बिना सृजन के हम कोई विशेष उपलब्धि नहीं प्राप्त कर सकते। सृजनशीलता सतत् अभ्यास से आती है और मन-मस्तिष्क में सृजनता एक अलग विचार से उत्पन्न होती है। एक नवीन विचार को हम अपने कौशल से बेहतर बना सकते हैं। मानव के भाव और विचार को व्यक्त करने के लिए भाषा का प्रयोग हुआ है। लिखित भाषा को व्यक्त करने से पूर्व मनुष्य आंगिक और वाचिक भाषा का प्रयोग करता था। अमौखिक संचार से ही वह अभिव्यक्त करता रहा है, तब जाकर लिखित भाषा के प्रयोग से मनुष्य अपनी संवेदनओं की भाषा में सुरक्षित रखना सीख सका। मुक्त रचना का वास्तविक रूप सृजनात्मक रचनाओं में ही देखने को मिलता है। इन रचनाओं में विशेष रूप से सृजनात्मक अभिव्यक्ति का विशेष महत्व है और इनमें कलात्मकता, मौलिकता, लालित्य एवं अनुरंजकता आवश्यक है। सृजनात्मक अभिव्यक्ति सामान्य रूप की अभिव्यक्ति न होकर विशिष्ट अभिव्यक्ति है। जिससे पाठक की सौंदर्यप्रियता की भावना को दृष्टि मिलती है। सृजनात्मकता मानव के क्रियाकलापों तथा निष्पत्ति हेतु जरूरी है। बिने के अनुसार, 'एक व्यक्ति लकड़ी से मनचाही कलात्मक वस्तु बना सकता है। चित्रकार मनचाहे रंगों से चित्र की सजीवता प्रकट कर सकता है। इसी मूर्तिकार एवं वास्तुविद् भी अपनी कलाओं की छाप छोड़ते हैं यही तो 'सृजनात्मकता' है। सृजनात्मकता को अंग्रेजी भाषा में 'क्रिएटिविटी' कहते हैं। 'क्रिएटिविटी' शब्द का हिंदी पर्याय उत्पादन से है। कोई ऐसा कार्य जिसका परिणाम नया हो एवं वह शिरोधार्य हो उसे हम 'सृजनात्मकता' से जोड़ते हैं। यह एक नवीन विचार और एक नया उत्पादन है। सृजनात्मकता में मौलिकता, नवीनता, अनुकूलता होती है। यह रचनात्मक योग्यता का परिणाम है। सृजनात्मकता में निरंतर नवीनता का सृजन होना चाहिए। सृजनात्मकता कार्य द्वारा व्यक्ति की प्रतिभा का विकास होना जरूरी है। सृजनात्मकता में सृजनात्मकता स्तर, बौद्धिक स्तर, मापन योग्य व्यवहार, मौलिकता, नवीनता, माध्यम, साहस, सामाजिक स्वीकृति, प्रवीणता आदि तत्वों का होना आवश्यक है।
सृजनात्मकता के बल पर हम मौलिक संभावनाओं को विकसित कर सकते हैं। विद्यार्थियों के लिए सृजनात्मकता होना आवश्यक है। बालकों में चितन एवं मौलिक अभिव्यक्ति की दृष्टि से सृजनात्मकता बहुत महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है। शिक्षा के साथ-साथ सभी कार्यों में सृजनात्मकता का होना बहुत जरूरी है। यह मौलिकता और नवीनता के गुणों का विकास करने के लिए महत्वपूर्ण होती है। इससे चिंतन की इच्छा विकसित होती है। सृजनात्मकता में संवेदनशीलता और गंभीरता के लक्षण विद्यमान रहते हैं। यह परंपरागत धारणा को नवीन सिरे से लेकर आगे की प्रवृत्ति की ओर उन्मुख करती है। यह वास्तविकता और व्यावहारिकता को विकसित करती है। यह दूरदर्शिता के लिए महत्वपूर्ण है और यह धैर्य बढ़ाती है। यह निर्णय लेने की क्षमता का विकास करती है। इन सभी दृष्टियों से यह पुस्तक छात्रों को दिशा देगी। इस पुस्तक को अध्यायों में बांटा गया है। विद्यार्थी सृजनात्मकता एवं सृजनात्मक साहित्य से परिचित होकर मीडिया आदि क्षेत्रों में अपना भविष्य खोज सकते हैं। यदि यह छात्रों के ज्ञान का बढ़ाती है तो मेरे लिए यह उपलब्धि ही होगी।
इस पुस्तक के प्रकाशक का मैं हृदय की गहराईयों से धन्यवाद अदा करता हूँ। अंत में उन सभी लेखक, विद्वानों, शोधकों का आभारी हूँ जिनके भाव-विचार इस पुस्तक में समाहित हो सके हैं।
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