भारत के भूमि पर विकसित दर्शन एवं दार्शनिक सम्प्रदाय मूलतः अध्यात्मिक स्वरूप का रहा है और रहे भी तो क्यों नहीं, क्योंकि इस भूभाग मुख्य रूप से ऋषियों, मर्हिषयों, तत्वेत्ताओं से सुसज्जित रहा है। वैसे तो इस रहस्यमयी पहेली विश्व को सुलझाने के लिए अनेक सभ्य एवं शिक्षित देशों के चिन्तनशील विद्वानों ने श्लाघनीय प्रयास किया है, लेकिन जो प्रयास भारतीय अध्यात्मवेताओं ने किया है, वह निश्चित रूप से ऐतिहासिक है।इसी आध्यात्मिक परम्परा के कारण, ऐतिहासिक सभी उथल-पुथल को झेलने में कामयाब रहा है भारतीय दर्शन, विशेष रूप से भारतीय तत्व दर्शन । निश्चयतः परम्परा के आग्रही चिंतन धारा मूलतः अध्यात्म के रंग से ही अभिरंजित है । 'सत्य की खोज' इस तत्व दर्शन का मूल लक्ष्य है। यहाँ ध्यातव्य है कि दर्शनशास्त्र की अनेक शाखाओं में तत्वशास्त्र का स्थान सर्वोपरी रहा है क्योंकि इसी विद्या के द्वारा विश्व रूपी समस्या तथा उसके मूल कारण पर चिंतन किया जाता है। तत्वमीमांसा, जिसे अंग्रेजी 'Metaphysics' कहा जाता है। इस (Metaphysics) का प्रयोग सर्वप्रथम यूनानी दार्शनिक 'अरस्तू' के रचनाओं में प्राप्त होता है। इन रचनाओं का संपादन कार्य 'एन्डोनिकस' के द्वारा किया गया था । The 'Metaphysics' वस्तुतः दो शब्दों Meta तथा physics के योग से बना है। यहाँ Meta का अर्थ होता है after तथा Physics का अर्थ होता है Science of the Physical Word इस प्रकार तत्वशास्त्र अर्थात् Metaphysics का अर्थ हुआ "वह विद्या अथवा ज्ञान जो भौतिक विज्ञान के बाद का हो । 'एंडोनिकस' ने अरस्तू के कुछ दार्शनिक रचनाओं को सम्पादन के क्रम में भौतिक शास्त्रीय संबंधी रचनाओं के बाद रखा। ऐसा लगता है कि यह नामकरण आकस्मिक था; यहाँ ग्रंथों की विषयवस्तु को देखकर नहीं बल्कि संग्रह के क्रम में उसे विशेष स्थान दिया गया था।" कुछ विचारक 'Meta' का अर्थ about भी लगाते हैं, तो कुछ विचारक इसका तात्पर्य beyond से लगाते हैं तथा कुछ विचारक इसे for के अर्थ में लेते हैं। जो भी अर्थ हो उसका तात्पर्य तत्व शास्त्र से है। तत्वों के बारे में हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो विश्व के मूल तत्वों से है। इस Metaphysics के लिए ontology शब्द का भी प्रयोग किया जाता है जिसका भी अर्थ होता है 'सत्ताशास्त्र', यहाँ सत्ता से तात्पर्य परमसत्ता से है। भारतीय तत्वदर्शन में इसे परम तत्व के चिंतन के रूप में प्रयोग किया जाता है। उस परमतत्व का भले ही नाम अलग-अलग क्यों न हो । उपर्युक्त विवेचना से यह तथ्य प्रकाश में आता है कि तत्व शास्त्र के अंतर्गत विश्व के मूल तत्व या आदिकारण के बारे में चिन्तन किया जाता है। साथ ही साथ अनुसंधान किया जाता है। इस शास्त्र द्वारा यह पता लगाने का प्रयास किया जाता है कि अनुभव जगत् का अंतिम आधार क्या है ? तथा उसका स्वरूप क्या है ? यहाँ मूल तत्व के लिए चरम सत्ता या पारमार्थिक सत्ता का प्रयोग किया जाता है। यहाँ ध्यातव्य है कि यह चरमसत् या पारमार्थिक सत्ता ही विश्व का वास्तविक एवं अंतिम आधार है। जिससे परे कुछ भी नहीं है जो स्वयं का आधार है और विश्व के सभी पदार्थों का पर्याप्त कारण है। इस पर्याप्त कारण का स्वरूप की विवेचना भी इसी तत्व शास्त्र का काम है।
प्रस्तुत पुस्तक तत्वमीमांसा की व्याख्या को केंद्र में रखकर, अन्य तत्वों की व्याख्या प्रस्तुत की गयी है जो कि काफी उपयोगी दृष्टिगत् होता है। वर्तमान समय में जब विश्व में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गयी है, विश्व बन्धुत्व की बातों को दरकिनार किया जा रहा है तो इस तत्वचिंतन का व्यापक महत्व दिखता है। इसके अध्ययन से विद्यार्थियों के साथ-साथ जनमानस भी लाभान्वित होंगे । इस प्रकार इस पुस्तक की उपादेयता प्रभावी सिद्ध होगी ।
डॉ० अनिल कुमार वर्मा शिक्षा: मगध विश्वविद्यालय, बोधगया से एम०ए० तथा पी-एच०डी० । लेखक: दर्शन संबंधी अनेक पुस्तक एवं निबंध शोध-पत्रिकाओं में प्रकाशित सम्प्रति : स्नातकोत्तर दर्शन- विभाग, सि०का मु० विश्वविद्यालय, दुमका में कार्यरत एवं आजीवन सदस्य अखिल भारतीय दर्शन परिषद्, झारखंड दर्शन परिषद् तथा बिहार दर्शन परिषद् । डॉ० चम्पावती सोरेन शिक्षा : तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर से एम०ए० तथा सि०का मु० विश्वविद्यालय से पी-एच०डी० । सम्प्रति : संताल परगना महिला महाविद्यालय, दुमका में कार्यरत एवं आजीवन सदस्य अखिल दर्शन परिषद्, झारखंड दर्शन परिषद् तथा बिहार दर्शन परिषद् । लेखन : दर्शन संबंधी अनेक निबंध शोध-पत्रिकाओं में प्रकाशित ।
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