प्राक्कथन
प्रस्तुत उपन्यास सामाजिक परिवेश की यथार्थ घटनाओं का मूर्त रूप है। इसमें स्वतन्त्रता के पश्चात् आर्थिक विकास के बढ़ते चरण में एक ऐसे परिवार की कहानी को मूल रूप दिया गया है। जिसके नायक ने अपने परिवेश में समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने हेतु शिक्षा का अलख जगाया। अपनी पत्नी के साथ सामाजिक कष्टों का दंश झेला। अपना जीवन अभावों में व्यतीत किया। जीवन में भुखमरी के कगार पर भी चेहरे पर विकृति के भाव उत्पन्न होने न दिए। जिस बात पर विवाद बढ़ा उस पर छिनने अथवा लूटने की बजाय उसके त्याग का मार्ग अपनाया। सामाजिक यथार्थ की पृष्ठ भूमि में तत्कालीन आर्थिक सम्पन्न जमीदारों ने उनके धैर्य का लोहा माना। अपनी त्याग एवं स्पष्टवादिता की प्रवृति से समाज के तत्कालीन लोहमर्षक लोगों ने उसे नेता जी कह कर पुकारा। अपनी क्षत्रिय परम्परा में आर्थिक विपन्नता ने एक बार उनकी अर्धागिनी को भाड़ झोंकने पर विवश होना पड़ा परन्तु उन्होंने इस को विधि की बिडम्बना स्वीकार करके करके उस के विष को कण्ठ में रख लिया। वे अपने पूर्वजों के पूर्ण शक्ति सम्पन्न एवं ऐश्वर्य सम्पन्न होने की गाथा सुनते आए थे। परन्तु उन्होंने सम्पूर्ण जमीन जायदाद के किन्हीं कारणों से हाथों से निकल जाने पर उसे लूटने अथवा कब्जा करने की अपेक्षा उसे त्याग दिया। इस बात का खुलासा उन्होंने अपनी सन्तान तक प्रकट न होने दिया। उनके मन की विचारधारा सर्वथा स्वाभिमान से ओत प्रोत रही। भारत में वास्तव में उपन्यास कारों ने अपने उपन्यासों को आकर्षक बनाने हेतु यथार्थ तथ्यों के साथ आदर्श एवं काल्पनिक प्रंसगों का भी समावेश किया। वास्तव में सामाजिक यथार्थ जीवन का एक अहम पहलू है। कई बार आलोचनात्मक व्याख्यानों में उपन्यास में उसका कथानक देश, काल परिस्थिति क्या सचमुच ऐसा रहा होगा जैसा विश्लेषित किया गया है। कुछ हद तक परिस्थितियों का खुलासा तो हुआ परन्तु उपन्यासकारों ने उनमें अपनी मनोवैज्ञानिक विचार धारा का ऐसा सामंजस्य स्थापित किया जैसे दूध में दूध का समावेश कर दिया हो इस उपन्यास में स्वतन्त्रता प्राप्ती के पश्चात् आर्थिक होड में जीवन के अनेक पहलुओं को ध्यान में रखकर लोगों में स्वार्थ, ईर्ष्या, द्वेष जैसे अवगुण उत्पन्न हो गए।
लेखक परिचय
डॉ. चन्द्रभान जन्म : 22 मार्च, 1957 गांव-मांदकौल तह. व जिला- पलवल, हरियाणा शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी), डी.एड., बी.एड., पी-एच.डी. सम्प्राप्ती : सरस्वती पब्लिक प्राथमिक विद्यालय पूर्व नाम एवं वर्तमान आर.पी.एम. पब्लिक प्राथमिक विद्यालय, वार्ड नं. 4, सोहना की स्थापना । रचनाएं : प्रेम की एक अन्य यथार्थ दृष्टि (कहानी) Ethical and Moral Values Among School Children through Education, विरासतों की बिरादरी (सामाजिक उपन्यास), क्रांतिकारी मेवाराम का त्याग और बलिदान (सामाजिक उपन्यास) हिन्दी उपन्यासों में वर्णित सामाजिक उपन्यास (शोध प्रवन्ध) पारिवारिक विवरण : छः पुत्रियां विजय लक्ष्मी, रेणू कुमारी, तरुण, सुमन, पद्मिनी, हिमांशी सभी स्नातकोत्तर, स्नातक, डी.एड., बी.एड. पुत्र-श्री हरिकिशन बी. टेक. कम्प्यूटर साईस ऐ.पी.जे. कालिज सिलानी सोहना । धर्मपत्नी-श्रीमती सरस्वती कुशल गृहणी एवं धार्मिक विदुषी नारी। सस्नेही खुशी, विपिन, गीत, देवांश, भानू एवं तारावती लाइले दोहते-दोहतियां। सम्प्रति : 11 जनवरी 1978 को प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक पद पर नियुक्ति, जनवरी-1992 में मास्टर पद पर, 1988 में डॉक्टर की उपाधि आगरा यूनि. से प्राप्त की। वर्तमान में रा.व.मा.वि. खेडली लाला में मुख्याध्यापक कार्यरत
पुस्तक परिचय
प्रस्तुत उपन्यास सामाजिक परिवेश की यथार्थ घटनाओं का मूर्त रूप है। इसमें स्वतन्त्रता के पश्चात् आर्थिक विकास के बढ़ते चरण में एक ऐसे परिवार की कहानी को मूल रूप दिया गया है। जिसके नायक ने अपने परिवेश में समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने हेतु शिक्षा का अलख जगाया। अपनी पत्नी के साथ सामाजिकं कष्टों का दंश झेला। अपना जीवन अभावों में व्यतीत किया। जीवन में भुखमरी के कगार पर भी चेहरे पर विकृति के भाव उत्पन्न होने न दिए। जिस बात पर विवाद बढ़ा उस पर छिनने अथवा लूटने की वजाय उसके त्याग का मार्ग अपनाया। सामाजिक वथार्थ की पृष्ठ भूमि में तत्कालीन आर्थिक सम्पन्न जमीदारों ने उनके धैर्य का लोहा माना। अपनी त्याग एवं स्पष्टवादिता की प्रवृति से समाज के तत्कालीन लोहमर्षक लोगों ने उसे नेता जी कह कर पुकारा। अपनी क्षत्रिय परम्परा में आर्थिक विपन्नता ने एक बार उनकी अर्धागिनी को भाड़ झोंकने पर विवश होना पड़ा परन्तु उन्होंने इस को विधि की विडम्बना स्वीकार करके करके उस के विष को कण्ठ में रख लिया। वे अपने पूर्वजों के पूर्ण शक्ति सम्पन्न एवं ऐश्वर्य सम्पन्न होने की गाथा सुनते आए थे। परन्तु उन्होंने सम्पूर्ण जमीन जायदाद के किन्हीं कारणों से हाथों से निकल जाने पर उसे लूटने अथवा कब्जा करने की अपेक्षा उसे त्याग दिया। इस बात का खुलासा उन्होंने अपनी सन्तान तक प्रकट न होने दिया। उनके मन की विचारधारा सर्वया स्वाभिमान से ओत प्रोत रही। भारत में वास्तव में उपन्यास कारों ने अपने उपन्यासों को आकर्षक बनाने हेतु यथार्थ तथ्यों के साथ आदर्श एवं काल्पनिक प्रंसगों का भी समावेश किया। वास्तव में सामाजिक यथार्थ जीवन का एक अहम पहलू है। कई बार आलोचनात्मक व्याख्यानों में उपन्यास में उसका कथानक देश, काल परिस्थिति क्या सचमुच ऐसा रहा होगा जैसा विश्लेषित किया गया है। कुछ हद तक परिस्थितियों का खुलासा तो हुआ परन्तु उपन्यासकारों ने उनमें अपनी मनोवैज्ञानिक विचार धारा का ऐसा सामंजस्य स्थापित किया जैसे दूध में दूध का समावेश कर दिया हो।
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