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बिहार का पर्यावरण दशा एवं दिशा- Environmental Condition and Direction of Bihar

$35
Includes any tariffs and taxes
Specifications
Publisher: JANAKI PRAKASHAN, PATNA
Author Jose Kalapura, Neeraj Kumar
Language: Hindi Text
Pages: 216
Cover: Hardcover
9.00x6.00 inch
Weight 410 gm
Edition: 2017
ISBN: 9789384767884
BA0605
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Book Description

 

पुस्तक परिचय


प्राचीन काल में प्रकृति और मानव के बीच एक संतुलन था। परन्तु मानव की जीवनशैली में आए बदलाव ने प्रकृति को संकट में डाल दिया है। आज पर्यावरण दुनिया का सबसे ज्वलंत मुद्दा बन चुका है। पूरी दुनिया में इस पर चिंता जतायी जा रही है। स्थानीय स्तर पर भी पर्यावरण संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है लेकिन इसके प्रति जागरूकता का अभाव है। इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए जेवियर इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल रिसर्च ने स्थानीय मुद्दे को ध्यान में रखते हुए राज्य के पर्यावरण संकट एवं उसके समाधान के उपाय पर आधारित एक पुस्तक प्रकाशित किया है। वैसे तो राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण को लेकर कई पुस्तकें प्रकाशित की गई है लेकिन बिहार के पर्यावरण पर आधारित संभवतः यह पहली पुस्तक है जिसमें प्रदेश के प्राकृतिक धरोहरों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। यह पुस्तक पूर्ण रूप से बिहार के भौगोलिक वातावरण पर आधारित है। पुस्तक में राज्य की नदियों, तालाबों, ताल, आहर, पईन, पोखर, पहाड़ों और जंगलों की चर्चा की गई है। राज्य में लुप्त हो रही पौधों एवं फसलों की प्रजातियाँ, संकटग्रस्त पशुओं के ब्रीड आदि को भी प्रमुखता से उठाया गया है। उम्मीद है कि इस पुस्तक से राज्य के पर्यावरण संकट के बारे में राज्य के लोगों में सामाजिक चेतना पैदा करने में काफी मदद मिलेगी। खासकर स्कूलों एवं कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों को इस पुस्तक से काफी लाभ मिलने की आशा है।

 

 

लेखक परिचय-1


डॉ० जोस कलापुरा ने पूणे विश्वविद्यालय से इतिहास में एम०ए० और नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एम०फिल और पी०एचडी प्राप्त की। उन्होंने 15 पुस्तकों के अलावा 85 शोधपत्र लिखे हैं। संप्रति जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल रिसर्च, पटना के निदेशक।

 

 

लेखक परिचय-2


नीरज कुमार, जन्म 15 मई 19761 शिक्षा- स्नातक (इतिहास), मगध विश्व विद्यालय। पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में कार्यरत कई सामाजिक संगठनों से जुड़कर सामाजिक मुद्दों पर योगदान दिया। पर्यावरण संरक्षण के लिए तरूमित्र आश्रम से मिलकर 15 वर्षों तक अभियान चलाया। समाज के दलित महिला एवं बाल अधिकार पर पुस्तक प्रकाशित। पर्यावरण और कृषि के क्षेत्र में 1000 से अधिक यूज रिपोर्ट और लेख प्रकाशित।

 

 

प्राक्कथन


मानव आदि काल से प्रकृति की गोद में खेलता रहा है। प्रकृति भी हजारों वर्षों से मानव जाति का भरण-पोषण करती रही है। लेकिन काल के करवट बदलने के साथ-साथ परिस्थितियाँ भी बदलती रहीं। वर्षों पहले शुरू हुई औद्योगिक क्रांति और शहरीकरण ने प्रकृति को काफी नुकसान पहुँचाया है। औद्योगिक क्रांति ने एक तरफ जहाँ मानव जाति को विकास की दिशा दिखाई, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण को काफी क्षति पहुँचाई है। प्रकृति पर मंडरा रहे पर्यावरण संकट के बादल ने वर्तमान में मानव जाति की चिंता काफी बढ़ा दी है और पर्यावरण संकट दुनियाभर का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। इस मुद्दे पर अधिकांश राष्ट्रों ने चिंता व्यक्त की है। संकट का समाधान निकालने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नीतियाँ बनाई जा रही हैं। लोगों में धीरे-धीरे पयावरण संकट के प्रति जागरूकता भी आ रही है और उसके समाधान के उपाय किये जा रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर भी पर्यावरण संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है लेकिन इसके प्रति जागरूकता का अभाव है। इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए जेवियर इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल रिसर्च ने स्थानीय मुद्दे को ध्यान में रखते हुए राज्य के पर्यावरण संकट एवं उसके समाधान के उपाय पर आधारित एक पुस्तक प्रकाशित किया है। वैसे तो राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण को लेकर कई पुस्तकें प्रकाशित की गई है लेकिन बिहार के पर्यावरण पर आधारित संभवतः यह पहली पुस्तक है जिसमें प्रदेश के प्राकृतिक धरोहरों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। यह पुस्तक पूर्ण रूप से बिहार के भौगोलिक वातावरण पर आधारित है।

 

 

आमुख एवं आभार


मानव आदि काल से ही प्रकृति प्रेमी रहा है। प्रकृति और मानव एक-दूसरे के पूरक हैं। मनुष्य एवं प्रकृति को सृष्टि का निर्माणकर्ता कहा जाता है। प्राचीन काल में प्रकृति और मानव के बीच एक संतुलन था। परन्तु मानव की जीवनशैली में आए बदलाव ने प्रकृति को संकट में डाल दिया है। प्रकृति और मनुष्य में दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। विकास की दिशा में मानव ने जैसे-जैसे कदम बढ़ाना शुरू किया, प्रकृति पर संकट के बादल मंडराते गए। विकास के साथ-साथ मानव की लालच भी बढ़ती गयी। प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है और धरती की जैवविविधता तेजी से नष्ट हो रही है।
आज पर्यावरण दुनिया का सबसे ज्वलंत मुद्दा बन चुका है। पूरी दुनिया में इस पर चिंता जतायी जा रही है। पर्यावरण में बढ़ते प्रदूषण के कारण जलवायु में बदलाव हो रहा है। जलवायु में परिवर्तन से मौसम चक्र भी प्रभावित होने लगा है। वातावरण में दिनोंदिन गर्मी बढ़ती जा रही है जबकि जाड़ा व बरसात कम होने लगी है। इसका असर फसलों की पैदावार पर पड़ने लगा है। पैदावार में कमी भविष्य के लिए गंभीर खतरे का संकेत है। मौसम में बदलाव के कारण कई नयी-नयी बीमारियाँ पैर पसारने लगी हैं। पर्यावरण का मानव जीवन पर गहरा प्रभाव है। दोनों में संतुलन होना बहुत जरूरी है।
पर्यावरण पर कई पुस्तकें प्रकाशित हुईं हैं। पर्यावरण शिक्षा कॉलेज एवं स्कूलों के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया जा चुका है। देश के पर्यावरण पर अब तक कई पुस्तकें प्रकाशित की गयी हैं लेकिन बिहार के पर्यावरण पर गुणवत्तापरक पुस्तक की कमी हमेशा खलती थी।

 

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