खजुराहो उ.प्र. के महोबा जिला मुख्यालय से 69 कि.मी. म.प्र. के पन्ना मुख्यालय से 43 कि मी पश्चिमोत्तर तथा म.प्र के छत्तरपुर मुख्यालय से 46 कि.मी. पूर्व में स्थित है। उपर्युक्त सभी स्थानों से सड़क मार्ग द्वारा खजुराहो सुविधापूर्वक पहुंचा जा सकता है। रेल से आने वालों के लिए हावडा-मुम्बई लाइन पर सतना स्टेशन से तथा झांसी-मानिकपुर लाइन पर झांसी, हरपालपुर और महोबा स्टेशनों से यहां के लिए बस सुविधा उपलब्ध है। अब दिल्ली, भोपाल, बाराणसी से खजुराहो के लिए सीधी रेल सेवा उपलब्ध है। खजुराहो में एक आधुनिक विमानतल बी है। खजुराहो का नाम सुनते ही हमारा मन एक अनिर्वचनीय कल्पना से झंकृत हो उठता है और हम मिथुन मूर्तियों के स्वप्नलोक में विचरण करने लगते हैं। जिसने खजुराहो का नाम सुना उसके मन में उसे देखने की अतृप्त आकांक्षा और अधिक बलवती हो उठती है और जिसने उसे देखा उसके मानसपटल पर इन प्रतिमाओं की विभिन्न भाव-भगिनाएं एक सम्पूर्ण दृश्य के रूप में उभरकर उसे भाव विभोर कर देती है। कला समीक्षकों और विद्वानों के विचार से कला का यह रूप अदभुत है और मंदिर स्थापत्य की रूप सज्जा में अद्वितीय। यही कारण है कि जनमानस में मिथुन मूर्तियों खजुराहो कला का पर्याय बन गयी है। खजुराहो के मंदिर भारतीय कला निधि के मकरध्वज है। वे आकार सौन्दर्य और मूर्ति सम्पदा के अनेक तत्वों की दृष्टि से भारत के किसी भी भाग में विद्यमान देव प्रासादों की तुलना में अद्वितीय है। तुलनात्मक पद्धति से खजुराहो मंदिरों का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि इसके दो वर्ग है-पहले वर्ग में चौसठ योगिनी, लालगुवां, महादेव, ब्रह्मा और वराह मंदिर है तथा दूसरे वर्ग में शेष मंदिर है। यहां के प्रथम वर्ग सहित सभी स्थानीय मंदिरों ने खजुराहो शैली के विकास में अपना निश्चित योगदान दिया है। ये मंदिर तलछन्द एवं उर्ध्वछन्द में अपनी निजी विशेषताएं रखते हैं। ये प्राय ऊँची जगती पर बनाये गये हैं और चारों ओर से किसी भी प्रकार की दीवार से आवृत नहीं है। इसीलिए आसपास के परिवेश से ये देवप्रसाद अत्युच्च प्रतीत होते है। स्थिति या तलछन्द में ये लैटिन क्रास के समान है, जिनकी लम्बी मुजा पूर्व से पश्चिम की ओर बनाई गई है। मंदिरों के तीन प्रधान अंग गर्भगृह, मण्डप और अर्धमण्डप है। गर्भगृह और मण्डप के बीच अन्तराल है। यहां पूर्ण विकसित कलाशैली के मंदिरों में अन्तः प्रदक्षिणापथ और महामण्डप का भी निर्माण किया गया है। एक ही धुरी पर निर्मित उपर्युक्त भाग बाहर और भीतर से इस प्रकार संयुक्त है कि उनका स्वरूप अत्यन्त संगठित और एकरूप बन पड़ा है। उपर्युक्त देवप्रसाद आयोजना में खजुराहो शैली की विभिन्न स्थितियों यथा शैशव, कैशोर्य और प्रौढावस्थाओं का पूर्ण परिचय मिलता है। दसवीं शती ई चन्देल कला के इतिहास में विशेष महत्व रखती है। इस समय गुर्जर प्रतीहार साम्राज्य के पश्चिमी भाग में विकसित कला शैली से चन्देल कला प्रभावित हुई और शीघ्र ही खजुराहो के देवप् खजुराहों में शैव, वैष्णव, शाक्त, सौर और जैन धर्मों के मंदिर है। सामान्य रूप से वास्तु तथा मूर्तिकला सम्बन्धी आयोजनाओं में यहां के मंदिर एक जैसे है। शेव, वैष्णव और जैन मंदिरों की धार्मिक प्रतिमाओं को छोड़कर इनमें कोई अन्तर नहीं है। यहां का पाश्र्वनाथ मंदिर इस विवारधारा का श्रेष्ठ उदाहरण है। इस देवप्रासाद की भित्तियों पर विष्णु शिवबाधा राग, बलराम् हनुमान, अग्नि, काम आदि हिन्दु धर्म के देवताओं का अंकन कभी एकाकी और कभी उनकी देवियों के साथ आलिंगन मुदा में किया गया है। इतना ही नहीं यहां कुछ मिथुन मूर्तियों का अंकन भी उपलब्ध है। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि खजुराहो के मंदिरों में विविध धर्मा से सम्बन्धित मूर्तियों का एक संसार ही विद्यमान है।
खजुराहों के इन मनोरम और गगनचुम्बी देवप्रासादों के निर्माण की प्रेरणा चन्देलों को कहां से प्राप्त हुई? वास्तुकार और शिल्पी स्थानीय थे अथवा दूसरे राज्यों से यहां आये थे। वास्तुकारों और शिल्पियों में क्या सम्बन्ध था? क्या खजुराहो राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र था अथवा मात्र धार्मिक केन्द्र था? अगर यहां चन्देलों की राजधानी थी, तब राजाओं के महल कहां गये? खजुराहो शिल्पों में अंकित शैवाचार्य किसी एक मत तक सीमित थे अथवा अनेक मतों तक। ये अनेक ऐसे प्रश्न है जो अनुत्तरित है। संभव है भविष्य में विद्वान इस पर काम कर किसी निष्कर्ष तक पहुंचने का प्रयत्न करेंगे। खजुराहो की खोज का श्रेय टी.एस. बर्ट (ज.बी.ए.सो. खण्ड 8. पृष्ठ 159-84) को है। वे एक ब्रिटिश अभियन्ता थे और उन्होंने 1838 ई. में खजुराहो का भ्रमण किया था। उन्होंने अपनी रपट में विश्वनाथ, नन्दी, लक्ष्मण, वराह और मतंगेश्वर मंदिरों का उल्लेख किया है। इनमें से मतंगेश्वर मंदिर सक्रिय पूजा में था। उन्होंने बंग के संवत 1002 के अभिलेख को विश्वनाथ मंदिर के समीप पाया था। इस लेख की प्रतिलिपि भी उन्होंने ही सबसे पहले तैयार की थी। 1852 से 1885 के मध्यवर्ती समय में कनिंघम ने खजुराहो का व्यापक सर्वेक्षण किया और यहां के मंदिरों, टीलों, स्फुट मूर्तियों और अभिलेखों पर एक रपट तैयार की और उसे आर्केलाजिकल सर्वे रिपोर्ट, खण्ड 27. 10 और 21 में 1871 से 1885 ई. के बीच प्रकाशित करायी। कर्निधंम के बाद अनेक विद्वानों, कला इतिहासकारों और उत्साही लोगों ने खजुराहो के बारे में लिखा है और यहां के चित्रों को प्रकाशित कराया है। इन उत्साही लोगों में लापेल ग्रिफिन का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसके चित्र 1880 ई. के पहले के खजुराहो की अवस्था का बखान करते हैं। 1904 ई से खजुराहो के मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की निगरानी में आ गये। अतः सर्वे और छतरपुर रियासत के सहयोग से खजुराहो में जीर्णोद्वार का काम प्रारम्भ हुआ। किन्तु सर्वे ने पूरी तरह जब खजुराहो के मंदिरों को अधिग्रहीत कर लिया, तभी जीर्णोद्वार के काम में गति आयी। कर्निघम की रपटें प्रकाशित होने के बाद सबसे पहले 1927 ई. में खजुराहो पर बी.एल. धामा की एक लघु पुस्तिका प्रकाशित हुई। ए गाइड टू खजुराहो शीर्षक यह पुस्तिका अंग्रेजी में थी। तत्पश्चात 1953 ई. में इसका संशोधित संस्करण एस.सी. चन्द्रा के सहलेखन के साथ प्रकाशित हुआ।
जन्मस्थानः बांदा, उ.प्र जन्मतिथिः 10.12.1942. एम.ए. 1962 प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्त्व, सागर विश्वविद्यालय पीएच.डी. 1973, विन्ध्यक्षेत्रा का ऐतिहासिक भूगोल, सागर विश्व-विद्यालय पुरस्कार 1. भगवानदास सपफड़िया पुरस्कार, सतना, 1996. 2. नीरज न्यास पुरस्कार, सतना, 2014. 3. सारस्वत सम्मान, झांसी, 2014. 4. दीवान प्रतिपाल सिंह स्मृति सम्मान, पहरा, 2015 शोध तेरह छात्रों को पीएच.डी. प्राप्त आजीवन सदस्य 1. म.प्र. इतिहास परिषद, भोपाल 2. इण्डियन हिस्ट्री कांग्रेस, दिल्ली 3. भारतीय मुद्रा परिषद, वाराणसी 4. एपिग्रापिफकल सोसायटी ऑपफ इण्डिया, मैसूर 5. मरुभूमि शोध संस्थान, डूंगरगढ़, राजस्थान प्रकाशन 1. खजुराहो, मैकमिलन, 1980. 2. विन्ध्यक्षेत्रा का ऐतिहासिक भूगोल, छत्ए छमू क्मसीप, 1987 3. ऐतिहासिक भारतीय अभिलेख, जयपुर, 1992. 4. भारत का राजनीतिक इतिहास, म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, 2004. 5. भारत की सांस्कृतिक विरासत, इलाहाबाद, 1993. 6. भारतीय पुरातत्त्व के तत्त्व, इलाहाबाद, 2014. 7. खारवेल और उसका राजत्वकाल, बी.आरपब्लिशिंग कारपोरेशन, दिल्ली, 2018. 8. उत्तर भारत का राजनैतिक इतिहास, इलाहाबाद, 2019. 9. कालिंजर का इतिहास, बी.आर. पब्लिशिंग कारपोरेशन, दिल्ली, 10. बुन्देलखण्ड का इतिहास 11. त्रिपुरी के कलचुरि राजवंश
खजुराहो के मंदिर भारतीय कलानिधि के मकरहता है। वे आकार सौन्दर्य और मूर्तिसम्पदा के अनेक तत्त्वों की दृष्टि से भारत के किसी भी भाग में विद्यमान देवप्रासादों की तुलना में अद्वितीय है। खजुराहो का नाम सुनते ही हमारा मन एक अनिर्वचनीय कल्पना में झकृत हो उठता है और हम मिथुन मूर्तियों के स्वप्नलोक में विचरण करने लगते हैं। जिसने खजुराहो का नाम सुना उसके मन में उसे देखने की अतृप्त आकाक्षा और अधिक बलवती हो उठती है और जिसने उसे देखा उसके मानस पटल पर इन प्रतिमाओं की विभिन्न भाव भंगिमायें एक सम्पूर्व दृश्य के रूप उभर कर उसे भाव विभोर कर देती है। कला का यह रूप अद्भुत है और मंदिर स्थापत्ये की रूप सज्जा में अद्वितीय। खजुराहो पर हिन्दी भाषा में लिखी गई यह पहली पुस्तक है जिसमें यहां की कला और वास्तु का सांगोपांग वर्णन किया है।
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