कथा वह है जो कही जाये
लोक कथा लोकमुख में रहती है, उसके लिए वक्ता श्रोता दोनों ही अनिवार्य हैं। कथा का कहने वाला एक होता है लेकिन श्रोता कई हो सकते हैं। लोक कथा कहने का रिवाज गांवो में होता है।
दादा-दादी, नाना-नानी अपने बच्चे को कथायें सुनाते हैं। कथा की रचना प्रक्रिया की दो-तीन स्थितियों प्रमुख हैं। पहली स्थिती कथा से लोककथा होने के लिए लोकमुख में आना पडता है और लोकमुख में यही कथा आ पाती है. जिसमें लोकत्व होता है। लोकत्वसे बनता है और उन्हीं से कथा को लोकप्रियता मिलती है। लोकतत्वों मे सबसे लोकोपयोगिता है।
लोक के लिए जो कथा उस समय उपयोगी होती है वह लोक द्वारा ग्रहणीय होने से लोकमुख में आ जाती हैं फिर लोक के सौंधे में दलकर लोककथा बन जाती है। कथा की पृष्ठभूमि लोकानुभवों द्वारा बुनी जाती है. अतएव सहज, स्पष्ट, रजक और असरदार होती है। लोककथा की जड़ उसी अंचल में रहती है और उसी अंचल की जमीन से पोषक तत्व ग्रहण कर वह कथा में नया स्वाद भर देती है।
लोककथा की भाषा और शैली इतिवृत्तात्मक होती है। उसमे शिल्प-अलंकरण सहजता से आ जाते हैं। लोककथा किसी खास वर्ग, जाति, समूह और धर्म के लिए नहीं होती, उसमें तो लोकहित निहित रहता है। अधिकांश लोक कथाओं के अंत में कहा जाता है-
जैसे उनके दिन फिर वैसई सबके फिरें। ये पंक्तियों लोकत्य की प्रतीक हैं।
श्री शिवसहाय चतुर्वेदी ने लोककथा को ग्राम्य कहानी नाम दिया था। श्री कृष्णानंद गुप्त ने लोक कथा के तीन प्रकार माने हैं 1 गाथा, 2. कहानी, 3. दृष्टान्त। लोककथा में कथा की सभी विशेषतायें वाचिकता लिए हुए निहित होती है।
बुन्देलखण्ड में लोककथाओं के लिए 'किसा" कहा जाता है। मेरी समझ में यह मध्ययुग की देन है क्योंकि किस्सा अरबी का शब्द है और उसी से उसका बुन्देलीकरण किसा हुआ है। बुन्देली में फारसी, अरबी आदि विनेदशी शब्दों को बुन्देलीकरण के बाद ही अपनाया गया है।
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