डॉ० मृत्युंजय कुमार ति०मॉ० भागलपुर विश्वविद्यालय के अंतर्गत स्नातकोत्तर दर्शनशास्त्र विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर हैं। 1995 में इन्होंने बिहार पात्रता परीक्षा (BET) एवं यू.जी.सी. की राष्ट्रीय स्तर की पात्रता परीक्षा (NET) उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् इनकी प्रथम नियुक्ति नवम्बर 1996 में कोशी कॉलेज, खगड़िया में कमीशन द्वारा अनुशंसित व्याख्याता पद पर हुई थी जहाँ इन्होंने पाँच साल तक अध्यापन का कार्य किया। अनुप्रयुक्त नीतिशास्त्र में इनकी महती रुचि रही है। ये बिहार दर्शन परिषद्, अखिल भारतीय दर्शन परिषद् तथा Indian Philosophical Congres के आजीवन सदस्य रहे हैं। कई शोधार्थियों ने इनके निर्देशन में ति०माँ० भागलपुर विश्वविद्यालय द्वारा पी-एच०डी० की डिग्री प्राप्त की। इन्होंने राष्ट्रीय, प्रांतीय तथा भारतीय विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित संगोष्ठियों एवं सेमिनारों में व्याख्यान प्रस्तुत किया है। कई शोध पत्रिकाओं में इनके लेख प्रकाशित हो चुके हैं।
सम्पूर्ण ग्रीक नैतिक दर्शन को तीन भागों में बाँटा जा सकता है -सुकरात पूर्वयुग, सुकरात युग तथा सुकरातोत्तर युग। सुकरात पूर्वयुग में नैतिक सिद्धांतों के मुख्य प्रणेता सोफिस्ट्स थे। दार्शनिक के रूप में सुकरात के उदय के साथ ही यह युग समाप्त हुआ और सुकरात युग का प्रारम्भ हुआ। ग्रीक नीतिदर्शन के इतिहास में यह युग सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहा क्योंकि इसमें सुकरात, प्लेटो एवं अरस्तू के विचारों का अध्ययन किया जाता है। सिनिक तथा सैरेनैक सम्प्रदायों के उदय के साथ ही सुकरातोत्तर युग शुरु होता है। सिनिक सम्प्रदाय के प्रमुख संस्थापक डायेजिनीस तथा सैरेनैक सम्प्रदाय के प्रमुख संस्थापक अरिस्टिपस माने जाते हैं। इन दो सम्प्रदायों के नैतिक सिद्धांतों से ही सुकरातोत्तर युग में क्रमशः स्टोइकवाद तथा एपिक्यूरियनवाद नामक दो महत्वपूर्ण नैतिक विचारधाराओं का विकास हुआ। जेनो को स्टोइकवाद का तथा एपिक्यूरस को एपिक्यूरियनवाद का मुख्य प्रवर्तक माना जाता है। ग्रीक दर्शन के तीन प्रमुख आधार स्तंभसुकरात, प्लेटो एवं अरस्तु हैं।
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