लेखक परिचय
श्रवण कुमार त्रिपाठी पिता स्व० श्री प्रेमनारायण त्रिपाठी (मुख्तयार) जन्म विक्रम सम्वत् 1987 श्रावण पूर्णिमा (04.08.1930 सन्) तालबेहट, ललितपुर (उ०प्र०) शिक्षा - एस०पी०आई० इण्टर कालेज, झाँसी से मैट्रीकुलेशन व्यवसाय रिटायर लेखा सहायक वरिष्ठ मण्डल लेखा कार्यालय मध्य रेल, झाँसी प्रकाशित रचनायें - बुन्देलखण्ड की अमर क्रान्ति, राजुल राजमति, जय ओरछा, हरदौल की यशगाथा, क्रान्तिपथ 1857, जेबुन्निशा का सपना-शिवाजी, शिप्रा के तट पर, जाहर पीर, भारतीय रेल इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी अप्रकाशित रचनायें आलोक का पथ, स्मृतियों के घेरे में, बैजू बाबरा, कहानी संग्रह परस्कार केशव शोध संस्थान ओरछा म०प्र० द्वारा केशव पुरस्कार से सम्मानित सन् 1990 स्थायी पता ऋतम्भरा निवास तिवरयाना मुहल्ला तालबेहट 284126, ललितपुर (उ०प्र०)
पुस्तक परिचय
मध्ययुगीन इतिहास में चन्देरी का जौहर भारत के अब तक में इतिहास का अन्तिम जौहर है। जिसका वर्णन बाबरनामा में भी है। मध्य एशिया का बाबर सन् 1527 ई० में खानवा के युद्ध में राणा साँगा को पराजित कर उत्तर भारत का सम्राट बन चुका था, फिर भी राजपूतों की अन्तिम शक्ति का केन्द्र चन्देरी शेष था। भाग्य के धनी बाबर से हिम्मत सिंह नामक राजपूत जा मिला, बुन्देलखण्ड में आज भी देशद्रोही हिम्मत सिंह का नाम घृणा के साथ लिया जाता है। चन्देरी राज के हिम्मत सिंह और अहमद खाँ नामक सरदारों के सहयोग से बाबर ने 15 जनवरी सन् 1528 के दिन चन्देरी पर आक्रमण किया था। बाबर ने इस आक्रमण का वर्णन बाबर नामा में इस प्रकार लिखा है कि उसने चन्देरी को मात्र तीन घड़ी में जीत लिया था। यह वर्णन पूर्णतया एकाकी तथा विजय की आत्मश्लाघा ही है और जो विजेता के बड़प्पन की बड़बोली की भावना से ओतप्रोत है। चन्देरी नगर एवं दुर्ग की सुदृढ़ता का प्रमाण बाबर नामा ही है। बाबर ने दो बार अपने दूत शेख गुरेन और अरयाश खाँ पठान को मेदनीराय खंगार के पास सन्धि करने के लिये भेजा था। इसका कारण चन्देरी की सुदृढ़ भौगोलिक स्थिति ही रही होगी साथ ही मेदनीराय खंगार का सैन्यवल। सन्धि की कुटिल शर्तों को ठुकराकर स्वाभिमानी मेदनीराय खंगार ने स्वाधीनता को ही गले लगाया, राजपूतों ने केसरिया धारण करके स्वतन्त्रता की वेदी पर अपने को अर्पित कर दिया। तब रानी मणिमाला तथा 1500 महिलाओं ने अपने शील सतीत्व की रक्षा के लिये जौहर किया था। चन्देरी का जौहर लोकगीतों में जीवित है, चन्देरी का यह साका साबन के महीने में बुन्देलखण्ड में आज भी गौरव से गाया जाता है।
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