प्रस्तुत पुस्तक का आधार परम्परागत प्रामाणिक ग्रन्थ "भारतीय संस्कृति" या "हिन्दू धर्म" के नाम से लिखी गयी आधुनिक काल में अनेक पुस्तकें हैं, किन्तु विचार हुआ क्यों न परम्परागतरूप से चले आ रहे प्रामाणिक ग्रन्थों का स्वयं ही अवलोकन करने का प्रयत्न किया जाय। इस हेतु दर्शन शास्त्र, श्रीमद्भागवत पुराण, गीता (श्रीमद्भगवद्गीता), उपनिषद् (शांकरभाष्य) एवं अन्य भाग्य आदि के हिन्दी भाषा में अनुवाद पढ़ने का प्रयास हुआ। पिछले पैसठ (65) वर्षों से अनवरत रूप से हमारे पास आ रहे गीता-प्रेस गोरखपुर के "कल्याण" मासिक पत्रिका के अंकों ने तथा अन्य ग्रन्थों ने भी हमारे ज्ञानवर्धन (अज्ञान निवारण) में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इसके अतिरिक्त संन्यास आश्रमों में कई बार जाकर तथा वहीं रहकर प्रस्थानत्रयी (गीता, उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र) पर महात्माओं के प्रवचन सुने और अपनी शंकाओं का समाधान पाने का प्रयत्न किया। इसलिये इस पुस्तक में विभिन्न स्थलों पर प्रामाणिक पुस्तकों के मन्त्रों, सूत्रों एवं श्लोकों को इंगित या उद्धरित किया गया है तथा उन संतों, महात्माओं एवं विद्वानों द्वारा प्रस्तुत भाष्यों या वचनों को भी इंगित किया गया है जिन्होने अपना समस्त जीवन भारतीय संस्कृति के उत्थान के लिये अर्पित किया। इन्हीं प्रामाणिक ग्रन्थों एवं उनकी टीकाओं तथा व्याख्याओं का आधार पाकर इस पुस्तक की संरचना की गयी है।
परम्परागत प्रामाणिक ग्रन्थों की विशेषता प्रामाणिक ग्रन्थों का संक्षिप्त विवरण इस पुस्तक के अन्त में प्रथम परिशिष्ट में प्रस्तुत किया गया है। भारतीय संस्कृति के प्रामाणिक शास्त्र निश्चयात्मक बुद्धि से प्रस्तुत किये गये हैं, संशयात्मक बुद्धि से नहीं, क्योंकि उनमें कहीं भी "संम्भवतः" (शायद) शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है। आधुनिक विद्याओं के प्रामाणिक (Standard) ग्रन्थों में "संम्भवतः" (Probably, May be) शब्द का प्रयोग प्रायः देखा जा सकता है। भारतीय संस्कृति के परम्परागत पुरातन ग्रन्थों में केवल उन्हीं बातों पर लिखा गया है जो प्रामाणिक हैं और इसके लिये प्रमाणों (यथार्थ ज्ञान के साधनों) को परिभाषित किया है तथा उनका वर्गीकरण किया है। प्रमाणों एवं तर्कों की सीमाओं को भी समझा गया है तथा मानवीय बुद्धि के दोषों और सीमाओं को भी परखा गया है। प्रकृति में व्याप्त कारण-कार्य नियम में स्थित "कारणों" का भी वर्गीकरण किया गया है तथा कारण-कार्य श्रंखला के आदि और अन्त का भी निर्धारण हुआ है। यह सब यहाँ हमने इसलिये लिखा क्योंकि आजकल साइंस (विज्ञान) या अन्य भौतिक विषयों के विद्यार्थी यह प्रश्न तो करते रहते हैं कि अमुक बात का प्रमाण (Proof) क्या है? परन्तु उन विद्यार्थियों से यदि पूँछा जाय कि पहले वह यह बताएं कि "प्रमाण" किसे कहते हैं, इसकी परिभाषा क्या है तथा प्रमाण कितने प्रकार के होते हैं? तो वे इन प्रश्नों के उत्तरों से प्रायः अनभिज्ञ रहते हैं। प्रमाणों और तर्कों की सीमाओं आदि का बता पाना उनके लिए और भी दूभर है। परन्तु यह विद्यार्थियों का भी दोष नहीं है क्योंकि यह सब उनके पाठ्यक्रमों में होता ही नहीं। रह आधुनिक शिक्षा की एक दयनीय स्थिति का उदाहरण है ।
पुस्तक का विषय भारतीय संस्कृति का इतिहास नहीं, ज्ञान है आधुनिक काल में जिस प्रकार किसी देश या समाज के इतिहास पर पुस्तकें लिखी जाती हैं, उस प्रकार यह पुस्तक भारतीय संस्कृति के इतिहास की चर्चा नहीं करती। आधुनिक विश्व में भारतीय संस्कृति का प्रातन प्रसार भी विद्यमान है। यह प्रसार विश्व में कहाँ-कहाँ, कब-कब और कैसे-कैसे हुआ, उन्हें भी इस पुस्तक का विषय नहीं बनाया गया है। भारतीय संस्कृति का इतिहास स्वयं में एक विशाल भण्डार है। यद्यपि सांस्कृतिक इतिहास हमारे लिये गौणरूप से महत्वपूर्ण है परन्तु विषयों का बहुत अधिक विस्तार हो जाने के कारण उन चर्चाओं को इस पुस्तक में नहीं रखा गया। प्रस्तुत पुस्तक में मनुष्य को अभ्युदय एवं निःश्रेयस की प्राप्ति कराने वाले विचार हैं ।
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