लेखक परिचय
1 जुलाई, सन 1971 को उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद के पराबहाउद्दीनपुर गाँव में जन्म। म. ज्यो. फुले रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली से हिन्दी विषय में एम. ए., पी-एच.डी.। लगभग 21 वर्षों तक अरुणाचल प्रदेश में उच्चतर स्तर पर हिन्दी-अध्यापन। राजीव गांधी (केन्द्रीय) विश्वविद्यालय, ईटानगर में कार्यरत रहते हुए वहाँ तीन-तीन वर्ष हिन्दी विभागाध्यक्ष तथा भाषा संकायाध्यक्ष का दायित्व पूर्ण करने के साथ ही कार्य परिषद, विद्या परिषद, प्रथम कोर्ट, शोघ समिति, पाठ्यक्रम समिति, राजभाषा कार्यान्वयन समिति, चयन समिति, निरीक्षण समिति इत्यादि के सदस्य अध्यक्ष के रूप में कार्यानुभव। अक्टूबर, 2020 से सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु के हिन्दी विभाग में आचार्य पद पर कार्यरत। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु में हिन्दी विभागाध्यक्ष, छात्र-कल्याण अधिष्ठाता, कला संकाय अधिष्ठाता, शोध निदेशक, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के नोडल अधिकारी, सांस्कृतिक समिति के संयोजक, शोघ पात्रता परीक्षा समन्वयक जैसे महत्त्वपूर्ण दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वाह। राजीव गांधी विश्वविद्यालय, ईटानगर तथा सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु के अतिरिक्त सिक्किम विश्वविद्यालय, गंगटोक; पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय (NEHU), शिलांग; तथा अवध विश्वविद्यालय, अयोध्या की हिन्दी पाठ्यक्रम समितियों के अध्यक्ष सदस्य के रूप में सहयोग। अब तक सात पुस्तकें- 'तुलसी-साहित्य का आधुनिक सन्दर्भ'; 'भाषा, संस्कृति और साहित्य'; 'फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों में लोक-संस्कृति'; 'राष्ट्रीय स्मृति, संस्कृति और भाषा'; अरुणाचल प्रदेश की लोककथाएँ'; 'देश की हिन्दी' तथा 'याद करें कुर्बानी' प्रकाशित तथा 'राष्ट्रीय अस्मिता एवं पूर्वोत्तर का साहित्य'; 'भक्ति-साहित्य का मानवीय परिप्रेक्ष्य' प्रकाशनाधीन। राष्ट्रीय अन्तरराष्ट्रीय स्तर की विभिन्न पत्रिकाओं, यथा- 'समकालीन भारतीय साहित्य'; 'अक्षरा'; 'भाषा'; 'साहित्य अमृत'; 'साक्षात्कार'; 'चौमासा'; 'आजकल'; 'वीणा'; 'संस्कृति'; 'ज्ञान गरिमा सिन्धु'; 'हिन्दी अनुशीलन'; 'संकल्य'; साहित्य भारती'; 'अरुण प्रभा'; 'तुलसी मानस भारती'; 'साहित्य सेतु' आदि में डेढ़ सौ से अधिक सृजनात्मक एवं आलोचनात्मक रचनाएँ प्रकाशित । राष्ट्रीय अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठियों, पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों तथा अन्य विविध आयोजनों में सौ से अधिक व्याख्यान प्रस्तुत। 'अरुण प्रभा', 'अरुणागम' (शोध पत्रिकाएं) तथा 'उत्कर्ष' (दीक्षान्त स्मारिका) के अनेक अंकों का सम्पादन। हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयागराज के सम्मेलन सम्मानः विहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन, पटना के साहित्य सम्मेलन शताब्दी सम्मान; साहित्य मण्डल, श्रीनाथद्वारा (राजस्थान) के श्री मोतीलाल राठी स्मृति सम्मान; सूर्या संस्थान, नोएडा के सूर्या अन्तर्भारती भाषा सम्मान-2017, श्रीतुलसी जन्मभूमि न्यास और सनातन धर्म परिषद्, राजापुर सूकरखेत, गोण्डा के तुलसी विश्व सम्मान जैसे अनेक सम्मान प्राप्त।
पुस्तक परिचय
लोक साहित्य कभी लोक तक ही सीमित था। साहित्य में इसे अधिक महत्ता प्राप्त नहीं थी। आज अध्येताओं का ध्यान इस ओर गया है तो लोक साहित्य पर खूब अध्ययन भी हो रहे हैं और उससे सम्बन्धित नये-नये पक्ष उद्घाटित भी हो रहे हैं। लोक साहित्य में लोकगीत अधिक गतिशील होते हैं, समसामयिक होते हैं। संरचना में मले छोटे हों, पर प्रभावात्मकता में ये बड़े होते हैं और त्वरित सन्देश छोड़ते हैं। ये समय के साथ चलते हैं और समसामयिक परिस्थितियों के सन्दर्भ में लोक को शिक्षित, संस्कारित और प्रेरित करने में अपनी बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसलिये राष्ट्रीयता की भावना से लेकर प्रगतिशील चेतना तक इनमें दिखायी पड़ती है। इसी तरह लोककलाएं उपयोगी और ललित, दोनों प्रकार की कलाएं कुछ-कुछ सभी को आती ही थीं। यह हमारे स्वावलम्बी जीवन के लिये आवश्यक था। इससे हमारा सौन्दर्यबोध भी विकसित होता था और जीवन की आवश्यकता भी पूरी होती थी। शिक्षा और संस्कार दोनों की प्राप्ति हमें लोककलाओं से होती थी। आज हम इनमें बहुत पिछड़ गये हैं। अब शहरों में तो दूर, गाँवों में भी इनसे जुड़ाव निरन्तर कम होता जा रहा है। पुस्तक में इन विषयों से सम्बन्धित विचार भी व्यक्त किये गये हैं। महादेवी वर्मा और अज्ञेय के काव्य से सम्बन्धित लेखों में भी लोक-परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखा गया है। भक्तिकालीन कवियों का सन्त एवं भक्त की श्रेणियों में मनमाना वर्गीकरण कर आधुनिक आलोचना ने इस विषय को विवादास्पद-सा बना दिया है। जबकि न शास्त्र ऐसा मानता है और न लोक। सबसे बड़ी बात यह कि स्वयं उन कवियों ने भी अपने को उस रूप में प्रस्तुत नहीं किया, जैसा आज के विद्वानों ने कर लिया है। पुस्तक का प्रारम्भ इसी विषय से हुआ है, जिसमें शास्त्रमत और लोकमत दोनों दृष्टियों से इस सन्दर्भ में सही स्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। आशा है, समग्र रूप में पुस्तक में प्रस्तुत विचार-सामग्री पाठकों को विभिन्न विषयों के प्रति कुछ भिन्न दृष्टि से सोचने-विचारने के लिये प्रेरित कर सकेगी।
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