पुस्तक परिचय
हिन्दी साहित्य में जैनेन्द्र के उपन्यासों पर शोध हुआ है किन्तु अन्य उपन्यासकारों की तुलना में पर्याप्त नहीं है। इनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का लेखा-जोखा किसी एक ही पुस्तक में उपलब्ध नहीं। उनके जीवन काल में ही कुछ विद्वानों में उनके उपन्यासों की आलोचनात्मक समीक्षा की। वे पुस्तकें भी आज सहज उपलब्ध नहीं है। जैनेन्द्र के उपन्यास पर लिखित पुस्तकों में डॉ. देवराज उपाध्याय की पुस्तक जैनेन्द्र के उपन्यासों का मनोविज्ञान, श्री रघुनाथ सरन झालानी की जैनेन्द्र और उनके उपन्यास, डॉ. धनराज मानधाने की हिन्दी के मनोवैज्ञानिक उपन्यास, डॉ. रणवीर संग्रा की हिन्दी उपन्यास में चरित्र-चित्रण का विकास प्रमुख मानी जाती है। इन सभी विद्वानों ने जैनेन्द्र के उपन्यासों में वर्णित पात्रों का चरित्र-चित्रण मनोविज्ञान के सिद्धान्त को कसौटी मान कर किया है। इन्होंने फ्रायड, एडलर जुंग तथा मैक्डूगल आदि मनोवैज्ञानिकों के सिद्धान्त की चर्चा तो की है किन्तु व्याख्या नहीं की है। पात्रों के चरित्र चित्रण, सामान्य-असामान्य व्यवहार के मूल में मनोविज्ञान की उपस्थिति को साथ-साथ अवगत नहीं कराया गया है।प्रस्तुत पुस्तक में मनोविज्ञान का स्वरूप-क्षेत्र, अर्थ, मन और मनोविज्ञान, मन के स्तर, स्वरूप, मानव व्यवहार के साथ सामान्य-असामान्य व्यवहार, व्यवहार के कारण एवं लक्षण मानव व्यवहार की मनोविकृत्तियाँ, मनोविज्ञान के सिद्धान्त, संप्रदाय की पहले व्याख्या की गई है, ताकि पात्रों का मनोविश्लेषण करते हुए मनोवैज्ञानिक शब्दावली का प्रयोग पात्रों की असामान्यता को दर्शाते हुए अटपटा न लगे। सभी मनोविकृत्तियों की विस्तृत तथा सार-गर्भित व्याख्या साहित्यिक पृष्ठभूमि पर की गई है। जैनेन्द्र के साहित्य पर आलोचक पाश्चात्य लेखकों के प्रभाव का आरोप लगाते रहे हैं। प्रस्तुत पुस्तक उनके उपन्यासों से जैनेन्द्र जी की तुलना भी साथ-साथ की गई। ऐसा माना जाता है कि जैनेन्द्र को जानने के लिए प्रेमचन्द को जानना आवश्यक है अतः इस संदर्भ में जैनेन्द्र तथा प्रेमचन्द की साहित्यिक समानता, लेखन संबंध, साहित्यिक विचारधारा को भी प्रस्तुत किया गया है।
लेखक परिचय
डॉ. ईशा कपूर वर्तमान में पंडित नेकीराम शर्मा राजकीय महाविद्यालय, रोहतक (हरियाणा) के हिंदी विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। हिंदी साहित्य के क्षेत्र में आपकी गहन अभिरुचि विशेष रूप से कथा साहित्य, मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन, लोक साहित्य एवं स्त्री विषयक विमर्शों पर केन्द्रित रही है। आपके द्वारा अब तक कुल चार आलेख विभिन्न प्रतिष्ठित शोध-पत्रों में प्रकाशित किए जा चुके हैं, जिनमें से तीन आलेख राष्ट्रीय तथा एक आलेख अंतरराष्ट्रीय शोध-पत्र में प्रकाशित हुआ है। आपका अकादमिक दृष्टिकोण सृजनात्मकता, अनुसंधान-निष्ठा एवं सामाजिक चेतना से समृद्ध है। आप निरंतर हिंदी भाषा व साहित्य के क्षेत्र में शोध और शिक्षण के माध्यम से उत्कृष्ट योगदान दे रही हैं। संपर्क सूत्र : फोन नंबर: 9729395599 ईमेल: isha291185@gmail.com
प्रस्तावना
आज मानव संघर्षशील जीवन जी रहा है। समय की दौड़ में प्रत्येक व्यक्ति में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगी है। सामाजिक विषमताओं आर्थिक अन्तर तथा पारिवारिक विघटन में सामान्य व्यक्ति की जीवन शैली का जटिल बना दिया है। जटिलता के फलस्वरूप मनुष्य सदैव तनाव में जीता है तथा संघर्षरत रहता है। एक ओर उसके सीमित साधन नैतिक मर्यादाएँ तथा पारिवारिक समस्याएँ तो दूसरी ओर उसकी स्वयं की क्षमताएँ, इन दोनों में पल-पल संघर्ष होता रहता है। उसके संघर्ष का प्रभाव उसके आचरण पर परिलक्षित होता है। मैंने समाज में मानव को घुट-घुट कर जीते देखा तो मेरे अन्तर्मन में अनेक प्रश्न उठने स्वाभाविक थे। साहित्य की छात्रा होने के कारण मैंने इन प्रश्नों का उत्तर देने वाली विधा का गहन अध्ययन प्रारंभ किया। मानव की मनोभूमि में होने वाली उद्वेलन का रहस्य जानने की मेरी जिज्ञासा जैनेन्द्र के उपन्यासों को पढ़ने के पश्चात् कुछ शान्त हुई। मैंने मनोवैज्ञानिक उपन्यासों के लेखकों में से जैनेन्द्र के उपन्यासों का चयन किया और उसका परिणाम ही इस पुस्तक का मूर्तरूप है। हिन्दी साहित्य में जैनेन्द्र के उपन्यासों पर शोध हुआ है किन्तु अन्य उपन्यासकारों की तुलना में पर्याप्त नहीं है। इनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का लेखा-जोखा किसी एक ही पुस्तक में उपलब्ध नहीं। उनके जीवन काल में ही कुछ विद्वानों में उनके उपन्यासों की आलोचनात्मक समीक्षा की। वे पुस्तकें भी आज सहज उपलब्ध नहीं है।
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