डॉ. उदयवीर सिंह द्वारा सम्पादित 'नई उमंगे' काव्य संग्रह समाज में व्याप्त विसंगतियों पर प्रहार करता है। बिटिया कविता कोमल कल्पनाओं का प्रतीक है। अनेकों जेबों वाली वेशभूषा गौरख धन्धों का प्रतीक है। अब तो बड़े होने से अधिक, सतत बड़े बने रहना महत्वपूर्ण है। लकीर का फकीर में हरित जी बुद्ध धम्म और भीम बाबा के प्रति श्रद्धाभाव दर्शाते है तो लंका-रावण से अधिक सड़क छाप रावणों को अधिक घातक मानते हैं। मौर्य जी कविताओं में जातिगत एकता + और सामाजिक सम्मान सबके लिये जरूरी मानते हुए दानवता के विरोधी हैं। राजकुमार जी नेताओं की अकर्मण्यता, नवयुवकों की हताशा, शिक्षा का गिरता स्तर तथा गाँधी के तीनों बन्दरों को सचेत करके सार्थकतापूर्ण सोचने को कहते हैं। 'बिटिया की आहें' भ्रूण हत्यारों पर कटु प्रहार करती है। कृष्णपाल 'भारत' परेशानियों को पथ का सारथी तो सारन जी सहकारिता को गरीबी भगाने का मूल मंत्र बताते हैं। साहिल जी अतिथि देवो भवः को आफत स्वीकारते हैं। डॉ. आनन्द 'माँ सबकी' कविता में माँ को यत्र तत्र सर्वत्र पाते हैं। 'नयी उमंगे' की कविताएँ समाज का मार्गदर्शन करके काव्य धर्म का निर्वाह कर रही हैं।
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