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मध्ययुगीन काव्य प्रतिभाएँ: Poetic Talents of Medieval India

मध्ययुगीन काव्य प्रतिभाएँ: Poetic Talents of Medieval India
$8.80$11.00  [ 20% off ]
Item Code: NZA957
Author: रामकली सराफ (Ramkali Sarraf)
Publisher: Vishwavidyalaya Prakashan, Varanasi
Language: Hindi
Edition: 2003
ISBN: 9788171242613
Pages: 186
Cover: Paperback
Other Details: 8.5 inch X 5.5 inch

भूमिका

हिन्दी साहित्य का मध्ययुग अपनी रचनात्मक गरिमा, व्यापकता और विविधता में महत्वपूर्ण रहा है। आचार्य शुक्ल ने इस युग को दो भागों में विभक्त- कर पूर्व मध्यकाल और उत्तर मध्यकाल की संज्ञा दी, जिन्हें क्रमश: भक्तिकाल और रीतिकाल का नाम दिया गया । ये दोनों भक्तियुग और रीतियुग हमारी साहित्यिक परम्परा के ऐसे महत्त्वपूर्ण बिन्दु रहे हैं, जिनके प्रति हमारा आकर्षण आज भी विद्यमान है। रीतियुग पर तो उतना नहीं लेकिन भक्तियुग पर विवाद ज्यादा रहा है। भक्तिकाल पर दीक्षाओं और क्षेपकों पर आधृत इतिहास निरपेक्ष परम्परावादी भाववादी विश्लेषण बहुत मिलता है। इस युग की ठोस, वस्तुपरक और प्रामाणिक विश्लेषण की जरूरत बराबर महसूस होती रही है। जिन सामाजिक-आर्थिक कारणों से इस युग की कविता का अम्युदय हुआ उनकी व्याख्या करना आवश्यक है। इस दृष्टि से वस्तुवादी परिप्रेक्ष्य में इन्द्रियबोध, भावबोध और विचारधारात्मक दृष्टि के द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों के साथ साहित्य के मूल्यांकन के लिए जो आधारभूमि मुक्तिबोध ने प्रस्तुत की थी, वह महत्त्वपूर्ण है-'' किसी भी साहित्य को हमें तीन दृष्टियों से देखना चाहिए । एक तो यह कि किन मनोवैज्ञानिक-सामाजिक शक्तियों से वह उत्पन्न है अर्थात् वह किन-किन शक्तियों के कार्यो का परिणाम है, किन सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रियाओं का अंग है? दूसरा यह कि उसका अंतःस्वरूप क्या है, किन प्रेरणाओं और भावनाओं ने उसके आन्तरिक तत्त्व रूपायित किए हैं? तीसरे उसका प्रभाव क्या है, किन सामाजिक शक्तियों ने उसका उपयोग या दुरुपयोग किया और क्यों? साधारणजनों के किन मानसिक तत्वों को उसने विकसित या नष्ट किया है?'' (मुक्तिबोध रचनावली, खण्ड 5, पू० 292) हमें मध्ययुग के सन्दर्भ में देखना होगा कि यह युग किन परिस्थितियों के बीच जन्मा? उसकी अन्तःप्रकृति और अन्तर्विरोधों का क्या स्वरूप रहा है? निश्चित ही भक्तियुग के संदर्भ में मुक्तिबोध ने साहित्य की सौंन्दर्यवादी समीक्षा के साथ ही समाजशास्त्रीय व्याख्या को महत्व दिया। स्पष्ट ही भक्तियुग में बाह्य आक्रमणकारियों का मुकाबला करने में सामन्ती ताकतें असफल रहीं और धीरे- धीरे आक्रान्ताओं के अधीन होती गयीं। देशी और आक्रामक ताकतों का मनुष्य इतना बौना और आत्मपरस्त था कि अपने-अपने ईश्वर और अपनी-अपनी सत्ता की बात करने लगा। दरअसल मनुष्य इतना टूट चुका था कि इस दौर में उसे जोड्ने का संघर्ष ही मुख्य बना। एक नई गतिशील चेतना और आलोचनात्मक विवेक को विकसित करने का संघर्ष था।

मध्ययुग का लगभग पाँच सौ वर्षों का इतिहास 1400 विक्रम संवत् से 1700 विक्रम संवत् तक पूर्व मध्यकाल और 1700 से 1900 विक्रम संवत् तक उत्तर मध्यकाल जिसमें हिन्दू-मुस्लिम राजाओं के साथ-साथ अंग्रजी शासन की नींव की सूचना मिलती है । तेरहवीं शताब्दी के मंगोलों को पूरी तरह हराकर अलाउद्दीन खिलजी ने अपने विराट साम्राज्य का विस्तार किया, फिर भी यह कोई केन्द्रीकृत राज्य नहीं था । इधर राजपूत राजा बराबर मुसलमान आक्रमणकारियों के विरुद्ध संघर्ष करते रहे। अल्लाउद्दीन के साथ अन्य मुगल शासकों हूमायूँ शेरशाह, अकबर और जहाँगीर का लक्ष्य हिन्दू राजाओं को साधनहीन बनाने का था । मोरलैण्ड ने भी इस स्थिति की ओर संकेत करते हुए लिखा-''इस नीति का परिणाम यह हुआ कि कुछ वर्षो के लगातार प्रयास से राजा, परगनों और गाँव के मुखिया साधनहीन बन गये। घोड़े और हथियार खरीदने के लिए उनके पास पैसे नहीं रहे। एक समकालीन इतिहासकार के अनुसार हिन्दुओं के घर सोना-चाँदी न रह गया और गरीबी के कारण रानियों को मुसलमानों के यहाँ चाकरी करनी पड़ी।'' (अंग्रेजीराज और मार्क्सवाद- 2, पृ० 275) दरअसल मुस्लिम सामन्तों का निरन्तर यह प्रयास रहा कि लगान और महसूलों का स्तर इतना ऊँचा कर दिया जाय कि अदा करने वाले सामन्तों को बरबाद करना आसान हो। यह प्रक्रिया इस हद तक त्वरित हुई कि अनेक राजपूत सामन्तों का खात्मा हो गया और अन्य कईयों ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। किसानों पर भी ग्रामीण कराधानों का बोझ बढ़ाया गया। इसी क्रम में जजिया कर लगाया गया जो किसानों पर एक भारी बोझ था। सिकन्दर लोदी और फिरोज तुगलक आदि मुसलमान शासकों ने हिन्दुओं पर जजिया कर लगाकर और अन्य अनेक दण्ड नीतियों का विधान कर अपने कट्टरतावादी रुख को प्रत्यक्ष किया। कबीरके समक्ष इन स्वेच्छाचारी निरंकुश शासकों के प्रति राजनैतिक संघर्ष चुनौती बनकर उपस्थित हुआ। यही कारण है आर०सी० मजूमदार आदि का यह मानना कि वर्ण-व्यवस्था और जातियों में बंटे इस समाज में इस्लाम समानता की ताजी हवा लेकर आया, उचित नहीं । प्रो० इरफान हबीब और अब्दुल कादिर बदायूँनी ने इस धारणा का खण्डन किया । हिन्दू हो या मुखिम दोनों ही सामन्त सामान्यजन के हितों के विरोधी थे । जन-विरोधी निर्णयों को लेने में उन्होंने कोई गुरेज नहीं किया। बुरी आर्थिक स्थिति के बावजूद उत्पादक शक्तियों का विकास धीमा पर निरन्तर होता रहा। कारीगरों और दस्तकारों की संख्या बढ़ी, कुछ कारखाने भी स्थापित हुए। अकबर के शासनकाल तक आते-आते भारतीय सामाजिक संगठन और अर्थव्यवस्था में बहुत बदलाव आया। सामन्ती मनमानेपन और कट्टरपन के स्थान पर उन्होंने 'दीनइलाही' (सभी धर्मो के समवाय) का पंथ चलाया। जजिया कर से भी प्रजा को मुक्ति दिलवायी । हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही धर्मो के बाह्याचारों, पौराणिक विश्वासों को अस्वीकार किया । इन समन्वयकारी नीतियों का भारतीय सामाजिक- सांस्कृतिक स्थितियों पर गहरा असर पड़ा । केन्द्रीय शासन की स्थिर सामाजिक राजनैतिक स्थितियों ने रीतियुगीन कविता को पनपने का अवसर दिया। वाणिज्यिक कारोबार की स्थितियाँ भी कुछ बेहतर हुई पर सारी वास्तविक सत्ता सामन्तों के हाथ में केन्द्रित थी। फलत: सम्पन्न किसानों, जागीरदारों, वणिकों के साथ-साथ भूमिहीन किसानों, छोटे बनियों, दस्तकारों आदि से जुड़ी जातियों सामाजिक शक्ति के रूप में उभरीं। दरअसल सामन्तों की सारी जरूरतें इन लोगों द्वारा दिए जाने वाले करों, लगान आदि से पूरी होती थीं। प्राकृतिक आपदाएँ करों का बोझ निम्न श्रेणी के लोगों किसानों को भूखों मरने के लिए विवश करती थीं। किसानों की फसल का बड़ा हिस्सा कर अदायगी में और शेष ऋण अदायगी में चला जाता था । प्रो० इरफान हबीब ने इस स्थिति की ओर संकेत करते हुए लिखा कि-'' दिल्ली की सल्तनत की स्थापना के साथ ही कुछ सामाजिक- आर्थिक परिवर्तन हुए। वास्तव में अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316) ने ग्रामीण निम्नवर्ग बलाहार से उसकी छोटी सी जोत योग्य भूमि पर शुल्क में दी गयीं रियायतें तक वापस ले ली थीं। इससे साफ जाहिर है कि निचली जातियों को न केवल अपनी औकात से रहने के लिए विवश किया जाता था बल्कि वे अपने जीवन निर्वाह के लिए सदा से मिलती आयी रियायतों की माँग भी अब नहीं कर सकती थीं । '' इस प्रकार निम्नवर्गीय ताकतों के उठान में बदलती सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों का बहुत बड़ा हाथ था । डॉ० इरफान हबीब और डॉ० रामविलास शर्मा ने इस दौर के पण्य-द्रव्य सम्बन्धों को बारीकी से विश्लेषित करते हुए मध्ययुगीन भक्ति आन्दोलन के साथ उसका ऐतिहासिक सम्बन्ध दिखाया । '' बारहवीं सदी के बाद भारतीय समाज में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। व्यापार की बड़ी-बड़ी मण्डियाँ कायम हुई । इस आर्थिक विकास के फलस्वरूप शहर के कारीगरों और व्यापार की प्रगति से पुराने सामाजिक सम्बन्ध शिथिल होते हैं। सामाजिक सम्बन्धों की शिथिलता से भक्ति साहित्य का सीधा सम्बन्ध है। भारत में जब-जब उद्योग और विनिमय के साथ-साथ नागर सभ्यता का प्रसार हुआ तब-तब वंशगत वर्ण व्यवस्था टूटी है, उसकी जगह कर्मगत वर्ण व्यवस्था का चलन हुआ है।'' (हिन्दी जाति का साहित्य, डॉ० रामविलास शर्मा, पू० 43-44) प्रो० इरफान हबीब के अनुसार इस काल में भवन निर्माण की कला में बड़े पैमाने पर नई तकनीक आयी। कागज उत्पादन बढ़ा। चरखें, करघे में लगे पैडल रेहट के लिए पिन ड्रम गियर, कलईकारी, शराब बनाने की बेहतर तकनीक आदि का तेजी से प्रसार हुआ, शहरीकरण की प्रक्रिया तेज हुई, सोने और चांदी के सिक्कों की ढलाई में बढ़ोत्तरी हुई। व्यापार क्य तेजी से विकास हुआ और शहरों में दस्तकारी के सामानों की मांग बढ़ गयी । इस आर्थिक विकास का लाभ समाज की दस्तकारी और शिल्प व्यापार से जुड़ी निचली जातियों को मिला । स्पष्ट है कि सामन्तवाद के भीतर ही व्यापारिक पूँजीवाद का प्रसार हुआ। यह वित्त का जो चलन हुआ उसका लाभ सिर्फ सामन्तों तक सीमित न रहकर कारीगरों और किसानों को भी हुआ । निम्न जीवन स्तर को जीने वाली दलित शूद्र जातियों में नई चेतना का प्रसार हुआ। भक्ति आन्दोलन के जन्मने के मूल में इसी चेतना ने काय किया इसी के कारण वण आधृत सामाजिक व्यवस्था में टूटन आयी । इस प्रकार बदली हुई आर्थिक-सामाजिक स्थितियों के कारण नये वर्ग सम्बन्ध विकसित हुए सांस्कृतिक-सामाजिक क्षेत्र में नयी भावभूमियाँ तैयार हुई। किसानों और दस्तकारों के बीच पैदा हुई नई जागृति ने विद्रोहात्मक रुख अख्तियार किया, जिसका पुष्ट रूप संत कवियों में देखने को मिलता है। विकसित होती वाणिज्यिक ताकतों के साथ निम्नवर्गीय जातियों और उत्पीड़ित संतों का सम्बन्ध रहा। सामन्ती कूरता उनकी निर्ममता उन्हें व्यापारी कृषक और दस्तकार वर्ग के साथ जोड़ रही थी। नानक देव, दादू ,(धुनिया), पीपा (नाई) कबीर (जुलाहा) धन्ना (जाट) रैदास (चमार) ये संत कवि निर्गुणमार्गी कहलाये। विपरीत जीवन स्थितियों से असन्तुष्ट ये संत कवि सामन्ती कथनों को तोड्ने की छटपटाहट को जीते हैं।

अत: मध्ययुगीन भक्ति काव्य अपने समय के यथार्थ से टकराता हुआ उसका अतिक्रमण करता है। नयी सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था का विकल्प उपस्थित करता है। भक्त कवियों की कविताएँ जनजीवन के एक पक्ष की व्याख्या नहीं करती वरन् उसमें विविध पक्षों का समाहार है। यह आन्दोलन ब्रह्म के साथ मनुष्य की प्रतिष्ठा करता हुआ व्यापक धार्मिक सामाजिक घटना का समेकित रूप लेकर आता है । दरअसल भक्ति आन्दोलन मध्ययुगीन सामाजिक-सांस्कृतिक जागरण की महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया रही है जिसके मूल में धर्म और मानवता की नई चेतना विकसित होती है।

ग्रियर्सन ने सबसे पहले इस पर इसाई धम की दृष्टि से विचार किया, जिस पर आज बहस का मतलब नहीं है। इस्लाम के आगमन को लेकर आचार्य शुक्ल ने अपनी स्थापना दी-' देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर हिन्दू जनता के हृदय में गर्व, गौरव और उत्साह के लिए अवकाश न रह गया। '' (हिन्दी साहित्य का इतिहास, पू० 60) परास्त निराश-हताश जनता को राम और कृष्ण जैसे लोकनायक मिले, जिन्होंने उनके हृदय में उल्लास का संचार किया । अत: आचार्य शुक्ल ने भक्ति साहित्य के लिए अनुकूल मनोभूमि के निर्माण की प्रक्रिया का मनोवैज्ञानिक आधार राजनीतिक पराजयजन्य नैराश्य को माना । जबकि नैराश्य की बात नहीं है, यह शुक्लजी का अपना अन्तर्विरोध है । यहाँ भी उसके मूल में निहित सामाजिक कारणों को ढूंढना होगा। इन कारणों को स्वयं आचार्य शुक्ल ने सूर, तुलसी और जायसी के विश्लेषण के सन्दर्भ में व्याख्यायित किया है। इसलिए हिन्दुओं की नैराश्य भावना भक्ति के उद्गम का स्रोत है, यह कहना गैर साम्प्रदायिक विराट भक्ति आन्दोलन को साम्प्रदायिकता का जामा पहनाना है। यह प्रयत्न आज भी साम्प्रदायिकता की चेतना से ग्रस्त इतिहासकार करते दीखते हैं, जिन्हें आज उस दौर की हिन्-मुस्लिम चेतना के टकराव के धरातल की सामाजिक पृष्ठभूमि में मुस्लिम विरोधी घृणा भाव की जमीन तैयार करनी है। शुक्लजी के जिस कथन को लेकर उन पर साम्प्रदायिक इतिहास दृष्टि का आरोप लगाया गया है वह अपनी जगह है, परन्तु आचार्य द्विवेदी की मान्यता जो शुक्लजी को समेटते हुए प्रत्यक्ष हुई वह भी पूर्णत: वैज्ञानिक हो, ऐसा नहीं है। फिर भी दोनों आचार्यों को साम्प्रदायिक कहकर नकारा तो नहीं जा सकता । निश्चित ही इतिहास को देखने की यह एक संकीर्ण और अनैतिहासिक दृष्टि है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने आचार्य शुक्ल का बिना नाम लिए खारिज करते हुए लिखा कि-'' दुर्भाग्यवश हिन्दी साहित्य के अध्ययन और लोक चक्षुगोचर करने का भार जिन विद्वानों ने अपने ऊपर लिया है, वे भी हिन्दी साहित्य का सम्बन्ध हिन्दू जाति के साथ ही अधिक बतलाते हैं और इस प्रकार अनजान आदमी को दो ढंग से सोचने का मौका देते हैं एक यह कि हिन्दी साहित्य हतदर्प पराजित जाति की सम्पति है । वह एक पतनशील जाति की चिंताओं का मूर्त रूप है, प्रतीक है। मैं इस्लाम के महत्त्व को भूल नहीं पा रहा हूँ लेकिन जोर देकर कहना चाहता हूँ कि इस्लाम न आया होता तो भी साहित्य का बारह आना वैसा ही होता जैसा आज है।'' (हिन्दी साहित्य की भूमिका, पू० 2) इस्लाम न आया होता तो क्या होता? इसका बहुत सटीक हल ढूँढ पाना बहुत मुश्किल है । ऐसी यांत्रिकता विश्लेषण की ऐसी सतही दृष्टि वस्तुगत मूल्यांकन में बाधक सिद्ध होती है। इस पर विचार करना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना कि उनके आने के बाद मानवीय सामाजिक सम्बन्धों पर पड़नेवाला प्रभाव महत्त्वपूर्ण है। मध्यकाल के आविर्भाव से जुड़ी आचार्य द्वय की अवधारणाएँ अपने अन्तर्विरोधों के बावजूद तद्युगीन विषम सामाजिक-सांस्कृतिक राजनीतिक स्थितियों का खुलासा तो करती ही हैं । जबकि और गंभीर और संश्लिष्ट विश्लेषण की आवश्यकता थी। यह सही है कि भारतीय सामन्ती ताकतें बाह्य आक्रांताओं का विरोध करने में समर्थ नहीं थीं। उनकी आपसी कलह और फूट ने मुस्लिम सामन्तों को पैर टिकाने की भूमि प्रदान की । जिससे जनसामान्य के कष्टों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। सामन्त हिन्दू हो या मुसलमान दोनों ने ही निम्नवर्गीय जनता के अन्तर्विरोध समान रहे। देशी सामन्तों की आत्मग्रस्त मानवविरोधी प्रवृत्ति के खिलाफ उतने ही संघर्ष की आवश्यकता थी जितनी कि मुस्लिम सामन्तों की। डॉ० रामविलास शर्मा ने इस आन्दोलन के मूल में निहित परिस्थितियों का समुचित आकलन करते हुए लिखा कि-'' मुस्लिम शासन के प्रतिक्रियास्वरूप भक्ति आन्दोलन का प्रसार हुआ, यह धारणा सही नहीं है क्योंकि भक्ति आन्दोलन का सूत्रपात यहाँ तुर्को के आगमन के बहुत पहले हो गया था। इसके सिवाय भक्ति आन्दोलन का प्रसार उत्तर से दक्षिण के उन प्रदेशों में हुआ जहाँ पर सगुण निर्गुण भक्तों की भक्ति के तत्वों को समान रूप से विश्लेषित करने की कोशिश करते हैं तो कई प्रश्न खड़े हो जाते हैं।

सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि पूर्ववर्ती लोकोन्मुखी संत सूफी कवियों के लेखन कर्म से भिन्न सगुण भक्त कवियों के काव्य में अवधारणात्मक परिवर्तन (एटिट्युडियल चेंज) क्या हुए? क्या सगुणधारा का लेखन भी दलित निम्न जातियों की पीड़ा को शिद्दत से उभारता है न क्या उनका लेखन जनाभिमुख है' कबीर हो अथवा तुलसीदास हमें प्रत्येक कवि के भावबोध को समाज के बीच रखकर ही देखना होगा । उनके अन्तर्विरोधों की खरी पहचान करनी होगी। देखना होगा कि भक्त कवियों की दृष्टि मानवीयता का कितनी गहराई तक संस्पर्श कर सकी है? सामन्ती जीवन पद्धति जिस जीवन रस को सोख रही थी सूर, जायसी ने वहाँ सरस धारा के सोते को प्रवाहित किया। सूर ने लोक कथनों को तोड़ा । उनके यहाँ जीवनप्रियता और उत्सवधर्मिता है। सूरसागर का प्रेम मानव जीवन का प्रेय है। वह लोक से न्यारा नहीं सामंती समाज से न्यारा है। सामंती बंधनों से मुक्त उन्मूक्त, स्वच्छन्द है। मीरा ने सामन्ती रूढ़ जीवन मूल्यों की चुनौतियों को स्वीकार कर अन्दरूनी दबावों, को झेलते हुए उनके खिलाफ संघर्ष किया । मीरा की भक्ति प्रतिरोध की ' प्रोटेस्ट की भक्ति है।

इस प्रकार भक्तिधारा में निर्गुण के साथ सगुण मत का अन्तर्मिश्रण हुआ। इन दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं को ज्ञान और भक्ति के द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों के बीच रखकर देखना होगा। दोनों के भीतर मध्ययुगीन जीवन मूल्यों के समान सकारात्मक पक्षों की तलाश दृष्टि के पारदर्शी होने में सन्देह पैदा करती है। सगुण भक्ति में बदलती सामाजिक स्थितियों में अनेक पौराणिक कर्मकाण्डीय प्रवृत्तियों के प्रति विरोध भाव व्यक्त करते हुए भी ब्राह्मण वर्चस्व के प्रति अतिरिक्त सजगता दीखती है जिसे निम्नवर्गीय दलित संतों ने चुनौती दी थी । उन्होंने निर्गुण और सगुण को लोक और शास्त्र के द्वन्द्व के रूप में देखा, दोनों को एक जैसा मानते हुए डॉ० नामवर सिंह ने लिखा कि-' ' राजसत्ता भक्तों के लिए सर्वथा उपेक्षा की वस्तु थी-उसके प्रति भक्तों के मन में न तो किसी प्रकार की भक्ति का भाव था न विरोध का ।'' (दूसरी परम्परा की खोज, पू० ५६) यह बहुत सही नहीं लगता, क्योंकि कबीर आदि संतों में राजसत्ता की उपेक्षा जोरदार स्वरों में मिलती है पर सगुण भक्तों के बारे में कहना ठीक नहीं है । दरअसल भक्ति का महिमामण्डन, उसमें निहित भक्तिजन्य प्रेमभाव इस प्रकार के एप्रोच को जन्म देता है, जबकि निर्गुण संतों की व्यापक विद्रोही तीखी दृष्टि सगुण भक्ति में सीमित संकुचित रूप लेकर उपस्थित हुई । संत कवियों का निगेटिव रुख, उनका विरोधभाव जनसामान्य तक संप्रेषित ही नहीं सवहित होता है । उन्होंने न केवल वेद और शास्त्र की जड़ता को अस्वीकार किया वरन् लोकरुढ़ि में मौजूद अंध विश्वासों का भी पुरजोर विरोध किया । जबकि आचार्य शुक्ल और डॉ० रामविलास शर्मा सगुण भक्ति को भागवत धर्म और वैष्णव धर्म का विकास यानि वेदशास्त्र समर्थित स्वीकार किया । आचार्य द्विवेदी ने निर्गुण मत को 'लोकचिता के साथ खडा किया । इस प्रकार भक्ति-काव्य के सन्दर्भ में दो तरह की अवधारणाएँ स्पष्ट हैं, जिसमें भक्ति और योग, लोक और शास्त्र, आध्यात्मिकता और भौतिकता, पारलौकिकता और इहलौकिकता के बीच विरोध और समन्वय के बिन्दु मुख्य बने। इसको डॉ० मैनेजर पाण्डेय ने 'हिन्दी आलोचना का महाभारत' कहा है, 'जिसका कुरुक्षेत्र है भक्तिकाव्य। इसी बाद-विवाद की स्थिति में मुक्तिबोध को सगुण मत' निम्नवर्ग के विरुद्ध उच्चवंशीय संस्कारशील अभिरुचि वालों का संघर्ष 'प्रतीत हुआ जो सही था । कृष्ण भक्ति कई अर्थों में निम्नवर्गीय भक्ति आन्दोलन से प्रभावित थी, लेकिन तुलसीदास की रामभक्ति तो वर्ण व्यवस्था का खण्डन करते हुए भी रामराज्य में उसी का आदर्शीकरण करती दीखती है । वास्तव में लोकधर्म का रूप कबीर से तुलसीदास तक उत्तरोत्तर बदलता चला गया, महाकवि तुलसीदास को लेकर अतिवादी प्रतिक्रियायें भी आयीं। मुक्तिबोध और डॉ० नामवर सिह ने उन्हें 'वर्ण व्यवस्था के पोषक' कवि के रूप में देखा तो आचार्य शुक्ल उनकी सराहना करते नहीं थकते और डॉ० रामविलास शर्मा को तो वे श्रेष्ठ सामन्त विरोधी कवि प्रतीत होते हैं । अन्तर्विरोध तुलसीदास में अवश्य हैं, सामन्ती वर्चस्व से स्वयं को बचा पाना उनके लिए सम्भव न हो सका था। यही कारण है कि उनमें सामन्ती सम्बन्धों में मुक्ति की बजाय सन्तुलन की प्रवृति प्रबल रही। हमें देखना होगा कि कैसे एक बड़ा रचनाकार असंगठित होते बिखरावग्रस्त समाज के सारे वैषम्यों को समेटकर संतुलन देने की कोशिश कर रहा था राम प्रताप विषमता खोई'। उनके विरोध या संघर्ष की दिशा भले ही काल्पनिक हो पर कवि का रामराज्य का यह विकल्प उनके विरोध को अधिक रचनात्मक रूप प्रदान करता है। सामन्ती वर्ग सम्बन्धों, चरित्रों, सामन्ती ढाँचे के पक्ष में जब महाकवि खड़े होते हैं तो वर्णव्यवस्था के पोषक दीखने लगते हैं, पर अनेकश: उन्होंने वर्ण व्यवस्था पर चोट की है।

दरअसल उस दौर में सामाजिक अन्तर्विरोधों की झलक विरोध और समन्वय के भीतर मिलती है, जिसे कबीर, जायसी, सूर, मीरा, तुलसी ने अपने-अपने स्तर से अभिव्यक्त किया। इन कवियों ने ब्रह्मलीन आनन्दावस्था को प्रेम के साथ जोड़कर ही देखा। प्रेम ऐसा मूल तत्त्व है, जिसे दोनों धाराओं के कवियों में समान रूप से अवस्थित देखते हैं। इस प्रेमतत्त्व ने अनेकता में एकता स्थापित करने का कार्य किया । राष्ट्रीय स्तर पर जनसामान्य को एकसूत्र में पिरोया । प्रेम को हम भक्ति आन्दोलन की आत्मा के बहाव के रूप में देख सकते हैं। जो भी आध्यात्मिकता यहां उभरी है, उसके केन्द्र में मनुष्यता रही है। जहां भी सगुण भक्त कवि शास्त्र सम्मत विधियों के साथ अपने को खड़ा करते हैं, वहाँ उनका सीमित नजरिया ब्राह्मणवादी विचारधारा की पुष्टि करने लगता है । बावजूद इसके भक्तिकाव्य की लोकपरकता अद्वितीय है। जीवन की सच्ची परिस्थितियों को सीधे-सीधे आत्मसात कर मार्मिकअंकन करना भक्त कवियों की खासियत है । उन कवियों ने रचनात्मक प्रयोगात्मक वैविध्य के धरातल पर भी लोकजीवन में समाहित नया रूप-विधान ग्रहण किया जो लोकपरम्पराओं की ऊर्जा और जीवंतता से सम्पृक्त था । लोकरूपों का वैविध्य संस्कृत की अभिजात्य परम्परा को तोड़कर अस्तित्व में आया । देशी जन भाषाओं में लोकसंस्कृति और लोकसंवेदनाओं की यह अभिव्यक्ति सामन्त विरोधी प्रकृति की द्योतक है । पर्व, उत्सव और प्रवृति के बीच रचा-बसा जनजीवन अपनी प्रामाणिक पहचान बनाने में समर्थ रहा । लोक-जीवन में सांस्कृतिक क्षेत्रों का जितना फैलाव है उतनी गहराई भी है। झूलना, हिडोला, चाँचर, होली, सोहर आदि लोकरूप, लोक जीवन की उपज हैं। विघटित होती सामन्ती व्यवस्था के बीच जनसामान्य की सहज भावनाओं, मनोवृत्तियों से रिश्ता कायम करता यह आन्दोलन हिन्दी साहित्य के इतिहास में समृद्धत्तर युग के रूप में व्याख्यायित हुआ।

मध्य युग के उत्तरार्द्ध तक आते- आते सामन्ती ताकतें सिर उठाने लगीं और विरोध भाव जो संत भक्त कवियों के यहां अभिव्यक्त हुआ था, कमजोर पड़ने लगा । भक्ति धारा का वह आवेग क्रमश: अवरुद्ध होता चला गया, जन पक्षीय सौन्दर्य-दृष्टि क्षीण होती गयी और कलापक्ष की प्रधानता के साथ ही रीतियुग का प्रारम्भ हुआ । सवाल उठता है कि भक्तियुगीन व्यापक आन्दोलन के बाद साहित्य पुन: संकुचित, सीमित परिधि में क्यों सिमट गया ' धर्माचार्यों द्वारा पैदा की गयी साम्प्रदायिक कट्टरता को संत भक्त कवियों ने कम किया था, पर बाद में यह कट्टरता बढ़ी और रीतिवाद का पुनरुत्थान हुआ।

रीतिकालीन यह काव्य परम्परा हिन्दी भाषी प्रदेश में सामन्त वर्ग की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक परम्परा है। यह परम्परा एकबारगी नहीं पनपी बल्कि भाषा की आभिजात्यता, कथ्य की वक्रता, कल्पना की उड़ान सगुण काव्य में ही उसकी झलक दीखने लगी थी। दरअसल सामाजिक परिवर्तन अप्रत्याशित नहीं होते उसके पीछे निर्माण की लम्बी पृष्ठभूमि होती है। तुलसीदास के समय से ही एक नये ढंग का जातीय-सांस्कृतिक विचलन उपस्थित होने लगा था। वर्णाश्रम व्यवस्था, जातिवाद, भाग्यवाद आदि को पुर्नस्थापित करने का प्रयास हुआ। सामाजिकता के पौराणिक आदर्शो को लोकमर्यादा का रूप दिया गया। धर्म सम्बन्धी जिन रूढ़ अन्य-आस्थाओं को भक्ति विवेक सम्पृक्त कर रही थी, वह फिर अन्तर्विरोधों से घिर गयी।

मानवतावादी उदारता के साथ-साथ वर्ण व्यवस्था के प्रति कट्टरता अस्तित्व में आयी। मुक्तिबोध ने सही लिखा कि-जो भक्ति आन्दोलन जनता से शुरू हुआ और जिसमें सामाजिक कट्टरपन के विरुद्ध जनसाधारण की सांस्कृतिक चेतना, सांस्कृतिक आशा-आकांक्षाएँ बोलती थीं, उसका मनुष्य सत्य बोलता था। इसी भक्ति आन्दोलन को उच्चवर्गीयों ने आगे चलकर अपनी तरह बना दिया और उससे अपना समझौता करके, अनन्तर जनता के अपने तत्वों को उनमें से निकालकर उन्होंने उस पर अपना पूरा प्रभुत्व स्थापित कर लिया। (मुक्तिबोध रचनावली, खण्ड 3, पू०237) इस प्रकार भक्तिकाल से ही रीतियुग के बीजसूत्र मिलने लगे थे, भक्ति का प्रभाव भी रीतियुगीन कवियों पर था। इस दौर में भक्ति की विभिन्न धारायें और सम्प्रदाय थे, पर उनमें कोई जीवन्तता, आवेग न था वरन् प्रवृत्तिगत जड़ता प्रधान हो गयी। रीतियुगीन कवि भी भक्त होने का दावा करते हैं। उन्होंने 'राधा कन्हाई के सुमिरन' का बहाना तो किया ही लेकिन यह प्रवृत्ति क्षीण ही रही। उनकी कविताएँ भक्तियुगीन सरसता, जीवन्तता के निकट भी नहीं पहुँच सकीं। भक्ति का आवेगात्मक प्रवाह बौद्धिकता में सिमटकर रह गया। यहाँ अहम सवाल खड़ा होता है कि भक्ति के अजस्र प्रवाह में हिचकोले लेता साहित्य रीतिकालीन संकुचित परिधि में शृंगार और नायिका भेद तक सिमट कर क्यों रह गया? डॉ० नामवर सिंह के शब्दों में कह सकते हैं-'' यदि आरम्भ के शास्त्र निरपेक्ष निर्गुण काव्य की शास्त्र सापेक्ष सगुण परिणति की ओर ध्यान दें तो शास्त्रीयतावाद के पुनरूत्थानवाद के रूप में रीतिकाव्य के प्रसार की संगति लग जाती है।'' (दूसरी परम्परा की खोज, पू० 85) निर्गुण काव्य की व्यापकता, उसकी उष्मा, ओजस्वी तेवर सगुण भक्ति धारा में आकर सीमित नरम रुख ग्रहण कर लेते हैं। आगे चलकर सगुण भक्ति के ढर्रे पर रीतियुगीन कविता का विकास होता है। सूर के कृष्ण रसिकों के आदर्श बन गये, नायिकाओं के अनेक भेदों का चित्रण सूर ने किया है। नन्ददास ने नायिका भेद पर स्वतन्त्र अथ ही लिख डाला। राधा-कृष्ण के भोग विलासमय चित्रों की बात ही क्या? राम जिनकी पूरी युवावस्था बनवास में ही बीती उन्हें भी रीतिकाल के प्रवाह में भोग-विलास में लिप्त दिखाया गया। सन्त कवियों की भाषायी अटपटी सपाट बानी आभिजात्य रूप ले लेती है । लेकिन सूर तुलसी की ब्रजभाषा उनके कवित्त-सवैयों का विकसित रूप रीतिकालीन कविता में देखने को मिलता है। निश्चित ही भक्ति आन्दोलन का उदात्त सांस्कृतिक प्रवाह दरबारी चमत्कारिक वृत्तियों में सिमटकर रह जाता है। मौलिक उद्भावनाओं के स्थान पर रस, अलंकार छंद, नायिका- भेद आदि के क्षेत्र में संस्कृत की पुरानी क्लासिक परम्परा का सतही, उथला पुनरूत्थानवादी रूप लिए कविगण उपस्थित होते हैं। फिर संस्कृत की पन्द्रह सौ वर्ष पुरानी समृद्ध परम्परा का पुनर्वतरण क्योंकर सम्भव था, उसका पिष्टपेषण ही हो सकता था। अत: समाज के बहुआयामी पक्षों से कटकर काव्यशास्त्रीय लक्षण क्र-थों में आबद्ध हो काव्यकौशल अभिव्यक्त होने लगा। रीति साहित्य में उक्ति भंगिमा, अतिरंजित चमत्कार युक्त आलंकारिक चित्रणों की भरमार हो गयी जो राजाश्रयी राजाओं की विलासी मानसिकता को परितृप्त करती थी। आधुनिक युग में प्रगतिशील जनपक्षधर कविता के बाद इसी प्रकार का प्रभाव प्रयोगवादी कवियों में देखने को मिलता है, जहाँ कविगण पूँजीवादी संस्थानों के पक्षधर बनकर अमूर्त्त सूक्ष्म सौन्दर्य-बोध का प्रचार प्रसार करते हैं। उनकी कविताओं में निहित चमत्कारिक भाव कहीं-कहीं जुगुप्सा पैदा करने वाला होता है । रीतिकाल में पनपी भोगवादी प्रवत्ति के कारण नारी के नख-शिख वर्णन के अतिरेक भरे चित्र मिलते हैं। जिसके कारण ताजगी भरे नैसर्गिक सौन्दर्य- बिम्बों का अभाव हो गया । स्वकीया के बजाय परकीया प्रेम की प्रवृत्ति का प्राधान्य हो गया । नायकों की एक प्रेमिका या तीन-तीन प्रेमिकाएँ होंगी, प्रेमिका के भी एक से अधिक प्रेमी हो सकते है न दै भोग विलास का आलंबन मात्र बनकर रह गयी। विलासिता में आपादमस्तक डूबे सामन्तों हेतु विलास-सामग्री का उत्पादन होने लगा जरदोजी कपड़े, गहने, जेवर, इत्र आदि का व्यापक पैमाने पर उत्पादन हुआ। उत्पादन कार्य के लिए यदि कारीगरों की कमी होती थी तो बड़े पैमाने पर लोगों को गुलाम बनाया जाता।

प्रो० इरफान हबीब ने इसका जायजा अपनी पुस्तक मध्यकालीन भारत में लिया है। सामन्त वर्ग की शान शौकत गहने, जेवर, कपड़ों के साथ ही हाथी, घोड़ों की संख्या से आँकी जाती थी। धन एय्यासी के मद में डूबे सामन्त उपभोक्ता संस्कृति को प्रश्रय देते थे। कवियों ने सौन्दर्य के अतिरेकपूर्ण चित्रों को रचा । चित्रण के लिए चित्रण की प्रवृति लक्षण ग्रन्यों के आधार पर मजबूत हुई सहज नैसर्गिक सौन्दर्य गायब हो गया। बिहारी, आलम, बोधा,घनानन्द आदि में सौन्दर्य के अनेक आकर्षक जीवन्त चित्र भी मिलते हैं। दरबार और भक्ति की कविता के साथ ही साथ ऐसी कविताएँ भी इस दौर में लिखी गयीं जिनका सम्बन्ध न तो भक्ति से था न ही दरबार से। दर्शन सम्बन्धी रीति-नीति के दोहे, वीरता सम्बन्धी कवितायें आयीं। भूषण छत्रसाल आदि ने जिमि करुणा मंह वीर रस की अवतारणा की। रीतियुगीन नंगी लोकलुप कविताओं को व्यक्त करने की होड़ में निश्चित ही यह बड़ी उपलब्धि थी। इसी दौर में लाल कवि ने महाराज छत्रसाल का जीवनचरित लिखा 'रीतिकाल में कोई जीवन चरित लिखे यह काम अपने में यथार्थवाद और प्रगति का चिह्न है। इस तरह साहित्य में रीतिवाद का ढांचा टूटा नहीं कई बार झटके खाने के बाद भी लोकवादी साहित्य का विकास होता रहा। (डॉ० रामविलास शर्मा, हिन्दी जाति का साहित्य) इसी से इस प्रश्न का जवाब भी मिल जाता है कि रीतियुगीन कविता की सामाजिक असम्बद्धता को देखते हुए पूरी तरह से उसे नकार देने की बजाय अन्तर्विरोधी परिस्थितियों के विश्लेषण पर दृष्टि निक्षेप आवश्यक है। भक्तियुग की विराट चेतना के निषेध में रीतियुग का प्रारम्भ आध्यात्म की जगह भौतिक सत्य की स्वीकृति थी। ईश्वर के स्थान पर जीवन को केन्द्र में रखना था, जो बड़ी बात थी । लेकिन भौतिक विलासिता के संकुचित घेरे में आबद्ध हो जीवन की व्यापकता छीज गयी, निष्प्राण हो गयी और आध्यात्म के निषेध का भी कोई दार्शनिक आधार उनके पास नहीं था। निश्चित ही इसका कारण तद्युगीन परिस्थितियां थी, जो मनुष्य की इच्छा से स्वतंत्र और ज्यादा बलवती होती हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, आचार्य शुक्ल, डॉ० रामविलास शर्मा, डॉ० नामवर सिंह आदि ने इन स्थितियों के अन्तर्विरोधों को बखूबी विश्लेषित किया है। दरअसल रीतियुगीन साहित्य का अन्तर्विरोध वही था, जो हर जगह सामन्तवाद के अन्दर होता है । सामन्ती समाज में राजसत्ता निश्चित ही भूस्वामी वर्ग के हाथ में होती है। ''जिस समाज में यह साहित्य रचा गया, उसका नेतृत्व सामन्तों के हाथ में था। उन्हीं के दरबारी कवियों ने उसे पुष्पित पल्लवित किया, उसने अपना और अपने अन्नदाताओं का मनोरंजन किया । कुछ आलोचक यह स्वीकार करते हुए भी कि यह परम्परा विकृत है, इसका दोष सारे समाज पर मढ़ते हैं न कि सामन्त वर्ग विशेष पर। लेकिन विलास और अनाचार के जो साधन इन सामन्तों और उनके चाटुकारों को सुलभ थे, वे जनसाधारण को सुलभ न थे। जनसाधारण की काव्य रुचि मूलत: दरबारी काव्य रुचि से भिन्न है। इसलिए पूरे समाज को दोष न देकर सामन्तवर्ग को दोष देना चाहिए जो किसानों की कमाई पर ऐश करते थे । ईश्वर के अंश बनकर धर्म की रक्षा के नाम पर जर्जर सामन्ती व्यवस्था कायम रक्खे थे। यह स्वीकार करना होगा कि साहित्य का सामाजिक आधार होता है, उसपर किन्हीं विशेष वर्गों की रुचि आदि का प्रभाव पड़ता है।'' (डॉ० रामविलास शर्मा, परम्परा का मूल्यांकन, पू० 97) जाहिर है कि रीतिवादी साहित्य सामन्ती समाज की विलासी मानसिकता की परितृप्ति में रचा गया। उच्चवर्गीय इस समाज से विच्छिन्न जनसामान्य की स्थिति दिन--दिन बदतर होती चली जा रही थी । सामन्ती समाज के दमनात्मक रवैये के खिलाफ जनसामान्य के भीतर पैदा हुई जागृति जगह-जगह जनान्दोलनों का रूप लेकर उभरी। किसानों-कारीगरों की मुक्ति की आकांक्षा को लेकर शिवाजी के नेतृत्व में मराठों, सिक्सों, जाटों का संघर्ष पराकाष्ठा पर पहुँच गया । इस प्रकार सामन्ती सामाजिक ढाँचा अपनी विसंगतियों से घिर जाता है और पतनशील परिस्थितियाँ उसे सांस्कृतिक ह्यासोन्यूखता की ओर ले जाती हैं। सामन्ती रूढ़ियों की परिधि के भीतर से ही आधुनिक काल की शुरुआत हुई, अंग्रेजी शासन की नींव पड़ी । आभिजात्य और लोकरुचि के बीच नया सेतु विकसित हुआ। लोक सम्बद्ध धारा अपने अन्तर्विरोधों से सम्पृक्त हो पुन: प्रवहमान हुई।

इस प्रकार प्रस्तुत पुस्तक में मध्ययुगीन उपलब्धियों को विभिन्न निबन्धों में सुसंगत सोच के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास हुआ है। इतनी सुपरिचित और निश्चित विषयबद्धता में उल्लेखनीय मौलिकता का दावा तो बड़ी बात होगी, लेकिन विश्लेषण में वस्तुमूलक दृष्टि का प्रयोग एक हद तक अवश्य हुआ है, जिससे विश्लेषण की प्रमाणिकता और बढ़ी ही है। लेकिन सही निर्णय तो विज्ञ पाठक ही दे सकते हैं।

पुस्तक लिखते समय विद्वद्जनों की जो मदद और प्रेरणा मिली उनके प्रति मैं कृतज्ञ हूँ। पुस्तक पाठकों तक पहुँच सकी, इसका श्रेय प्रख्यात प्रकाशक श्री पुरुषोत्तमदास मोदी को है, उनके प्रति मैं आभारी हूँ।

 

विषय-सूची

भूमिका

v-xvii

1

कबीर साहित्य का समाज-दर्शन

1

2

तुलसीदास गति और प्रगति

10

3

सूरकाव्य का सांस्कृतिक बोध

16

4

जायसी की प्रेम साधना

27

5

रीतिकालीन परिवेश और प्रवृत्तियाँ

36

6

केशव काव्य-प्रतिभा और पांडित्य

44

7

बिहारी : भाषा की समास शक्ति और कल्पना की समाहार शक्ति

70

8

मतिराम और उनकी भाव सरसता

83

9

भूषण : पौरुष और पराक्रम के प्रतीक

96

10

देव विलक्षण पाण्डित्य

105

11

भावमूर्ति पद्माकर

116

12

घनानन्द, साक्षात् रसमूर्ति

125

13

द्विजदेव के काव्य में रस और ऋतु

148

14

ब्रजभाषा काव्य और भारतेन्दु

155

15

ब्रजभाषा काव्य-परम्परा के अन्तिम प्रौढ़ कवि

166

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