प्राक्कथन
भारत में क्षेत्रीय अध्ययन का महत्त्व निर्विवाद है। भारतीय इतिहास की यह विशेषता रही है कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों की भौगोलिक रूपरेखा, भाषा एवं संस्कृति में अनेकता होते हुए भी प्राचीन काल से एकीकृत हैं और केन्द्रीय सत्ता एवं संस्कृति को प्रभावित करते रहे हैं। अतः, भारतीय संदर्भ में इतिहास सहित सभी विधाओं में क्षेत्रीय अध्ययन का महत्त्व सर्वमान्य है। वर्तमान संविद-व्यवस्था के दौर में यह महत्त्व और बढ़ गया है। इस दृष्टि से विश्लेषण करने पर बिहार के सामान्य इतिहास का अध्ययन तो विशिष्ट स्थान रखता ही है; किन्तु मध्यकालीन बिहार का अध्ययन सर्वाधिक दूरगामी महत्त्व का सिद्ध होता है।
प्राचीन काल में महान् मौयों ने जहाँ बिहार के इतिहास को भारत का इतिहास बना दिया, वहीं मध्य काल में धरतीपुत्र शेरशाह ने बिहार को गौरवशाली स्थान प्रदान किया। महान् मुगलों ने बिहार को अपनी वह महानता तो पूर्णतः नहीं दी; किन्तु अपनी सम्पूर्ण व्यवस्था में बिहार के विशिष्ट महत्त्व को स्वीकारते हुए तदुनुकूल कार्य-संचालन किया। इसीलिए उन्होंने अपने धुरंधर प्रशासकों अथवा शाही ख़ानदान के शाहजादों को बिहार का सूबेदार नियुक्त करने की प्रथा चलाई। बाद के मुगलों ने यद्यपि इस परम्परा का निर्वाह किया; किन्तु देश एवं प्रान्त के व्यापक हित के लिए नहीं, वरन् अपने निहित एवं निकृष्ट स्वार्थों के लिए। परिणामस्वरूप, केन्द्रीय व्यवस्था एवं सार्वजनिक जीवन के साथ बिहार की सम्पूर्ण व्यवस्था भी प्रभावित हुए बिना न रही ।
महान् मुगलों के विपरीत उत्तर मुगलों का काल चौमुखी गिरावट का काल रहा है। यह. गिरावट सार्वजनिक एवं लोक जीवन के सभी क्षेत्रों, यथा-राजनीति एवं प्रशासन, समाज एवं संस्कृति, अर्थ एवं उद्योग तथा व्यापार में परिलक्षित होती. है । परिणामस्वरूप, सम्पूर्ण देश के साथ बिहार भी पतनशील जीवन की ओर अग्रसर होता हुआ अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों में जकड़ गया और चौतरफा गिरावट के कुप्रभावों से अब तक नहीं उबर पाया है।
पुस्तक निर्माण में ऐतिहासिक दस्तावेजों जैसे मौलिक साधनों और सन्दर्भ-ग्रन्थों का सहयोग लिया गया है। मुस्लिम एवं यूरोपीय यात्रियों के यात्रा वृतान्तों की मौलिक कृतियों का अध्ययन किया गया है, साथ ही समकालीन एवं आधुनिक इतिहासकारों 'के ग्रंथ भी पढ़े गए हैं। मानक पत्र-पत्रिकाओं, रिपोटों, गजेटियर आदि में भी प्रासंगिक सामग्री को ढूंढ़ने का प्रयास किया गया है।
प्रस्तुत पुस्तक के प्रणयन में मुझे जिन मानक विद्वानों का मार्गदर्शन और आशीर्वाद मिला है, उनमें स्व० (डा०) धनपति पाण्डेय, प्रो० पद्मेश पाठक, डा० के० पी० मिश्र, डा० अमरनाथ सिंह, डा० विजय कुमार ठाकुर, डा० विजय कुमार चौधरी, डा० अनिल कुमार, डा० अरविन्द दास, डा० अजय कु० झा, डा० राजीव कु० सिन्हा, डा० जागरूप चौधरी, डा० डी० एन० राय, डा० विलक्षण रविदास, डा० बहादुर मिश्र आदि के नाम आदरणीय हैं।
पुस्तक-प्रणयन में पूज्य गुरू डा० डी० एन० साह का अनन्य योगदान रहा है। मैं आजीवन उनका आभारी बना रहूँगा। तथ्यों के विश्लेषण, ऐतिहासिक साक्ष्यों के उपयोग और कठिनाइयों में उनका बहुमूल्य सुझाव एवं सहयोग मिला है। उनकी सहायता एवं आशीर्वाद के बिना यह पुस्तक इस रूप में तैयार नहीं हो सकती थी । पुस्तक की पूर्वोक्ति लिखकर उन्होंने ऋण का भार और बढ़ा दिया है। मैं श्रीमती (डा०) शीला साहा का भी हृदय से आभारी हूँ, जिनका स्नेह एवं सहयोग इसे पूरा करने में मिला है। मैं अपने पूज्य ज्येष्ठ भ्राता श्री सीताराम रविदास, मित्र राजेश्वर एवं पत्नी मेनिका के प्रति भी पूर्ण आदर और आभार व्यक्त करता हूँ।
ति० माँ० भागलपुर विश्वविद्यालय, सेंट्रल लाइब्रेरी, भागलपुर, के० पी० जायसवाल रिसर्च इन्स्टीच्यूट, पटना, खुदाबख्श ओरिएन्टल पब्लिक लाईब्रेरी, पटना, लाइब्रेरी, वाराणसी एवं नेशनल लाइब्रेरी, कोलकाता के उच्चाधिकारियों तथा समस्त कर्मचारियों के प्रति मैं हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।
मै उन सभी विद्वानों, मित्रों एवं शुभचिन्तकों के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने मुझे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस पुस्तक के प्रणयन में मेरी सहायता की है।
मैं जानकी प्रकाशन, पटना के श्री नन्द किशोर सिंह का भी हृदय से आभारी हूँ, जिन्होंने अल्पावधि में ही इस पुस्तक को सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रकाशित कर आपलोगों की सेवा में उपस्थित करने का अवसर प्रदान किया ।
अन्त में, जिस परमपिता परमेश्वर की असीम कृपा से यह लेखन कार्य सम्पन्न हुआ है, उसी ईश्वर के चरणों में विनीत प्रणाम के साथ ।
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