संत शब्द सत का रूप है। संत में सत्य का बोध होता है। संत सत्य के प्रति अनन्त आस्था रखता है। एकनिष्ठ भाव से सत्य के सम्यक् दर्शन द्वारा अपने जीवन को ढालकर जीवन और जगत् के प्रति आदर्श और व्यापक जीवन दृष्टि वाला व्यक्ति ही संत कहलाता है। संत का स्वरूप ईश्वर सदृश्य होता है। गुणों के आधार पर जिनमें भगवत्परायणत, निरपेक्षता, शान्ति, समदृष्टि, मोह का अभाव, अहंकारशून्यता, द्वंद्वहीनता और अपरिग्रह आदि गुण रहते हैं, वे संत कहलाते हैं। यही भगवान् के बंदे समाज में भगवद्भक्ति का प्रचार करते हैं। यह प्रचार भिन्न-भिन्न रूपों में होता है। जिसे कई परम्पराओं के रूप में देखा जा सकता है।
'षण' धातु 'तन' प्रत्यय से संयुक्त होकर संत को बनाती है। जिसका अर्थ होता है, लोगों के प्रति अनुग्रहकारी होना।
लोकानुग्रह तत्त्व तो सामान्यजनों में भी पाए जाते हैं। पाणिनी के अष्टाध्यायी सूत्र के अनुसार संतों में ब्रह्मनन्द सम्पन्न व्यक्ति होते हैं। यही विशिष्टता एवं विशेषता संत को सामान्यजन से पृथक करती है। संत का प्रयोग विनयशीलसम्पन्न साधु पुरुष के लिए किया जाता है। अपने विशिष्ट अर्थ में संत भगवत् अर्पित व्यक्ति होते हैं। संत वही है जिन्होंने सत्य की सम्यक् अनुभूति की है और उसी के प्रति सहजभाव से आस्थावान होकर लोकरंजक जीवन दर्शन दिया है। तैत्तिरीय संहिता के ब्रह्मावली खंड में उल्लेख मिलता है कि संत ब्रह्मा के अस्तित्व को साकार रूप प्रदान करता है।
सभ्यता के प्रारम्भ से ही मानवीय मूल्यों, प्रेम, सहिष्णुता, त्याग और सद्व्यवहार के मूल्यों का संचार करने वाले साधु-संन्यासी, संत और फकीर औलिया भारत-भूमि पर अवतरित होते रहे हैं, जिन्होंने अपना सर्वस्व त्यागकर सारा जीवन मानवता के कल्याण के लिए लगा दिया। मानव जीवन में धर्म का बहुत बड़ा महत्त्व है। भारत की पहचान साधु-संतों की भूमि के रूप में होती रही है। यहाँ के साधु-संतों ने विश्व में देश को नई पहचान दिलाई है।
राष्ट्र का सामर्थ्य, आध्यात्मिक शक्ति पर ही टिका होता है और यह आध्यात्मिक शक्ति को वृद्धिंगत करने हेतु साधु-संतों का योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। सम्पूर्ण विश्व को सन्तुलित रखने और वास्तविक धर्म समझाने हेतु संतों ने अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य किए। हमारे यहाँ भक्ति व उपासना के मार्ग अलग अवश्य होंगे; भाषा, परम्परा भिन्न होंगी। परन्तु, अन्ततः सभी भारतीयों की श्रद्धा एक ही है, अन्तिम सत्य एक ही है और यही भारत की विशेषता है।
संतों को सांसारिक पदार्थों से आसक्ति नहीं होती। वे सिर्फ जीने भर के लिए जरूरी चीज़ों का सीमित मात्रा में उपयोग करते हैं। क्रोध, मान, माया और लोभ से संत का कोई प्रयोजन नहीं है। इस प्रकार का जीवन सबके लिए अनुकरणीय होता है। दूसरों के कल्याण और उत्थान की भावना हर समय उसे पुण्य कार्यों में संलग्न रहने को प्रेरित करती है। संत का मार्गदर्शन आंतरिक दिव्य प्रकाश से होता है। अन्तर्मुखता संत जीवन को ऐसी ऊँचाइयाँ प्रदान करती है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
हर काल, समय और परिस्थिति में साधुओं ने बार-बार आकर इस मानवता को दिशा प्रदान की है। फिर चाहे रामायण की रचना करने वाले महर्षि वाल्मीकि हों, या फिर महाभारत रचने वाले महर्षि वेदव्यास वेदों की रचना करने वाले रहे हों सभ्यता के प्रारम्भ से ही मानवीय मूल्यों, प्रेम, सहिष्णुता, त्याग और सद्व्यवहार के मूल्यों का संचार करने वाले साधु-संन्यासी, संत और फकीर औलिया भारत-भूमि पर अवतरित होते रहे हैं, जिन्होंने अपना सर्वस्व त्यागकर सारा जीवन मानवता के कल्याण के लिए लगा दिया। मानव जीवन में धर्म का बहुत बड़ा महत्त्व है। भारत की पहचान साधु-संतों की भूमि के रूप में होती रही है। यहाँ के साधु-संतों ने विश्व में देश को नई पहचान दिलाई है।
हर काल, समय और परिस्थिति में साधुओं ने बार-बार आकर इस मानवता को दिशा प्रदान की है। फिर चाहे रामायण की रचना करने वाले महर्षि वाल्मीकि हों, या फिर महाभारत रचने वाले महर्षि वेदव्यास वेदों की रचना करने वाले रहे हों|
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