भारतीय संत काव्य अपनी मूल धारणाओं में सांस्कृतिक और मानवीयता का काव्य है। अध्यात्म-चेतना और दर्शन की नींव पर खड़ा यह काव्य एक साथ ही इहलोक और परलोक दोनों को अपनी पहुँच के घेरे में लेता हुआ मनुष्य की एकता का उद्घोष करता और उसमें कर्म के प्रति आस्था और विश्वास जगाता हुआ चलता है। ऊपरी तौर पर यह एक विचित्र विरोधाभास-सा प्रतीत होता है कि यह काव्य एक ओर श्रद्धा और समर्पण भाव भी जगाता है और दूसरी ओर मनुष्य के विवेक को उसकी तर्क शक्ति और बुद्धि व्यवसाय को भी सुरक्षित रखता और उससे पैसा बनाता है। संतों में से अधिकांश ने अपने पठित ज्ञान के आधार पर इस सांस्कृतिक और मानवीय पक्ष का उद्घाटन ही नहीं किया है, बल्कि अपने सहजानुभव और जागतिक व्यवहार के प्रति सजगता के बल पर वे उस भूमिका के निर्वाह में सफल हुए हैं। इसी में उनकी प्रभावशीलता का रहस्य छिपा है। इसी से उनकी रचना समाज-निरपेक्ष होने से बची रही, बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि उनकी रचनाएँ सीधे समाज की चिंता से प्रेरित होकर उपस्थित हुई हैं।
संतों की वाणी में न तो पूरब और पश्चिम या उत्तर और दक्षिण का भेद है, न जाति और वर्ण के प्रति दुराग्रही वृत्ति। भक्तिकाल की रामभक्ति शाखा की काव्यधारा के प्रवर्तक एवं सर्वश्रेष्ठ कवि के रूप में तुलसीदास अमर कवि हैं। इस शोध दृष्टि से उनका साहित्य निम्नलिखित है।
संत तुलसीदास द्वारा विरचित ग्रंथ
1. रामचरित मानस, प्रकाशन गीता प्रेस, गोरखपुर
2. जानकी मंगल, गीता प्रेस गोरखपुर, टीका, हनुमान प्रसाद पोद्दार संत एकनाथ द्वारा विरचित ग्रंथ
1. संत एकनाथ दर्शन, संपादक डॉ. हे. वि. इनामदार
2. संत एकनाथ, जीवन और काव्य, डॉ. कृष्ण दिवाकर
3. महाराष्ट्र के संतों का हिन्दी काव्य, प्रभाकर सदाशिव पंडित'
4. हिन्दी साहित्य कोश, ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी
5. हिन्दी विश्वकोश, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी
6. तुलसी-दर्शन-मीमांसा, डॉ. उदयभानु सिंह, लखनऊ
विषय चयन एवं प्रेरणा - अनेक वर्षों के हिन्दी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन में हिन्दी का पूर्व-मध्यकाल का भक्ति साहित्य मेरा प्रिय विषय रहा है।
इन मध्ययुगीन संत एवं भक्त कवियों में संत तुलसीदास जी का प्रभाव मुझ पर अधिक रहा है क्योंकि रामभक्ति के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ तुलसी लोकजीवन के क्षेत्र को भी प्रभावित करते रहे हैं। मराठी भाषा-भाषी होने के नाते मेरी चेतना पर मराठी भक्तों का भी प्रभाव रहा है और इन संतों के वचनों को पढ़ते हुए, सुनते हुए अन्य भक्तों की तुलना में संत एकनाथ से मैं अधिक प्रभावित हुआ। यह विचार मुझे सदैव व्यग्र करता रहा कि हो न हो संत एकनाथ और तुलसीदास के चिंतन में अपनी विभिन्नता के बावजूद साधारणधर्मिता भी विद्यमान है। इसी से प्रेरणा पाकर संत एकनाथ और संत तुलसीदास के तुलनात्मक अध्ययन की ओर प्रेरित हुआ और अनुसंधान कार्य हेतु "संत तुलसीदास एवं एकनाथ का काव्य तुलनात्मक अध्ययन" इस शोध विषय को एम्. फिल् लघु शोध प्रबंध के लिए चयन किया।
शोध कार्य का महत्त्व और उद्देश्य संत एकनाथ और संत तुलसीदास भारत की दो भाषाओं के मेधावी विचारक, विश्रुत कवि एवं श्रेष्ठ भक्त हैं। भारत की सांस्कृतिक चेतना के प्रवाह में उनका असाधारण योगदान है। दोनों लोकमंगल की चेतना के साकार रूप हैं। सत्य पक्ष और भक्ति से अनुप्राणित ये दोनों महाकवि अपने युग और समाज के प्रति जागरूक थे।
समाज में फैले वर्ण, जाति, वर्ग, छुआछूत आदि को समाप्त करने के लिए परस्पर स्नेह, सद्भाव एवं मानवता की भवना का प्रचार-प्रसार आवश्यक है। आध्यात्मिक क्षेत्र के माध्यम से इन दो संत-कवियों ने जो संदेश दिया, वर्तमान के संदर्भ में, उसकी उपादेयता और भी बढ़ गयी है। आज के युग संदर्भ में ये दोनों संत प्रासंगिक, जनोपयोगी एवं सार्थक अनुभूति हो रहा है।
दोनों की रचनाओं में व्यापक जीवन दृष्टि एवं मानवीय संवेदना को परिलक्षित करते हुए मैंने यह अनुभव किया कि इन दोनों भक्त कवियों की रचनाओं का तुलनात्मक अध्ययन औचित्यपूर्ण होगा। दोनों कवि भिन्न भाषा भाषी एवं भिन्न काल के हैं। भाषा भेद से भेद भाव नहीं होता और काल-भेद से क्षमता अवरुद्ध नहीं होती। इन दोनों संतों की विचारभूमि में यदि साम्य है तो भाषा मात्र वाहक है, वाधक कभी नहीं और उनके विचारों में जो वैधर्म्य है, वह उनकी अपनी-अपनी विशिष्टता को ही व्यक्त करता है। अतः इस बात की आवश्यकता प्रतीत हुई की दोनों संत कवियों का मूलभूत विषयों के संदर्भ में तुलनात्मक अध्ययन किया जाय।
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