"काव्य सेतु" एक प्रयास है, अपने धार्मिक विचारों एवं मान्यताओं को काव्य रूप में प्रस्तुत करने का।
भारतवर्ष का स्वर्णिम अतीत स्वयं के भीतर आकाश भर अनूठापन समेटे हुए है। यदि स्पष्ट रूप से कहें तो हम इस अनेत को शब्दों में कहने का यत्न मात्र कर सकते हैं।
"काव्य सेतु" वही यत्न है। श्रीरामचरितमानस की रचना करते समय महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी भी यही कहते हैं कि भगवान श्रीराम की कथाएँ अनंत हैं और अनंत प्रकारों से उन्हें कहा भी गया है किन्तु वह भी अपने आराध्य की कथा अवश्य कहेंगे।
काव्य रचना के श्रेष्ठ प्रतिमान पूर्व में ही स्थापित किए जा चुके हैं, ऐसे में मैं स्वयं को साहसी मानता हूँ कि मैंने पहले तो काव्य संग्रह लिखने की धृष्टता की, साथ ही ऐसे विषयों का चुनाव किया जिन पर वृहद विचार-विमर्श किया जा चुका है।
किन्तु इस काव्य माला को गढ़ते समय पूर्ण रूप से यह ध्यान रखा गया है कि इसकी मौलिकता बनी रहे। 'काव्य सेतु' की विषय-वस्तु हमारे पुरातन ग्रंथों से प्रेरित है और यह मेरे लिए गर्व का विषय है कि मैंने काव्यालंकरण की इस प्रक्रिया में महानतम हिन्दू इतिहास की शरण ली।
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