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महात्मा स्वस्ति- Mahatma Swasti

CA$24
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Specifications
Publisher: India Netbooks Private Limited, Noida
Author Harisuman Bisht
Language: Hindi Text
Pages: 37
Cover: Paperback
8.50x5.50 inch
Weight 60 gm
Edition: 2026
ISBN: 9789393028143
BA1561
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Book Description

 

 

दो शब्द


पिछले दो वर्ष में की गयी यात्राएँ मेरे लिए महत्त्वपूर्ण रहीं। ये यात्राएँ सामान्य सैरसपाटा जैसी थीं, किन्तु कई बार सोचता हूँ, कई यात्राएँ सामान्य होते हुए भी मनोरंजन के साथ-साथ मानसिक रूप से भी काफी समृद्ध करती हैं। क्रमशः लुम्बिनी, वियतनाम, भूटान और फिर श्रीलंका की यात्रा से मुझे ऐसी ही अनुभूति हुई। यहाँ की यात्राओं में जाना केवल घूमना-फिरना, खाना-पीना नहीं था, कई प्रश्न मन में उमड़-घुमड़ रहे थे, जो वर्षों से परेशान कर रहे थे, जिनका उत्तर प्राप्त करना था, जोकि अभी तक अनुत्तरित ही हैं। न मालूम कब तक प्रश्नों को यूँ ही अनुत्तरित रहना होगा।


मैं अपनी यात्राओं में भगवान बुद्ध और सम्राट अशोक के जीवन वृत्त को समझने का प्रयास कर रहा था और उनसे सम्बन्धित प्रश्न मेरी जिज्ञासा के ही थे। इस अवधि में कई पुस्तकें पढ़ने को मिलीं और कई महत्त्वपूर्ण शोधपरक सामग्री के स्त्रोतों में प्रवेश का अवसर मिला। हर स्रोत में असीम ज्ञान का भंडार, जिसमें से पलांश भर भी समझ लेना जीवन के होने को जैसा समझ लेना था, जोकि इतना आसान नहीं था। किन्तु, हर प्रयास के उपरान्त यह तृप्ति अवश्य हुई कि जीवन को समझना एक जन्म में संभव नहीं, किन्तु पुनर्जन्म भी तो किसी ने अब तक देखा ही नहीं है। ऐसा भी मेरा मन का संशय था। फिर भी, मुझे जितना भी जानने और समझने का समय मिला, मैंने उसे अवसर में बदलने का भरपूर उपक्रम किया। इन देशों के जन मानस में भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का अत्यंत प्रभाव रहा है। यहाँ धर्म भी बुद्ध का ही धर्म है। बौद्ध धर्म होने के कारण यहाँ स्तूप और विहार बहुतायत में हैं। मेरे लिए यह जानना कि भगवान बुद्ध की दृष्टि में मनुष्य अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित रहकर ही मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। उसकी प्राप्ति के सभी को सामान अधिकार हैं।


यद्यपि मुझे किसी मोक्ष प्राप्ति की अवधारणा पर न विश्वास था और न ही ऐसी कोई इच्छा शक्ति ही है। मेरे लिए इस धारणा का उत्तरार्ध महत्त्व रखता है। भगवान बुद्ध की इस अवधारणा को सर्वोच्च मानते हुए कि उन्होंने समान शिक्षा- दीक्षा पर बल दिया था। अपने धम्म में एकता के व्यवहार पर अधिक जोर दिया था। दलितों तथा सेवक-सेविकाओं सभी को भिक्खु भिक्खुनियों का सामान अधिकार दिया। जिनके सम्बन्ध में अनेक कथाएँ, उपकथाएँ पढ़ने को प्राप्त हो रही थीं।


भारत ऋषि मुनियों की पावन भूमि है। समय-समय पर इस महान भूमि में महापुरुष जन्म लेते रहे हैं। उनकी जीवन दृष्टि, उनका प्रभावशाली व्यक्तित्व हमें किसी न किसी रूप में बराबर लाभान्वित करता रहता है। जिनमें से कुछ महापुरुषों के जीवन ने मुझे इन यात्राओं में भी अत्यधिक प्रभावित किया। उनमें भदंत उपालि, महात्मा स्वस्ति, थेरीमाता खुजुत्तुरा, अम्बपाली, सुप्रबुद्ध और अंगुलिमाल प्रमुख थे, जिन्हें बुद्ध ने दीक्षित किया था। जब मैं इन महापुरुषों के विषय में पढ़ रहा था तो लगा, इनके जीवन वृत्त, इनके उपदेशों को समझना आज की जरुरत है। उसी समय इच्छा बलवती हुई कि क्यों न इन महापुरुषों का जीवन परिचय आज के किशोरों से करवाया जाये, जो दुनिया में व्यक्तियों को बेहतर मनुष्य बना सकते हैं। इसके लिए मैंने महात्मा स्वस्ति को चुना। जिन्हें महात्मा स्वास्ति के नाम से भी जाना जाता है। मेरे लिए एक दुविधा यह थी कि मुझे किस नाम का शब्द संबोधन का चुनाव करना है।


मैंने अधिक न उलझ कर महात्मा स्वस्ति नाम को चुना, जोकि संस्कृत का मूल शब्द है। इसकी व्युत्पत्ति का अर्थ कल्याण या सौभाग्य से जुड़ा हुआ है। यद्यपि स्वस्ति शब्द का एक अर्थ देना संभव नहीं, फिर भी, हिन्दू धर्म में इसे शांति के रूप में लिया जाता है। स्वस्तिक प्रतीक के रूप में दैनिक जीवन के कार्यकलापों में प्रयोग में आता है। यह किसी तरह की नकारात्मकता को स्वीकार नहीं करता, सम्पूर्णता में सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण शब्द है।


असल में महात्मा स्वस्ति एक चरवाहे के पुत्र थे। बचपन में माता-पिता के देहांत के उपरान्त अपने भाई-बहन के पालन पोषण की जिम्मेदारी उन पर आ गयी। मालिक के मवेशियों की सेवा से जितना भी भोजन की सूखी रोटियों के रूप में प्राप्ति होती थी, उसे अपने छोटे भाई-बहन के साथ मिल-बाँटकर खाते थे। न अपनी खेती बाड़ी थी, न कोई पुस्तैनी काम था। पिता जब तक जीवित रहे, उसी मालिक के मवेशियों को चराते रहे और उसी विरासत को स्वस्ति को सौंप गए। बस, किसी तरह स्वस्ति का जीवन चल रहा था। बालक स्वस्ति की एक दिन वन में भिक्षु गौतम पर दृष्टि पड़ी तो आश्चर्य चकित होकर उनसे मिलने चल पड़े। स्वस्ति की मेहनत, कर्मठता और एकात्मकता को देखकर गौतम ने उन्हें अपना शिष्य स्वीकार कर लिया। और स्वस्ति भी गौतम के होकर रह गए।


स्वस्ति आजीवन भगवान बुद्ध के साथ रहे और उनके लोक कल्याण के उपदेशों को जन-जन तक प्रचारित करते रहे। अपनी कठोर मेहनत, निष्ठा से उन्होंने गौतम के हृदय में स्थान भी बना लिया था। बताया जाता है कि एक बार भगवान बुद्ध ने संबोधि प्राप्ति के पूर्व अपने साथियों को, जो तपस्वी और त्यागी थे- जिनमें स्वस्ति भी एक थे, उन्हें अपने शिष्यों की भाँति समझाते हुए कहा कि सफलता का मूल तत्व यह अर्थात काया कष्ट और विलासिता नहीं है। इस संसार को काया कष्ट एवं कलेश देने वाले लोग भी अज्ञानी हैं, क्योंकि इन दोनों के माध्यमों से अमरत्व मोक्ष, कैवल्य तथा निर्वाण की प्राप्ति नहीं की जा सकती। जबकि किसी भी व्यक्ति के जीवन का मूल उद्देश्य दुःखों से मुक्ति एवं निर्वाण की प्राप्ति ही होना चाहिए। उन्होंने आगे बताया, बोधि, तपस्या से भिन्न तत्व है। क्योंकि जो विभिन्न प्रकार के त्याग एवं तपस्या से भिन्न तत्व है, जो विभिन्न प्रकार के त्याग एवं तपस्या द्वारा अपने शरीर को क्षीण कर देते हैं, उनका मष्तिष्क कमजोर हो जाने से वह जीवन का व्यावहारिक ज्ञान भी नहीं प्राप्त कर पाते, तब भला वे परम तत्व का बोध कैसे प्राप्त कर सकते हैं।


अतः भगवान बुद्ध के उस जीवन के व्यावहारिक ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य स्वस्ति ने किया। अपने कार्य के प्रति समर्पित भावों तथा उपदेशों से वह एक चरवाहे से महात्मा स्वस्ति बने। उसकी कहानी को यहाँ देने का प्रयास किया गया है। उनकी सीख आज भी हमारे जीवन के लिए प्रेरणा दायक तथा बहुत उपयोगी है। प्रस्तुत पुस्तक में भले ही उनके जीवन के छोटे से अंश को किशोरों के समक्ष रखने का प्रयास किया है, किन्तु यह छोटा अंश महात्मा स्वस्ति के जीवन को समझने के लिए काफी है।

 

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