One of the most important books ever written on the Emergency. It covers not just politics, but the 'unheard' history, lived through by the author as an active journalist and eyewitness. Stories of adventure, courage, and struggle that will captivate the reader.
'इमरजेंसी की अनसुनी कहानियाँ' ऐसी पुस्तक है, जो इस विषय की पुस्तकों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी। इसके दो कारण मुझे समझ में आते हैं। पहला कारण स्वयं शीला झुनझुनवाला जी हैं। इसे जितना मैं समझ पा रहा हूँ, उतना दूसरे को भी जानना चाहिए। उससे ज्यादा कोई जान सके, तो अच्छी बात होगी। पत्रकारिता में शीला झुनझुनवाला एक बड़े हस्ताक्षर के रूप में जानी जाती हैं। उन्हें इसी रूप में याद किया जाता है। वे साप्ताहिक हिंदुस्तान की संपादक थीं। उनकी अनेक पुस्तकें हैं। वर्ष 2023 में उनका नया उपन्यास 'पतझड़ में वसंत' आया। इसी से दूसरा कारण उत्पन्न होता है। वे अपने सक्रिय और स्वस्थ जीवन के सौवें साल में प्रवेश कर गई हैं। फिर भी लिखना-पढ़ना उनका जारी है। इसका प्रमाण यह पुस्तक है जो उनके संग्रहों से निकली है। इमरजेंसी के 50 साल हो गए हैं। उन दिनों शीला जी सक्रिय पत्रकार थीं। एक पत्रकार के रूप में उन्होंने इमरजेंसी को देखा और उसे समझा। एक दुर्लभ संयोग भी उनके जीवन में रहा है। वे टी.पी. झुनझुनवाला की पत्नी हैं। एक समय ऐसा था जब टी.पी. झुनझुनवाला को कौन नहीं जानता था! इसलिए नहीं कि वे इनकम टैक्स के ऊँचे अफसर थे, बल्कि अपनी ईमानदारी से समाज और शासन में उन्होंने अपने लिए आदर का स्थान बनाया था। यहाँ टी. पी. झनझुनवाला का उल्लेख मैंने जान-बूझकर किया है। इमरजेंसी के दौरान वे प्रत्यक्ष कर बोर्ड में ऊँचे पद पर थे। उस दौरान महारानी गायत्री देवी के महल में आयकर की जो तलाशी हई, उसका वर्णन इस पुस्तक के दो अध्यायों में विस्तार से है। यह ऐसा वर्णन है जो अन्यत्र किसी पुस्तक में मेरी जानकारी में तो नहीं है। जितनी भी पुस्तकें इमरजेंसी पर आई हैं, उनमें ज्यादातर को मैंने पढ़ा है। इस आधार पर यह कह सकता हूँ कि इस पुस्तक के जो दो अध्याय हैं, वे सचमुच अनसुनी कहानियों की श्रेणी में आते हैं। पहला अध्याय है, 'जयपुर में खजाने की खोज'। दूसरा अध्याय है, 'जयगढ़ खजाने का रहस्य'। ये दोनों अध्याय इस पुस्तक को अनोखा बना देते हैं। इसे शीला जी ने जिस तरह से लिखा है, वह बहुत रोचक है। उनकी वर्णानात्मक शैली पाठक को बाँधकर रखती है। उसमें पत्रकारिता के हर मानदंड हैं और उपन्यास शैली का पठनीय साहित्य भी है। इमरजेंसी पर नई पुस्तकें अनेक आई हैं। पुरानी पुस्तकों में जयपुर की महारानी गायत्री देवी के बारे में प्रसंगवश यह विवरण तो मिलता है कि उन्हें गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल के एक बहुत छोटे कमरे में रखा गया था। जहाँ रखा गया था वह बदबूदार जगह थी। उस कमरे के पास खुला हुआ गंदा नाला था। वहाँ उन्हें जब रोग हो गया तब बड़ी कठिनाई से पेरोल पर छोड़ा गया। लेकिन किसी पुस्तक में इसका वर्णन नहीं मिलता कि कैसे, कब और कितनी तैयारी से आयकर विभाग की बड़ी फौज ने उन किलों को खोदा और खजाने की कुछ खोज की। कई जगह उन्हें भरपूर खजाने मिले। कई जगहों पर सिर्फ सपने मिले। शीला जी की पुस्तक में दो अध्याय उस कहानी को पूरा करते हैं। वे स्वयं वहाँ गई थीं। इसका विवरण भी है। उन्होंने लिखा है कि 'आपातकाल के दिनों की ही बात है जब जयपुर राजघराने की अघोषित संपत्ति की तलाशी हुई थी। आयकर विभाग के इन छापों में बहुत कुछ मिला था, बड़ी सनसनीखेज कहानी थी इन छापों की। जयपुर के राजमहलों के बाद जयगढ़ में खजाने की खोज का सिलसिला शुरू हुआ था। इन तलाशियों के दौरान मैंने बहुत लोगों से बात की थी। नोट्स बनाए थे। स्वयं कई बार जयपुर और जयगढ़ गई थीं।' उन्होंने 'जयपुर के खजाने की खोज' अध्याय में तलाशी का वर्णन करने से पहले अपने पाठकों की जानकारी के लिए वह इतिहास लिखा है जो कई पुस्तकें पढ़ने के बाद किसी को प्राप्त हो सकेगा। जयपुर नगर कब और किसने बसाया। कौन थे सलाहकार। यहाँ से शुरू कर किले का भूगोल तो बताया ही है, यह भी बताया है कि महारानी गायत्री देवी राजवंश में किस क्रम में आती थीं। उनका निवास कहाँ था और क्यों था। वह कब से था। उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि भी वे बताती हैं। जिसे पढ़कर महारानी गायत्री देवी के प्रति आदर उत्पन्न होता है क्योंकि लोकतंत्र के लिए उन्होंने बंदी जीवन स्वीकार किया। झुकी नहीं, लोकतंत्र के लिए लड़ीं। इस तरह गायत्री देवी के बारे में जितनी जानकारी चाहिए वह इस पुस्तक में प्रसंगवश आ गई है। उसके बाद तलाशी का जहाँ वर्णन है वहीं यह सूचना भी है कि उस समय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष एस.आर. मेहता थे। टी.पी. झुनझुनवाला उनके सहयोगी थे।
इंदिराजी में यदि थोड़ी भी सूझ-बूझ, पद की गरिमा और त्याग की भावना होती तो 25 जून, 1975 को 10 बजकर 20 मिनट पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया था और वे 10 बजकर 30 मिनट पर राष्ट्रपति के सामने अपना त्यागपत्र प्रेषित कर देतीं तो इतिहास में वे सदा के लिए अमर हो जातीं। विदेशों की बात हम छोड़ दें तो हमारे देश में ही कई मौकों पर यह त्यागवृत्ति दिखलाई गई है। लालबहादुर शास्त्री ने एक रेल दुर्घटना के बाद इस्तीफा दे दिया था। डॉ. सम्पूर्णानन्द ने संस्था के चुनावों में हार जाने पर मुख्यमंत्री का पद छोड़ दिया था। जॉन मथाई ने बजट की गोपनीयता भंग होने पर वित्तमंत्री पद पर बने रहना अनैतिक समझा था। नीलम संजीव रेड्डी बसों के मामले में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले के बाद तुरन्त हट गये थे। स्वयं इंदिरा गांधी ने अपने मंत्रिमंडल के एक सदस्य डॉ. चेन्ना रेड्डी की चुनाव याचिका खारिज होने पर उन्हें अविलम्ब कार्यमुक्त कर दिया था। एक हवाई दुर्घटना के कारण डॉ. कर्ण सिंह ने भी अपना त्यागपत्र प्रेषित किया था। तब फिर इंदिरा गांधी को स्वयं किस नैतिकता ने पद पर बने रहने को बाध्य किया? रह-रह कर यह प्रश्न मेरे मन में किसी ज्वार-भाटे के समान उठता रहता है।
शीला झुनझुनवाला बरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं संपादक पद्मश्री शीला झुनझुनवाला का नाम हिन्दी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। 6 जनवरी 1927 को कानपुर, (उ. प्र.) में जन्म। एम. ए. (अर्थशास्त्र) एवं एल.टी. की अकादमिक उपाधियों के अतिरिक्त, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से 'साहित्य रत्न' एवं प्रयाग महिला विद्यापीठ से 'विदुषी आनर्स' करने के पश्चात् उनकी पत्रकारिता की यात्रा प्रारम्भहुई। टाइम्स आफ इण्डिया प्रकाशन समूह के प्रतिष्ठित साप्ताहिक 'धर्मयुग' के महिला-पृष्ठों का कुशल संपादन करने के उपरांत वे दिल्ली से प्रकाशित महिला पत्रिका 'अंगजा' की संपादक रहीं। तदुपरांत हिंदुस्तान टाइम्स समूह की पत्रिका 'कादम्बिनी' में संयुक्त संपादक, दैनिक पत्र 'हिंदुस्तान' की संयुक्त संपादक और अंततः हिंदुस्तान टाइम्स समूह की प्रतिष्ठित पत्रिका 'साप्ताहिक हिंदुस्तान' की मुख्य संपादक बनीं। इस प्रकार दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्र-पत्रिकाओं के संपादन का भरपूर अनुभव रहा। 'मनी मैटर्स' पत्रिका की कार्यकारी संपादक भी रहीं। दृश्य जगत में अनेक नाटकों एवं फिल्मों का पटकथा-लेखन भी किया। उनके लिखे उपन्यास, कहानी, यात्रावृत और बाल साहित्य का एक बड़ा पाठक वर्ग है। प्रमुख कृतियां 'कोने वाला कमरा', 'अर्थ चक्र', 'इंदिरा जी की कहानी', 'अस्त्र-शस्त्र की कहानी', 'एक नया सूरज', 'सिने सितारों के अनछुए प्रसंग', 'कुछ कही कुछ अनकही', 'सांस्कृतिक विरासत के धनी भारत और जापान', 'चेरी फूले मधुमास' आदि । बढ़ती उम्र की समस्याओं पर आधारित उपन्यास 'पतझड़ में वसंत' पिछले वर्ष वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ है। 'यादों के गलियारों से' चर्चित साहित्यकारों के संस्मरण पर आधारित एक पुस्तक प्रकाशनाधीन है। प्रमुख पुरस्कार : मातृश्री पुरस्कार, बाल साहित्य कृति सम्मान (हिन्दी अकादमी), साहित्यकार सम्मान (हिन्दी अकादमी), पंडित अम्बिका प्रसाद बाजपेयी सम्मान (उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन), लोहिया पुरस्कार (अखिल भारतीय युवा अग्रवाल), लल्लेश्वरी शारदा सम्मान (हिन्दी कश्मीरी संगम), पत्रकारिता भूषण सम्मान (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान), गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार (केन्द्रीय हिन्दी संस्थान), शिखर सम्मान (हिन्दी अकादमी) आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, 1991 में भारत सरकार द्वारा वे 'पद्मश्री' अलंकरण से भी विभूषित हो चुकी हैं। संप्रति : शीला टी. पी. झुनझुनवाला फाउंडेशन, प्रियदर्शिनी, सूर्या संस्थान, पी.एच.डी. फॅमिली वेलफेयर फाउंडेशन जैसी अनेक सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं से सम्बद्ध .
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