पुस्तक परिचय
नरेश मेहता के साहित्यिक व्यक्तित्व के निर्माण में उनका पारिवारिक जीवन, अनेकों से संसर्ग, आर्ष ग्रंथों का अध्ययन और उसका चिंतन पर प्रभाव, उपनिषद्, वैष्णवता तथा शैव्यता, उत्सवता का महाभाव, मनुष्याश्रित धर्म, असंग जीवन एवं 'स्व' के प्रति अनासक्ति तथा सामासिकतापूर्ण सांस्कृतिक चेतना और आधुनिकता एवं प्रगतिशीलता को भारतीयता से पारिभाषित करने की प्रतिबद्धता का समवेत योग रहा है। इनकी समग्रता तथा संश्लिष्टता से नरेश मेहता के जीवन और साहित्य की आत्मा को समझा जा सकता है। उनके साहित्य में दो ध्रुवों की विपरीतता होने पर भी उनका एकांतिक व्यक्तित्व ही प्रकट होता है। उन्हें कम्युनिस्ट लेखकों की अवहेलना तथा अपमान भी उनके उत्सव के महाभारत की भारतीय चेतना से विमुख न कर सका और वे अपने भारतीय महाभाव और सांस्कृतिक ऊर्ध्वमुख दर्शन के साथ साहित्य सृजन करते रहे और अपने समय में और आज तक उनका यह वैशिष्ट्य विकल्परहित बना हुआ है। नरेश मेहता अपने साहित्य-कर्म से हिन्दी के एक विशिष्ट भारतीयता के साहित्यकार बने रहेंगे और भावी पीढ़ियाँ इसी रूप में उन्हें समादृत करती रहेंगी।
नरेश मेहता हिन्दी के सशक्त लेखक हैं और उन जैसे कई हिन्दी लेखक भी अपने समय के प्रमुख हस्ताक्षर रहे हैं, लेकिन हिन्दी के 'प्रगतिशील लेखक संघ' की वामपंथी साहित्यिक राजनीति ने उन्हें हाशिए पर डाल दिया और पाठ्यक्रमों तक से निकलवा दिया। हिन्दी की मुख्य साहित्य-धारा प्रगतिशील धारा बन गई और जैनेन्द्र, अज्ञेय, चतुरसेन शास्त्री, गुरुदत्त, शिवप्रसाद सिंह, बच्चन, वृन्दावनलाल वर्मा, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, श्यामनारायण पांडेय, पंत, महादेवी वर्मा, दिनकर, निर्मल वर्मा, धर्मवीर भारती आदि अनेक कालजयी लेखकों को चर्चा, पाठ्यक्रम, बहस आदि से बहिष्कृत कर दिया गया और नागार्जुन, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, धूमिल, शमशेर बहादुर सिंह आदि ही हिन्दी के महान रचनाकार स्थापित कर दिये गये। प्रगतिशील धारा ने हिन्दी का जो अहित किया है, वह क्षम्य नहीं है, यहाँ तक की प्रेमचंद की भारतीय आत्मा की रक्षा, राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक चेतना, परम्परागत मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत लगभग 95 प्रतिशत रचनाओं को कपोल-कल्पना, भावुकतापूर्ण, आदर्शवादी एवं अव्यावहारिक घोषित करके उन्हें साहित्य की मुख्य धारा से काट दिया गया और प्रेमचंद को ही प्रेमचंद के विरुद्ध खड़ा कर दिया गया। साहित्य में ऐसी घातक अनीति का खत्म होना
लेखक परिचय
जन्मः 11 अक्टूबर, सन् 1938, बुलंदशहर (उत्तर प्रदेश)। शिक्षाः एम.ए. (हिन्दी) प्रथम श्रेणी, पी-एच.डी., डी. लिट्। विशेषज्ञता-क्षेत्रः प्रख्यात साहित्यकार प्रेमचंद के विशेषज्ञ के रूप में राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित। प्रेमचन्द-साहित्य पर प्रकाशित ग्रंथः कथा सम्राट प्रेमचंद के जीवन, विचार और साहित्य पर विगत 46 वर्षों से अनवरत संलग्न। प्रेमचंद के संदर्भ में परम्परागत मान्यताओं को ध्वस्त कर अकाट्य तों के. के. गोयनका के आधार पर मौलिक शोध और अध्ययन की दिशाओं का संधान। प्रेमचंद साहित्य पर 38 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। इनमें- 'प्रेमचंद के उपन्यासों का शिल्प विधान', 'प्रेमचंद अध्ययन की दिशाएँ', 'प्रेमचंद विश्वकोश (2 खंडों में)', 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य', 'प्रेमचंद का कहानी दर्शन', 'प्रेमचंद नयी दृष्टि नये निष्कर्ष', 'प्रेमचंद साहित्य : भारतीय भूमिका', 'प्रेमचंद वाद, प्रतिवाद और संवाद', 'प्रेमचंद कहानी रचनावली (6 खंडों में)', 'नया मानसरोवर (8 खंडों में)', 'प्रेमचंद की कहानी यात्रा और भारतीयता' जैसे अवस्मिरणीय ग्रंथ उल्लेखनीय हैं। प्रेमचंदोत्तर-साहित्य पर प्रकाशित ग्रंथः प्रेमचंद साहित्य को समर्पित होने के साथ अमेरिका, ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका, मॉरिशस, सूरीनाम, फिजी, नेपाल आदि देशों में रचित अप्रवासी हिन्दी साहित्य के प्रचार, प्रकाशन और पहचान हेतु निरन्तर प्रयासरत। इस प्रयास के लिए ठोस एवं व्यावहारिक योजना को मूर्तरूप देने में अहर्निश प्रयत्नशील। प्रेमचंदोत्तर साहित्य पर 24 से अधिक ग्रंथों की रचना। कतिपय प्रमुख ग्रंथ हैं- 'हिन्दी का प्रवासी साहित्य', 'मॉरिशस की हिन्दी कहानियाँ', 'अभिमन्यु अनत प्रतिनिधि रचनाएँ।
भूमिका
नरेश मेहता से मेरा पहला परिचय व्यक्ति नहीं साहित्यकार से हुआ, तव में दिल्ली विश्वविद्यायल में एम.ए. का छात्र (1959-61) था। उस समय तक अज्ञेय ने दूसरे 'तार सप्तक' (1949) में उनकी कविता 'समय देवता' संकलित करके उनके कवि को हिंदी में प्रतिष्ठित कर दिया था और उनका पहला उपन्यास 'डूबते मस्तूल' भी 1954 में प्रकाशित हो गया था। अपने विद्यार्थी-काल में 'तार सप्तक' की नई कविता को समझना तथा उसकी व्याख्या करना पाठ्यक्रम का अंग था और उस समय नरेश मेहता 'तार-सप्तक' के एक कवि थे और उनका प्रभा-मंडल बना नहीं था। अभी उन्हें लंबी यात्रा करनी थी। उनका जीवन संघर्षशील रहा, जीवन में अकेलापन रहा, पहला प्रेम असफल हुआ, सेना में गये, बौद्ध भिक्षु बने, शासन की नौकरी की और छोड़ी, प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े पर पार्टी की तानाशाही से अलग हो गये, प्रयाग-दिल्ली-भोपाल-काशी-उज्जैन आदि स्थानों पर भटकते हुए जीवन के अंतिम वर्षों में भोपाल के सरकारी निवास में रहे और 22 नवंबर, 2000 को रात के साढ़े ग्यारह बजे योगी की तरह प्राण त्याग दिये। नरेश मेहता स्त्रीविहीन घर में जन्मे थे, पर विडंबना थी कि वे अपनी मृत्यु पर घर में अपनी पत्नी तथा विधवा हो गई पुत्रवधू को छोड़कर चले गये। उनके अकेले पुत्र का देहांत एक दुर्घटना में हो गया था। जीवन-भर संघर्षशील रहे, अभावों में भी रहे, पुत्र की मृत्यु तथा पत्नी को कैंसर होने के बावजूद वे विपन्नता तथा व्यथा में कभी याचक नहीं बने।
Hindu (हिंदू धर्म) (14094)
Tantra (तन्त्र) (1052)
Vedas (वेद) (732)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2142)
Chaukhamba | चौखंबा (3457)
Jyotish (ज्योतिष) (1637)
Yoga (योग) (1213)
Ramayana (रामायण) (1311)
Gita Press (गीता प्रेस) (714)
Sahitya (साहित्य) (25525)
History (इतिहास) (9432)
Philosophy (दर्शन) (3737)
Santvani (सन्त वाणी) (2600)
Vedanta (वेदांत) (120)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist