प्राक्कथन
कुछ ऐसा देखने में आ रहा है, कि वैदिक वाङ्गमय द्वारा प्रतिपादित और आदिकाल से प्रचलित आश्रम-धर्म व्यवस्था शिथिल होती जा रही है। विद्या-अध्ययन काल में व्यक्ति (बालक-बालिकायें/ युवक-युवतियाँ) न तो ठीक से ब्रह्मचर्य आश्रम धर्म का पालन करते हैं। और न ही स्त्री-पुरुष गृहस्थाश्रम में गृहस्थ धर्म का। सोलह संस्कारों की बात तो कही जाती है, पर स्थिति यह है, कि तेरहवें संस्कार अर्थात् विवाह संस्कार के पश्चात्, समय पर, न कोई वानप्रस्थ की सोचता है, न वानप्रस्थी बनता है, संन्यास आश्रम तो बहुत दूर की बात रही। चौदहवां और पन्द्रहवां संस्कार, जिनका सम्बन्ध वानप्रस्थाश्रम और संन्यासाश्रम से है, (जिनके क्रियान्वयन में व्यक्ति पर कोई दबाव नहीं है, उसकी अपनी इच्छा ही सर्वोपरि है, इनका पालन हो ही नहीं रहा है। इस प्रकार सोलह संस्कारों में से कितने ही संस्कारों की बिल्कुल अवहेलना तो खुले आम हो रही है। मातुश्री धनदेवी केशवराम धर्मार्थ वैदिक ट्रस्ट (पं०) बरेली, जिसका उद्देश्य अपने शैशव काल से ही वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार एवं रक्षण करना रहा है, इसके ट्रस्टियों ने सोचा, कि आश्रम-धर्म के विषय में जनता को सरलतम रूप में कम से कम पर्याप्त जानकारी तो दी ही जावे, जिससे लोग वैदिक मर्यादाओं के पालन में अधिक से अधिक अपना मन बना सकें। ट्रस्टियों ने यही बात ट्रस्ट के प्राण आर्य संन्यासी महात्मा गोपाल स्वामी सरस्वती जी के सन्मुख रखी, तो श्रद्धेय स्वामी जी तुरन्त इस सम्बन्ध में एक पुस्तक के प्रणयन के लिए तैयार हो गये, जो अब मुद्रित होकर आपके हाथों में है।
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