खजुराहो शब्द के ऊच्चारणमात्र से 'शिक्षित' जनमानस में रची-बसी जिस अर्थ की प्रतिध्वनि गूंजने लगती है उसी को मन में संजोकर मैं अपने मित्रों के साथ पहली बार वहाँ सैर-सपाटे के लिए गया था।
खजुराहो में वास्तुशिल्प और मूर्तिकला के विस्मयकारी स्मारकों को देखकर महसूस हुआ कि इन देवालयों पर विराजमान मूर्तियों के बारे में जो कुछ बहुप्रचारित है, यहाँ उससे 'बहुत अधिक और भी कुछ' है जिसके बारे में कला समीक्षकों के पूर्वाग्रह, विदेशी सैलानियों की 'मूलपाप' की अवधारणा से सृजित सांस्कृति दृष्टि और भारतीय परिवेश के कुछ अति शुद्धतावादी विद्वानों के विचारों ने न केवल काफी गोलमाल किया है बल्कि उस पर लगभग यवनिकापात कर दिया है। स्वयं को नैतिकता का विशेषाधिकारी संरक्षक मानने वालों ने तो और भी अगे बढ़कर इस महान कलातीर्थस्थल को अश्लीलता का तपोवन घोषित कर डाला है। खजुराहो-प्रसंग अन्तर्मन में हमेशा मौजूद रहा लेकिन इस दिशा में गम्भीरता के साथ शोधकार्य करने का आत्मविश्वास में दो दशकों तक नहीं जुटा पाया। कारण यह था कि प्राचीन इतिहास, संस्कृति और पुरातत्त्व का विद्यार्थी होने बावजूद कला मेरे अध्ययन का विषय नहीं रही क्योंकि मैं दूसरे समूह से सम्बन्धित विषय का छात्र था। एक बार पुनः इतिहास के विद्यार्थी के रूप में में खजुराहो गया। इसके पूर्व छिटफुट रूप से सम्बन्धित साहित्य के कुछ ग्रन्थों का अध्ययन कर चुका था, जिनमें अनेक भ्रान्तिमूलक, असत्य और खींचतान कर आरोपित की गई मान्यताओं का जबर्दस्त निरूपण था, जिसमें देश-परदेश के बीच कोई सीमारेखा नहीं थी। उदाहरण के लिए एक विद्वान ने लिखा था कि चौंसठ योगिनी मन्दिर के प्रांगण में तीन-चार सौ नर-नारी अमर्यादित तान्त्रिक अनुष्ठानों में भाग लेते थे जबकि वास्तविकता यह है कि वहाँ इतने लोगों के खड़े होने क भी कोई गुंजाइश नहीं है। रत्यात्मक मूर्तिशिल्प से सम्बन्धित 'क्या' और 'क्यों' का सवाल भी बारम्बार मष्तिष्क में घुमड़ता रहा।
इसी परिस्थिति में खजुराहो के मन्दिरों के परिशीलन का निश्चय हुआ लेकिन इसमें आर्थिक बाधा भी साक्षात् मौजूद थी। एक दिन उत्तर-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, इलाहाबाद जाकर मैंने तत्कालीन संयुक्त निदेशक श्री प्रज्ञान राम मिश्र से बातचीत के दौरान अपनी समस्या प्रस्तुत की। उन्होंने मुझ पर विश्वास करके समुचित आश्वासन दिया और कुछ समय बाद उनकी संस्तुत से केन्द्र के पूर्व निदेशक श्री जे०पी० राय ने इस लघु परियोजना के लिए स्वीकृति प्रदान की। एतदर्श मैं उनका हृदय से आभारी हूँ।
खजुराहो से सम्बन्धित यात्राओं, स्थल-पर्यवेक्षण एवं अध्ययन के दौरान कई घटनाएँ-दुघटनाएँ हुईं उनमें से मात्र एक रोचक प्रसंग का उल्लेख करना चाहता हूँ। राष्ट्रीय पुस्तकालय, कोलकाता में अध्ययन के ौरान जब मैंने श्री फिलिप रासन कृत 'ओरिएंटल इरोटिक आर्ट' नामक ग्रन्थ की माँग की तो बताया गया कि एह पुस्तक किसी को पढ़ने के लिए नहीं दी जायेगी। मैंने सहायक पुस्तकालयाध्यक्ष के पास जाकर इसका कारण जानना चहा तो उन्होंने सुकोमल बेरुखी के साथ कहा कि अब हम लोग इसे इश्यू नहीं करते। मुझे यह तर अच्छा नहीं लगा फिर भी कुछ संयत होकर हमने कहा कि मुझे मालूम है कि इस पुस्तक में क्या है और मैं उसी विषय पर शोधकार्य कर रहा हूँ। पुस्तक चूंकि पुस्तकालय में है, अतः उसे पढ़ना मेरा अधिकार है जिससे वंचित करने का आपको कोई अधिकार नहीं है। पुनः उन्हें आश्वस्त करने के लिए यह भी बताया कि में पैतालीस वर्षीय अध्यापक हूँ, अतः आपको किसी दुष्परिणाम के लिए आशंकित होने की आवश्यकता नहीं है। दुबारा उन्होंने एक मासूम तर्क दिया कि इस पुस्तक को इसलिए नहीं दिया जाता कि लोग इसमें से चित्र काट कर चल देते हैं। हमने कहा कि आप पुस्तक दीजिए और आपके द्वारा निश्चित स्थान पर बैठकर में उसे पदूंगा। अन्ततः वे मान गये लेकिन थोड़ी सख्ती के साथ बोले कि आप यहीं मेरे सामने बैठकर मेरी मेज पर पढ़िये। मैंने वैसे ही किया। एक मर्मस्पर्शी यह हुई कि रात्रि सात बजे जब मैंने उन्हें यह कहते हुए पुस्तक लौटाई कि इसे कल भी पढ़ना है। उन्होंने पुस्तक लेकर स्वयं तहखाने में जाकर उसे यथास्थान रक्खा और अगले दिन लाकर मुझे दिया, जबकि यह काम वे किसी चपरासी से भी करा सकते थे। उस दिन मुझे कथन का कारण समझ में आ गया था कि 'बंगाल जो आज सोचता है, भारत उसे कल सोचता है।' वस्तुतः बंगाल में पुस्तकों के प्रति श्रद्धाभाव अत्यन्त प्रेरणादायी है।
सर्वप्रथम में खुले तौर पर स्वीकार करता हूँ कि इस पुस्तक के लेखन-प्रसंग में मैंने जिन विद्वानों के ग्रन्थों का अध्ययन किया है उन्हीं की अधिकांश सम्पदा इसमें सुरक्षित है। इसमें हमारा जो कुछ भी है वह अत्यन्त अल्प है। उन प्रतिभाशाली कलामर्मज्ञों के प्रति औपचारिक कृतज्ञता ज्ञापित करके उनके ऋण से मुक्त होना सम्भव नहीं है और मेरी अभिलाषा भी नहीं है, मैं विनम्रतापूर्वक उनके प्रति श्रद्धावनत हूँ। कुछ अपरिहार्य व्यक्तिगत कारणों से इस पुस्तक के लेखन में विलम्ब हुआ, लेकिन उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, इलाहाबाद के वर्तमान निदेशक श्री नवीन प्रकाश ने आत्यन्तिक सदाशयता के साथ मेरे परिश्रम को सार्थकता प्रदान की और इसके प्रकाशन की व्यवस्था की। जिसके परिणामस्वरूप यह पुस्तक का आकार ग्रहण कर सकी है। इसके लिए मैं केन्द्र के प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।
पुस्तक में संग्रहीत छायाचित्रों के लिए मैं श्री राम निरंजन सिंह (बच्चा) का आभारी हूँ जिन्होंने पूरे मनोयोग से मेरे परामर्श का ध्यान रखते हुए अपने कौशल का उपयोग किया। इसी प्रकार पुस्तक की कम्पोजिंग और मुद्रण के लिए श्री कृष्ण कुमार मित्तल जी धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने इस सारस्वत अनुष्ठान को सम्पन्न किया।
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