोध पूरी तरह प्रतिबिम्बित हो रहा है। पिछले चालीस वर्षों में आए मेरे ये दोहे भी इसी प्रतिबिम्ब के भीतर कहीं अवस्थित हैं। आज के दोहे का महत्वपूर्ण आयाम है, अनुभूति-सत्य। आज का दोहाकार जिन सामाजिक आर्थिक या सांस्कृतिक परिस्थितियों से गुजर रहा है और जो भोग रहा है, वही सीधे-सीधे उसके दोहे में उतर रहा है। यानी आज का दोहाकार अन्य काव्य-विधाओं के रचनाकारों की तरह जीवनधर्मी है, लोकधर्मी है। उसके दोहों में धड़कता हुआ जीवन और गतिशील समय साफ-साफ देखा जा सकता है। वह पूरे माहौल के प्रति सचेत है। चूंकि माहौल सदैव बहुआयामी होता है, इसीलिए आज के दोहे के विषयों को भी सीमित नहीं किया जा सकता । आज का दोहाकार सूक्ष्म से सूक्ष्म, निजी से निजी साथ ही बड़े से बड़े वैश्विक अनुभव को भी अपने दोहों का विषय बना रहा है। जीवन, समाज, नीति, धर्म, दर्शन तथा युगीन विसंगतियों, पर्यावरण, आदि अनेक जीवन संदर्भों पर बात करते हुए आज के दोहाकार नये दोहे रच रहे हैं। इनमें सम्बंध, राजनीति, दलित चेतना, आदिवासी जीवन, ग्रामीण जीवन, स्त्री जीवन, महानगरीय जीवन, मजदूर या कस्बाई जीवन तथा अन्य विषयों के जहाँ आधुनिक चित्र प्रस्तुत हो रहे हैं वहीं वह अपनी अभिव्यक्ति हेतु जन-संस्कृति और मिथिकीय प्रतीकों से भी मदद ले रहा है। अर्थात, मेरे ये दोहे अपने परिवेश के अनुभवों को समेटे हुए सहज और गहरे अर्थबोध से संपृक्त हैं। यहाँ बनावट नहीं है। यहाँ समाज के गरीब, मजदूर, किसान और आमजन की पीड़ा का गान है और राजनीति, शासन-तंत्र और व्यवस्थागत विडम्बनाओं, आतंकवाद, धार्मिक पाखण्ड, अंधविश्वास और अमानवीयता के विरुद्ध अपने तरकश के तीरों से तीव्र आक्रमण भी है। हमारी चिन्ता विकास के नाम से चल रहे इस विनाश से धरती के सौंदर्य को बचाने की भी है। मानवीय मूल्यों के स्खलन की चिन्ताएँ अपनी संपूर्ण प्रश्नाकुलता के साथ इन दोहों में व्यक्त हुई हैं।
हरेराम समीप जन्म: 13 अगस्त, 1951 ग्राम-मेख, जिला- नरसिंहपुर, मध्यप्रदेश । शिक्षा : स्नातक (वाणिज्य एवं विधि) साहित्यरत्न, उर्दू डिप्लोमा, उर्दू अकादमी, दिल्ली। प्रकाशन : 51 पुस्तकें राजल संग्रह: 'हवा से भीगते हुए', 'आँधियों के दौर में', 'कुछ तो बोलो', 'किसे नहीं मालूम', 'इस समय हम', 'है तो सही', 'यह नदी खामोश है', 'समकाल की आवाज चयनित ग़ज़लें' । दोहा संग्रह: 'जैसे', 'साथ चलेगा कौन', 'चलो एक चिट्ठी लिखें', 'आँखें खोलो पार्थ', 'पानी जैसा रंग', 'पूछ रहा है यक्ष', 'उम्मीदों के द्वार' । कविता संग्रह: 'मैं अयोध्या', 'शब्द के सामने', हाइकु संग्रह 'बूढ़ा सूरज', कहानी संग्रह- 'समय से पहले'। आलोचना ग्रन्थ : 'समकालीन हिन्दी ग़ज़लकार-एक अध्ययन' (चार खण्ड), 'हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा', 'हिन्दी ग़ज़ल की पहचान' । सम्पादन : 'समकालीन दोहा कोश', 'समकालीन महिला गजलकार', 'हिन्दी ग़ज़ल कोश', 'दुष्यंत कुमार : स्मरण एवं विमर्श', गजल और डॉ. उर्मिलेश (परामर्श व सम्पादन सहयोग), चर्चित ग़ज़लकारों की 'चुने हुए शेर' पुस्तक श्रृंखला- श्री हस्तीमल हस्ती, बालस्वरूप राही, विज्ञान व्रत, कुमार प्रजापति, ओमप्रकाश यती, दिनेश सिंदल, कुलदीप सलिल, ज्ञानप्रकाश विवेक और माधव कौशिक के संग्रह प्रमुख हैं- 'कथाभाषा' (त्रैमासिक) पत्रिका का सम्पादन 1988 से 1992 तक । पुरस्कार : हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा महाकवि सूरदास सम्मान (2022), 5 राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त विशिष्ट पुरस्कार (2008) 1 अन्यः 1. डॉ. वरुण कुमार तिवारी द्वारा संपादित शोधग्रंथ 'हरेराम समीप-व्यक्ति और अभिव्यक्ति' प्रकाशित 2009 । 2. विभिन्न विश्वविद्यालयों के हिन्दी पाठ्यक्रम में इनकी पुस्तकें अनुमोदित । 3. जवाहरलाल नेहरु स्मारक निधि, तीन मूर्ति भवन, नई दिल्ली में कन्ट्रोलर ऑफ एकाउंट्स के पद से सेवानिवृत ।
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