प्राक्कथन
बुन्देलखण्ड का भू-भाग प्राचीन काल से ही अपनी प्राकृतिक, ऐतिहासिक, मूर्तिशिल्प, चित्रकला, शैलचित्र, स्थापत्यशिल्प एवं भाषाई (बुन्देली) संस्कृति के कारण अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता चला आ रहा है। यद्यपि बुन्देलखण्ड कभी भी एक राजनीतिक इकाई नहीं रहा। फिर भी एक प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक इकाई के रूप में इसका अपना विशिष्ट अस्तित्व बना रहा। इस क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत, उपासना पद्धतियों एवं क्षेत्रीय विशेषताओं के कारण बुन्देलखण्ड अंचल की सांस्कृतिक विरासत, भारतीय सांस्कृतिक विरासत में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। 'बुन्देलखण्ड', मध्य भारत का एक प्राचीन ऐतिहासिक क्षेत्र है। बुन्देलखण्ड के विस्तृत भू-भाग पर विभिन्न कालों में अनेक राजवंशों के शासकों का शासन रहा है। प्राचीन बुन्देलखण्ड का क्षेत्र पौराणिक काल का चेदि जनपद था। इस भू-भाग पर मौर्य, शुंग, शक, हुण, कुषाण, नागवंश, वाकाटक, गुप्त, कलचुरि, प्रतिहार, चन्देल, परमार और बुन्देला वंश के शासकों ने शासन किया। इसके बाद बुन्देलखण्ड के इतिहास में अफगानों, गौड़ों, मराठों, और अंग्रेजों के शासन का भी उल्लेख मिलता है। बुन्देलखण्ड का नाम समय-समय पर बदलता रहा है। पहले यह भू-भाग चेदि देश, दशार्ण देश, जैजाकमुक्ति, जुझीति तथा जुझारखण्ड नाम से जाना जाता था। बुन्देलखण्ड' नाम से ही विदित होता है कि 'बुन्देला' शासकों द्वारा स्थापित राज्य के विस्तृत क्षेत्र को 'बुन्देलखण्ड' कहा जाता है। वर्तमान बुन्देलखण्ड में मध्य प्रदेश के सागर, दमोह, पन्ना, छतरपुर, टीकममढ़, निवाड़ी और दतिया जिले तथा उत्तर प्रदेश के झाँसी, ललितपुर, चित्रकूट, बाँदा, महोबा, हमीरपुर और जालौन जिले सम्मिलित हैं। प्रागैतिहासिक मानव ने यहाँ के शैलाश्रयों में शरण ली थी और इनमें यत्र-तत्र चित्रकारी कर अपने बुद्धि कौशल का परिचय दिया। इन शैलचित्रों से शैलाश्रयों में निवास करने वाले मानव जीवन के विविध पक्ष उद्घाटित हुए हैं। अनेक स्थलों से आदिमानवों द्वारा निर्मित व प्रयोग में लाये गये पत्थर के औजार बड़ी संख्या में मिले हैं। परवर्ती हड़प्पाकालीन सभ्यताओं में से ताम्रपाषाणयुगीन संस्कृति का विकास बुन्देलखण्ड के एरण क्षेत्र में आज से चार हजार दो सौ वर्ष पहले हुआ था।एरण, गुप्त साम्राज्य की क्षेत्रीय राजधानी थी, जहाँ से समुद्रगुप्त और उसके वंशजों के अभिलेख मिले हैं. जो इसके महत्व को दर्शाते हैं। बुन्देलखण्ड के विभिन्न अंचलों में बहुसंख्यक सिक्के और अभिलेख, प्राचीन दुर्ग, देवमंदिर, देव प्रतिमाएँ दृष्टव्य है, जिनके द्वारा बुन्देलखण्ड की संस्कृति, धर्म, कला का स्वरूप, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक इतिहास उद्घाटित हुआ है। चित्रकूट, कालिंजर और त्रिपुरी जैसे प्राचीन महत्त्वपूर्ण केन्द्र बुन्देलखण्ड में ही स्थित हैं। इनमें त्रिपुरी और कालिंजर भगवान शिव से तथा चित्रकूट भगवान राम से सम्बन्धित है। सोनागिर कुण्डलपुर, नैनागिर तथा बीना जी (देवरी) जैसे प्रसिद्ध प्राचीन जैनतीर्थ बुन्देलखण्ड की साँझा सस्कृति के सूचक है। देवगढ़, नचना कुठारा और एरण के गुप्तकालीन मंदिरों और मूर्तियों, खजुराहो, ओरछा, नोहटा और त्रिपुरी के मध्यकालीन मंदिरों एवं मूर्तिशिल्प के लिए कलावशेष विश्व प्रसिद्ध हैं। कालिंजर अजयगढ़, झांसी, धामोनी, राहतगढ़, गढ़पहरा, गढ़ाकोटा, सिंगौरगढ़ जैसे सुदृढ़ और ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़े दुर्ग इस अंचल में हैं। बुन्देलखण्ड की लोककला मनभावन है। लोकगीतों की अनुगूँज सारी दुनिया में व्याप्त है। अपनी भौगोलिक स्थिति तथा समृद्ध परम्परा के कारण बुन्देलखण्ड में विशिष्ट लोक संस्कृति का निर्माण हुआ। यहाँ के लोकजीवन में उन उदात्त गुणों की झलक मिलती है, जो जीवान्त सभ्यता के परिचायक हैं। बुन्देलखण्ड का नू-भाग आदिकाल से ही अपने अंचल में विभिन्न युगों की सांस्कृतिक विरासत को संजोये रहा है। इस क्षेत्र में विभित्र संस्कृतियाँ पुष्पित और पल्लिवित हुई। बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत के विविध पक्षों को उद्घाटित करने के लिये भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् (ICSSR) नई दिल्ली की वित्तीय सहायता से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तत्त्व विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर द्वारा विश्वविद्यालय में स्थित पुरातत्व संग्रहालय में 17-18 फरवरी, 2022 में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। जिसमें बुंदेलखण्ड के सांस्कृतिक विरासत के विविध पक्षों, साहित्यिक परम्परा, कला-स्थापत्य, समाज, धर्म, पर्यटन, आदि विविध पक्षों पर केन्द्रित शोध पत्र प्रस्तुत किये गये। इस ग्रंथ में बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत को उदघाटित करने वाले शोधपत्रों को सम्मिलित किया गया है।
लेखक परिचय
प्रो. नागेश दुबे ने स्नात्कोत्तर एवं पीएच.डी. की उपाधि प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) से प्राप्त कर वर्ष 1998 में इसी विभाग में सहायक प्राध्यापक पद पर कार्यभार ग्रहण किया। अकादमिक कार्यों के साथ ही वर्ष 2014 से निरन्तर इस विभाग में विभागाध्यक्ष पद का भी निर्वहन कर रहे हैं। इनकी विषय विशेषज्ञता प्राचीन भारतीय सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास तथा भारतीय कला एवं स्थापत्य है। इन्होंने अनेक पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों एवं उत्खननों में भी सहभगिता की है। इनकी आठ पुस्तकें प्रकाशित हैं। इन्होंने सात राष्ट्रीय संगोष्ठियों का सफल आयोजन आपके निर्देशन में करवाया है तथा सौ से अधिक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में सहभागिता भी की है। इनके 60 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हैं। इनके शोध निर्देशन में 20 शोधार्थियों ने शोधकार्य पूर्ण किया है। इनके निर्देशन में ही संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा विभागीय संग्रहालय के लिए स्वीकृत परियोजना का भी संचालन किया जा रहा है। प्रो. नागेश दुबे को श्यामलम संस्थान, सागर द्वारा विवेकदत्त झा पुरातत्त्व एवं संस्कृति सम्मान', वर्ष 2023, सागर जिला पुरातत्त्व पर्यटन एवं संस्कृति परिषद् द्वारा 'पर्यटन एवं संस्कृति सम्मान, वर्ष 2024 तथा स्वामी विवेकानन्द विश्वविद्यालय, सागर द्वारा 'लाईफ टाईम अचीवमेंट अवार्ड', वर्ष 2025 से भी समानित किया गया।
डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन ने प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय (उ.प्र.) से स्नातकोत्तर तथा प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। इन्होंने 'पुरातत्त्व विषय में यूजीसी नेट परीक्षा पास की है। इन्होंने संग्रहालय विज्ञान, प्रागैतिहास, शैलचित्र कला, पुरातात्त्विक उत्खनन एवं अन्वेषण में विशेषज्ञता हासिल की है। इनके द्वारा अशोकनगर जिले में विद्यमान 50 से अधिक नवीन पुरास्थलों सहित 6.6 करोड़ वर्ष पुराने जीवश्मों की भी खोज की गई। विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में इनके 15 से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हैं। इनकी तीन संपादित पुस्तकें भी प्रकाशित हैं। उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों / सम्मेलनों में 30 से अधिक शोध पत्र भी प्रस्तुत किए हैं। इनके द्वारा एक-एक राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं राष्ट्रीय वेबिनार का भी सफल आयोजन कराया गया है। आप वर्तमान में शासकीय महाविद्यालय, शाढौरा, जिला अशोकनगर, मध्य प्रदेश में इतिहास विभाग में सहायक प्राध्यापक (अतिथि विद्वान) के रूप में कार्यरत हैं।
पुस्तक परिचय
बुन्देलखण्ड का भू-भाग प्राचीन काल से ही अपनी प्राकृतिक, ऐतिहासिक, मूर्तिशिल्प, चित्रकला, शैलचित्र स्थापत्यशिल्प एवं भाषाई (बुन्देली) संस्कृति के कारण अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता चला आ रहा है। 'बुन्देलखण्ड', मध्य भारत का एक प्राचीन ऐतिहासिक क्षेत्र है। बुन्देलखण्ड के विस्तृत भू-भाग पर विभिन्न कालों में अनेक राजवंशों के शासकों का शासन रहा है। बुन्देलखण्ड' का नाम समय-समय पर बदलता रहा है। पहले यह भू-भाग चेदि देश, दशार्ण देश, जैजाकभुक्ति, जुझौति तथा जुझारखण्ड नाम से जाना जाता था। वर्तमान बुन्देलखण्ड में मध्य प्रदेश के सागर, दमोह, पन्ना, छतरपुर, टीकममढ़, निवाड़ी और दतिया जिले तथा उत्तर प्रदेश झाँसी, ललितपुर, चित्रकूट, बाँदा, महोबा, हमीरपुर और जालौन जिले सम्मिलित हैं। बुंदेलखंड के विभिन्न अंचलों में बहुसंख्यक सिक्के और अभिलेख, प्राचीन दुर्ग, देवमंदिर, देव प्रतिमाएँ दृष्टव्य हैं, जिनके द्वारा बुन्देलखण्ड की संस्कृति, धर्म, कला का स्वरूप, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक इतिहास उद्घाटित हुआ है। बुंदेलखंड की लोककला मनभावन है। लोकगीतों की अनुगूँज सारी दुनिया में व्याप्त है। बुंदेलखंड का भू-भाग आदिकाल से ही अपने अंचल में विभिन्न युगों की सांस्कृतिक विरासत को संजोये रहा है। बुंदेलखण्ड के सांस्कृतिक विरासत, साहित्यिक परम्परा, कला-स्थापत्य, समाज, धर्म, पर्यटन, आदि विविध पक्षों पर केन्द्रित शोध पत्रों को इस ग्रन्थ में सम्मिलित किया गया है।
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