भूमिका
भक्तिकाल हिंदी साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण युग है, जो लगभग 1350 ई. से 1700 ई. तक माना जाता है। यह काल ईश्वर भक्ति, सामाजिक समानता और आध्यात्मिक चेतना के उत्कर्ष का युग था। इस युग में भक्त कवियों ने धर्म को कर्मकांड और जाति-पांति से निकालकर सीधे प्रेम, श्रद्धा और समर्पण पर आधारित बनाया।
भक्ति का अर्थ
'भक्ति' का अर्थ है ईश्वर के प्रति प्रेम, श्रद्धा और समर्पण।
हिंदू धर्म में भक्ति मार्ग का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है- नवधा भक्ति। 'नव' का अर्थ है नौ और 'भक्ति' का अर्थ है ईश्वर के प्रति प्रेम, श्रद्धा और समर्पण। यह अवधारणा विशेष रूप से गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस (अरण्यकांड) में प्रमुखता से वर्णित है, जहाँ भगवान राम शबरी को भक्ति के नौ रूपों के विषय में बताते हैं।
नवधा भक्ति के नौ रूप
1. श्रवण (श्रवणम्) भगवान की कथाओं को श्रद्धापूर्वक सुनना उदाहरणः परीक्षित ने श्रीमद्भागवत की कथा शुकदेव मुनि से सुनी और मोक्ष प्राप्त किया।
2. कीर्तन (कीर्तनम्) भगवान के नाम, गुण और लीलाओं का गान उदाहरणः तुलसीदास और मीरा बाई जैसे भक्तों ने कीर्तन के माध्यम से भक्ति को जीवंत किया।
3. स्मरण (स्मरणम्) भगवान का निरंतर ध्यान और स्मरण उदाहरणः प्रह्लाद ने हर परिस्थिति में भगवान विष्णु का स्मरण किया।
4. पादसेवन (पादसेवनम्) भगवान के चरणों की सेवा करना उदाहरणः लक्ष्मी जी भगवान विष्णु के चरणों की सेवा करती हैं।
5. अर्चन (अर्चनम्) भगवान की पूजा करना उदाहरण: मंदिरों में पुजारियों द्वारा प्रतिदिन अर्चन किया जाता है।
6. वंदन (वन्दनम्) भगवान को प्रणाम करना और स्तुति करना उदाहरणः अक्रूर ने कृष्ण को नमस्कार कर अपनी भक्ति प्रकट की।
7. दास्य (दास्यम्) स्वयं को भगवान का सेवक मानना उदाहरण: हनुमान जी दास्य भाव के सर्वोच्च प्रतीक हैं।
8. सख्य (सख्यम्) भगवान को अपना मित्र मानना उदाहरणः अर्जुन और श्रीकृष्ण के बीच मित्रता का गहरा संबंध था।
9. आत्मनिवेदन (आत्मनिवेदनम्) स्वयं को पूर्णतः भगवान को समर्पित कर देना
उदाहरणः बली राजा ने अपना सब कुछ भगवान वामन को अर्पित कर दिया।
रामचरितमानस में नवधा भक्ति (अरण्यकांड)
गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में नवधा भक्ति को अधिक व्यावहारिक भावों के रूप में प्रस्तुत किया है। भगवान श्रीराम शबरी को बताते हैं-
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ॥
तीसरि भगति अमान। चौथि भगति मम गुनगन करइ कपट तजि गान ॥
पंचम भजन सो वेद प्राना। षष्ठ दम सील विरति बहु जाना ॥
सातवें सम मोहि मय जग देखा। मोते संत अधिक करि लेखा ॥
आठवै जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहि देखइ परदोषा ॥
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हिय हरष न दीना ॥
इन नव भावों को अपनाने वाला भक्त भगवान को परम प्रिय होता है।
नवधा भक्ति एक दिव्य मार्ग है जो व्यक्ति को ईश्वर के समीप लाता है। यह मार्ग हमें सिखाता है कि श्रवण, कीर्तन, स्मरण, सेवा, पूजा, वंदन, सेवा भाव, मित्रता और आत्मसमर्पण के द्वारा भी हम ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रवृत्ति और क्षमता अनुसार इनमें से किसी भी भक्ति मार्ग को अपनाकर ईश्वर की कृपा पा सकता है।
ऐतिहासिक संदर्भ
समाज जाति-भेद, कर्मकांड और धार्मिक पाखंड से ग्रस्त था।
आम आदमी धर्म से दूर हो गया था, क्योंकि धार्मिक ग्रंथ संस्कृत में थे।
भक्ति आंदोलन ने इन बाधाओं को तोड़ा और लोकभाषाओं में भक्ति साहित्य रचकर धर्म को जन-जन से जोड़ा।
मुख्य विशेषताएँ
1. ईश्वर की भक्ति का प्रचारः
ईश्वर को प्रेम और समर्पण से पाने की भावना।
2. सामाजिक समताः
जातिवाद, ऊँच-नीच और छुआछूत का विरोध।
3. लोकभाषाओं में रचनाः
ब्रज, अवधी, मैथिली, पंजाबी, मराठी, राजस्थानी आदि में काव्य रचना।
4. संत परंपरा का विकासः
निर्गुण और सगुण भक्ति की दो धाराओं का उदय।
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