पुस्तक परिचय
हिंदी में जैनेंद्र कुमार जैसा सूक्ष्म चिंतक तथा विश्लेषक दूसरा नहीं हुआ और उसके साथ ही उनकी सहजता, सरलता तथा सदैव उपलब्धता में उनके व्यक्तित्व का वैशिष्ट्य था। दार्शनिकता और सहजता का मिलन विस्मयकारी। वे धन के अभाव में रहे। उनकी कोई नियमित आय नहीं थी, पर धन के प्रति लालसा नहीं देखी। उनकी बहुत ही सीमित आवश्यकताएँ थीं, सात्विक जीवन था और भागदौड़ न थी। जैनेंद्र का संबंध कई संस्थाओं से था और सारे देश में उन्हें जाना पड़ता था। वे कांग्रेसी थे, पर कांग्रेसी छलकपट से बहुत दूर थे। वे कांग्रेसी आंदोलन में जेल गये, अधिकांश बड़े कांग्रेसी नेताओं से उनके संबंध रहे, लेकिन उसका निजी लाभ के लिए उपयोग नहीं किया। चौधरी चरण सिंह के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान उनके प्रस्ताव पर वे संयुक्त राष्ट्र संघ में दो महीने के लिए भारत के प्रतिनिधि रहे। उन्हें समाज और देश की चिंता थी, पर निजी जीवन के बारे में मैंने उन्हें चिंतित नहीं पाया। जैनेंद्र उपरोक्त कारणों से अपने अन्य हिंदी लेखकों से भिन्न हैं, जिन्हें आजीविका, नौकरी, पद, पुरस्कार आदि के लिए भागदौड़ करते हुए नहीं देखा गया।
जैनेंद्र प्रेमचंद युग की देन है तथा प्रेमचंद को अपना साहित्य गुरु मानते हैं, लेकिन उन्होंने अपना स्वतंत्र रास्ता बनाया और वे अनुयायी नहीं बने। प्रेमचंद के साथ उनकी कई विषयों में असहमति दिखाई देती है, लेकिन जीवन के अंत के समय वे प्रेमचंद के पास थे। जैनेंद्र का यह वैशिष्ट्य जीवन के अंत तक बना रहा और उनका साहित्य एवं जीवन, समाज, संस्कृति आदि पर चिंतन भी जैनेंद्रीय चिंतन के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। हिंदी साहित्य के इतिहास में जैनेंद्र हमेशा विद्यमान रहेंगे और अपनी विशिष्टता के कारण साहित्य प्रेमियों के आकर्षण के केंद्र बने रहेंगे। जैनेंद्र दिल्ली में एक ऐसे लेखक थे जिनके पास विपुल साहित्यिक दस्तावेज तथा स्मृतियाँ थीं तथा साहित्य विचारों का विपुल संसार था, लेकिन हमारे आलोचकों ने गंभीरतापूर्वक देखने और समझने की कोशिश नहीं की। मुझे कई बार आश्चर्य होता था कि दिल्ली के हमारे आलोचक उनसे मिलते थे, घर जाते थे, लेकिन कभी उन पर गंभीर कार्य करने के बारे में मैंने उनको विचार करते हुए नहीं देखा। मेरी इस पुस्तक से आप अंदाज लगा सकते हैं कि कितनी सामग्री नष्ट हो गई होगी। जैनेंद्र के पत्र एकत्र करना आसान न था। मेरे अपने निजी अनुभव इनके साथ जुड़े हैं। यह एक प्रकार से निजी अनुभव की पुस्तक है, लेकिन जैनेंद्र को समझने के लिए इसे पढ़ना और देखना शायद जरूरी है।
लेखक परिचय
जन्मः 11 अक्टूबर, सन् 1938। बुलंदशहर (उत्तर प्रदेश)। शिक्षाः एम.ए. (हिन्दी) प्रथम श्रेणी, पी-एच.डी., डी. लिट्। विशेषज्ञता-क्षेत्रः प्रख्यात साहित्यकार प्रेमचंद के विशेषज्ञ के रूप में राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित । प्रेमचन्द-साहित्य पर प्रकाशित ग्रंथः कथा सम्राट प्रेमचंद के जीवन, विचार और साहित्य पर विगत 46 वर्षों से अनवरत संलग्न । प्रेमचंद के संदर्भ में परम्परागत मान्यताओं को ध्वस्त कर अकाट्य तकों के आधार पर मौलिक शोध और अध्ययन की दिशाओं का संधान। प्रेमचंद साहित्य पर 38 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। इनमें- 'प्रेमचंद के उपन्यासों का शिल्प विधान', 'प्रेमचंद अध्ययन की दिशाएँ', 'प्रेमचंद विश्वकोश (2 खंडों में)', 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य', 'प्रेमचंद का कहानी दर्शन', 'प्रेमचंद नयी दृष्टि नये निष्कर्ष', 'प्रेमचंद साहित्य : भारतीय भूमिका', 'प्रेमचंद : वाद, प्रतिवाद और संवाद', 'प्रेमचंद कहानी रचनावली (6 खंडों में)', 'नया मानसरोवर (8 खंडों में)', 'प्रेमचंद की कहानी यात्रा और भारतीयता' जैसे अवस्मिरणीय ग्रंथ उल्लेखनीय हैं। प्रेमचंदोत्तर-साहित्य पर प्रकाशित ग्रंथः प्रेमचंद साहित्य को समर्पित होने के साथ अमेरिका, ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका, मॉरिशस, सूरीनाम, फिजी, नेपाल आदि देशों में रचित अप्रवासी हिन्दी साहित्य के प्रचार, प्रकाशन और पहचान हेतु निरन्तर प्रयासरत। इस प्रयास के लिए ठोस एवं व्यावहारिक योजना को मूर्तरूप देने में अहर्निश प्रयत्नशील। प्रेमचंदेत्तर साहित्य पर 24 से अधिक ग्रंथों की रचना।
भूमिका
हिंदी साहित्य में जैनेंद्र की उपस्थिति अनोखी और विस्मयकारी है। हिंदी में जैनेंद्र कुमार जैसा सूक्ष्म चिंतक तथा विश्लेषक दूसरा नहीं हुआ और उसके साथ ही उनकी सहजता, सरलता तथा सदैव उपलब्धता में उनके व्यक्तित्व का वैशिष्ट्य था। दार्शनिकता और सहजता का मिलन विस्मयकारी। वे धन के अभाव में रहे। उनकी कोई नियमित आय नहीं थी, पर धन के प्रति लालसा नहीं देखी। उनकी बहुत ही सीमित आवश्यकताएँ थीं, सात्विक जीवन था और भागदौड़ न थी। जैनेंद्र का संबंध कई संस्थाओं से था और सारे देश में उन्हें जाना पड़ता था। वे कांग्रेसी थे, पर कांग्रेसी छलकपट से बहुत दूर थे। वे कांग्रेसी आंदोलन में जेल गये, अधिकांश बड़े कांग्रेसी नेताओं से उनके संबंध रहे, लेकिन उसका निजी लाभ के लिए उपयोग नहीं किया। चौधरी चरण सिंह के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान उनके प्रस्ताव पर वे संयुक्त राष्ट्र संघ में दो महीने के लिए भारत के प्रतिनिधि रहे। उन्हें समाज और देश की चिंता थी, पर निजी जीवन के बारे में मैंने उन्हें चिंतित नहीं पाया। जैनेंद्र इन्हीं कारणों से अपने अन्य हिंदी लेखकों से भिन्न हैं, जिन्हें आजीविका, नौकरी, पद, पुरस्कार आदि के लिए भागदौड़ करते हुए नहीं देखा गया। देश और समाज का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं था, जिसके संबंध में जैनेंद्र ने विचार न किया हो और उस क्षेत्र में सक्रिय भूमिका न निभाई हो। जैनेंद्र में यह वैशिष्ट्य प्रेमचंद के साथ अपने संबंधों में भी दिखाई देता है। जैनेंद्र प्रेमचंद युग की देन है तथा प्रेमचंद को अपना साहित्य गुरु मानते हैं, लेकिन उन्होंने अपना स्वतंत्र रास्ता बनाया और वे अनुयायी नहीं बने।
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