श्रीमद्भगवद्गीता न केवल एक धर्मग्रंथ है, बल्कि मानव जीवन की हर जटिल समस्या का शाश्वत समाधान प्रस्तुत करने वाला एक मार्गदर्शक है। लेखिका आशा कुमारी द्वारा रचित 'गीतामृतम् - एक शाश्वत जीवन दर्शन' पुस्तक इसी दिव्य ज्ञान को सरल और व्यावहारिक रूप में पाठकों तक पहुँचाने का एक विनम्र प्रयास है।
यह पुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता के गहरे दर्शन, जैसे स्वधर्म का पालन, निष्काम कर्मयोग और आत्म-साक्षात्कार को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित करती है। इसमें बताया गया है कि कैसे जीवन के द्वंद्वों से मुक्त होकर, मोह और अहंकार का त्याग कर मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सकता है। यह ग्रंथ आज के भौतिकवादी युग में, जहाँ स्वार्थ और अशांति बढ़ रही है, मानव को उसके कर्तव्यों और जीवन की सार्थकता का बोध कराता है। यह पुस्तक प्रत्येक उस जिज्ञासु के लिए है जो जीवन को एक उच्चतर उद्देश्य के साथ जीना चाहता है और स्वयं को परमात्मा से जोड़ना चाहता है।
डॉ. आशा कुमारी का जन्म स्वतन्त्रता सेनानी परिवार में कानपुर जिले के ग्राम अमौर में हुआ, वहीं से आपने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद इण्टरमीडिएट से लेकर पी.एच्डी. तक की शिक्षा लखनऊ से पूरी की। संस्कृत साहित्य से शोध करते समय ही अनुवाद कार्य में उनकी विशेष रुचि का विकास 'मध्य कालीन विज्ञान एवं तकनीकी का इतिहास' नामक परियोजना में पाण्डुलिपियों पर कार्य करते समय विशेष रूप से हुआ। प्राकृत साहित्य के मूर्धन्य ग्रन्थ महाकवि प्रवरसेन कृत 'सेतुबन्धम्' महाकाव्य का द्विभाषिक (अंग्रेजी एवं हिन्दी) अनुवाद के साथ ही आपने आयुर्वेद के कतिपय ग्रन्थों का अँग्रेजी अनुवाद भी किया है। योगचन्द्रिका, वृन्दमाधव, योगरत्नाकर, अष्टाङ्गहृदय (सूत्रस्थान), शार्ङ्गधर संहिता (हिन्दी एवं अँग्रेजी में पृथक् पृथक्), वङ्गसेन संहिता (हिन्दी अनुवाद एवं अँग्रेजी सम्पादन), हारित संहिता (अँग्रेजी अनुवाद) कुछ नाम है। आयुर्वेद साहित्य से इतर कुछ अन्य पुस्तकों के अनुवाद के साथ ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कहानियाँ भी प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी लेखनी माँ सरस्वती की सेवा में आज भी निरन्तर प्रयासरत है।
श्रीमद्भगवद्गीता हिन्दुओं का सर्वमान्य शास्त्र ग्रन्थ है जिसका पाठ, कथन, श्रवण मोक्षदायी माना जाता है क्योंकि अपौरुषेय न होते हुए भी इसे अपौरुषेय ही माना जाता है कि यह स्वयं पद्मनाभ के अवतार श्रीकृष्ण के मुख से निकली शाश्वत सत्य की धारा है, जिसे उन्होंने ने युद्धक्षेत्र में कौरव एवं पाण्डव सेनाओं के मध्य मोह जनित विषाद से ग्रस्त अर्जुन को मानव जीवन का सत्य बताने के लिए प्रवाहित किया था। अर्जुन कृष्ण के सखा थे तथा शिष्य भी थे, तो क्या उन्होंने अपने सखा का मोह पङ्क से उबारने के लिए ही 'गीता' कही? क्या अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करना मात्र उनका उद्देश्य था? क्या अर्जुन का युद्ध के लिए उद्यत होते ही गीता का प्रयोजन पूर्ण हो गया? यदि ऐसा ही होता तो युद्ध समाप्त होकर विजयी पाण्डवों द्वारा हस्तिनापुर राज्यव्यवस्थित कर लेने के बाद अर्जुन द्वारा श्रीकृष्ण से पुनः उस 'ज्ञान' को सुनाने का आग्रह न होता जिसका परिणाम अनुगीता है श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत उपादेयता का प्रमाण है।
ज्ञात इतिहास यही दिखाता है कि मानवजीवन में प्रत्येक स्तर पर दृश्य अथवा अदृश्य युद्ध चलता ही रहता है क्योंकि भगवान् ने स्वयं कहा है कि 'द्वौभूत सगों लोकेऽस्मिन् दैव असुर एव च' (गी. १६/६) अर्थात् सृष्टि के आदि से दो प्रकृति के ही लोग होते रहे हैं- दैवी सम्पदा सम्पन्न अथवा आसुरी सम्पदा सम्पन्न। ऐसा कभी नहीं हुआ कि केवल दैवी-सम्पदा के ही लोग हो अथवा केवल आसुरी सम्पदा सम्पन्न लोग ही हों। ऐसे में स्वाभाविक रूप से दोनों के बीच कभी प्रत्यक्ष कभी परोक्ष संघर्ष चलता ही रहता है। इतना ही नहीं प्रत्येक व्यक्ति के अपने जीवन में भी निरन्तर युद्ध चलता रहता है। षड्रिपु (काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर) जन्म के समय से ही साथ में होते है, तो जब शत्रु सामने है तो युद्ध होगा ही और वही समय होता है जब श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश मनुष्य को वास्तविक विजय का मार्ग दिखाते हैं।
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