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हल्के में ना लो जी!- Halke Me Na Lo Ji (Satire Collection)

SG$33
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Specifications
Publisher: India Netbooks Private Limited, Noida
Author Veena Singh
Language: Hindi Text
Pages: 144
Cover: Paperback
8.50x5.50 inch
Weight 210 gm
Edition: 2025
ISBN: 9789349810327
BA1786
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Book Description

 

 

भूमिका


वीना सिंह की इस किताब की रचनाओं से गुजरते हुये आपको वर्तमान में लिखे और चर्चा में चल रहे व्यंग्य से परिचय होगा। समकालीन व्यंग्य अपनी ताकत और सीमाओं के साथ इन रचनाओं में है। अभी के अखबारी कालम और सोशल मीडिया में व्यंग्य का यही चेहरा अक्सर मिलता है। वीना सिंह की इन व्यंग्य रचनाओं में आज का व्यंग्य अपनी संपूर्ण ताकत और कमजोरियों के साथ मौजूद हैं। वे हिंदी की वर्तमान पीढ़ी में सक्रिय व्यंग्य लेखिकाओं में एक महत्वपूर्ण नाम मानी जाती हैं। आज के हिंदी व्यंग्य को जानने के लिए ये रचनायें महत्वपूर्ण हैं।


वीना सिंह की ये रचनाएं इसीलिए भी पढ़ी जा सकती हैं कि इनके जरिए आप व्यंग्य संसार के वर्तमान परिदृश्य में सक्रिय स्त्री लेखन से भी रूबरू होते हैं। इनको पढ़िये और विचार करिये कि व्यंग्य संसार में मौजूद स्त्री का लेखन पुरूषों के लेखन से क्या कुछ अलग है, या कि यह सब फाल्तू की बात है? मेरे सीमित ज्ञान और याददाश्त से कहूं तो एक जमाने में हिन्दी व्यंग्य के स्त्री लेखन का जिक्र होने पर सूर्य बाला जी और अल्का अग्रवाल का नाम ही सामने आता था। उन दोनों के व्यंग्य की अपनी ताकत और कमजोरियां थीं जो उनके स्त्री होने से कतई ताल्लुक नहीं रखती थीं। सूर्य बाला जी ने जितनी शिद्दत से कहानियां और उपन्यास लिखे (और क्या खूब लिखे !), वे खुद मानती हैं कि उसी शिद्दत और जुनून से वे व्यंग्य में उतरी ही नहीं। वे मजे का लिखती रहीं और उस तरह से देखें तो बहुत बढ़िया लिखती रहीं। अल्काजी ने भाषाई और शैलीगत प्रयोग किये परंतु वे बहुत जल्द ही एक जगह रूक गई। इन दोनों के बाद व्यंग्य में स्त्री लेखन का एक लंबा गैप दिखता है। इस लंबे अंतराल के कारण ही निरर्थक परिचर्चा में ही सार्थकता तलाशने वाले गोष्ठीबाजों के लिये यह सवाल सदा ही बड़े काम का रहा है कि स्त्रियां व्यंग्य क्यों नहीं लिखतीं, या उस तरह नहीं क्यों नहीं लिखतीं जैसा कि अमुअन लिखा जाता है? यह सवाल वैसा ही पापुलर रहा है जैसा यह सवाल कि व्यंग्य एक विधा है या नहीं?


मुझे नहीं लगता कि व्यंग्य लेखन के परिदृश्य को इस तरह देखा जाना चाहिए।


अगर पुरुष व्यंग्य लिखेंगे तो उनके लिखे में कोई अतिरिक्त पुरुषार्थ या पुरुषत्व उतर आयेगा, ऐसा होते हुये मुझे तो कहीं दिखाई नहीं दिया। बहुत ही नपुंसक से कमजोर व्यंग्य पुरुषों ने लिखे हैं। आपकी नजरों से भी ये गुजरे ही होंगे, रोज गुजरते होंगे। इनको मात्र इसलिए अलग से अच्छा व्यंग्य नहीं कहा जा सकता कि इनको किसी पुरूष ने लिखा है। इसके ठीक उलट, बहुत से तीखे और बेहतरीन व्यंग्य आजकल स्त्रियां रच रही हैं। वे ऐसा कोई लेडीज कंसेशन भी आलोचकों से नहीं मांग रही हैं। यह बात अलग है कि हमारा व्यंग्य आलोचक या संपादक ही उसे निरर्थक कन्सेशन देने को आतुर हुआ जाता है। हमें मानना ही होगा कि वर्तमान में बहुत सी लेखिकाएं पूरी गंभीरता से व्यंग्य लिख रही हैं और कहीं भी मात्र जेंडर की वजह से कमतर या बेहतर नहीं हैं। वे अपने व्यंग्य लेखन के बूते ही अपनी जगह बना रही है।


वीना सिंह भी एक ऐसी ही रचनाकार हैं।


उनका व्यंग्य जीवन को हर कोण से देखने की कोशिश है। उनकी रचनाओं के व्यापक विषयों से जाहिर होता है कि वे आँखें खोलकर जीवन को एक व्यंग्यकार की नजरों से तौलकर लिखती हैं। हमारे समाज और राजनीति की विसंगतियों को देखने का उनका अपना ही ईमानदार नजरिया है। वे व्यंग्य की अपनी ही भाषा को गढ़ने की कोशिश करती हैं। इसमें वे सफल भी होती हैं और चूकती भी हैं। वैचारिक स्तर पर वे अपनी तरह से उस विसंगति के कार्य-कारण पर विचार करती हुई व्यंग्य तक का रास्ता तय करती हैं। वे अब एक लंबे समय से बड़ी लगन से व्यंग्य रचने में रत हैं। यही बात मुझ जैसों को उनके भविष्य को लेकर बड़ी आश्वस्ति देती है। कोई भी लेखक यदि एक जिद के साथ रचना करता है और उसी जिद को वह उस विधा की बारीकियों को और और समझने की ठान लेता है तो वह बहुत आगे जाने का रास्ता बना रहा होता है। अभी वीना सिंह को अपनी व्यंग्य भाषा की अनगढ़ता की तराश पर बहुत काम करना है और रचना की संभावना में गहरे उतरने के रास्ते बनाने का हुनर सीखना है। व्यंग्य में इंप्रोवाइजेशन के महत्वपूर्ण औजार का इस्तेमाल भी सीखना है उनको। परन्तु उनकी जिद ही उनको आगे ले जायेगी; याद आता है मुझे कि कभी हम भी तो ऐसा ही लिखते थे।


वीना सिंह से हमें बड़ी उम्मीदें हैं। इस संग्रह की रचनाएं पढ़कर आप भी मानेंगे कि मेरी उम्मीद ग़लत नहीं।

 

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