प्राध्यापक, मनोविज्ञान विभाग, मगध महिला महाविद्यालय, पटना, पटना विश्वविद्यालय, पटना, बिहार में पिछले 01 वर्ष से कार्यरत हूँ। इसके पहले मुझे तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय में गेस्ट फेकल्टी के रुप में पिछले 06 वर्षों से बी.एन. कॉलेज, भागलपुर एवं मारवाड़ी महाविद्यालय, भागलपुर में पढ़ाने का मौका मिला। बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग 2020 के द्वारा मेरी नियुक्ति मगध महिला महाविद्यालय, पटना, पटना विश्वविद्यालय, पटना में हुई। मैने M. A. एवं Ph. D. की डिग्री तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर से प्राप्त की है। B. Ed. की उपाधी मैंने मगध विश्वविद्यालय, बोध गया से प्राप्त की है। अब तक मेरे 12 रिसर्च पैपर प्रकाशित हुए है। 10 से अधिक अन्तराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय सेमिनार में मैंने हिस्सा लिया है।
प्रो. (डॉ.) निरंजन प्रसाद यादव, वर्तमान में कुलसचिव, आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय, पटना में पदस्थापित हैं। इसके पूर्व तिलकामाँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर में स्नातकोत्तर, मनोविज्ञान विभाग में विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत थे। कुलसचिव के पद पर तिलकामाँझी भागलपुर विश्वविद्यालय के साथ-साथ मुंगेर विश्वविद्यालय, मुंगेर में भी कार्यरत् रहे हैं। आपने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा प्रायोजित लघुशोध परियोजना (Minor Research Project) को पूरा किया। 2014 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा अनुसंधान पुरस्कार (Research Award) भी आपको प्राप्त हुआ। आप बिलासपुर विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ एवं डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (केन्द्रीय विश्वविद्यालय) में Board of Studies का सदस्य रह चुके हैं। आपके द्वारा 65 शोध पत्र एवं 05 मनोवैज्ञानिक मापनी का प्रकाशन किया गया है। आपने लगभग 70 राष्ट्रीय एवं 10 अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में भाग लिया, अब तक 22 Ph.D. आपके निर्देशन में हो चुके हैं।
शिक्षा मनोविज्ञान आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी क्षेत्र हैं, जो शिक्षण तथा अधिगम की प्रक्रिया को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करता है। सामान्य रूप से मनोविज्ञान को मानव के व्यवहार और मानसिक प्रक्रियाओं के वैज्ञानिक अध्ययन के रूप में परिभाषित किया जाता है, जबकि शिक्षा का संबंध व्यक्ति के सर्वांगीण विकास और उसके व्यक्तित्व निर्माण से होता है। जब मनोविज्ञान के सिद्धांतों और अवधारणाओं को शिक्षा के क्षेत्र में लागू किया जाता है, तब शिक्षा मनोविज्ञान का स्वरूप स्पष्ट होता है। शिक्षा मनोविज्ञान इस बात का अध्ययन करता है कि विद्यार्थी किस प्रकार सीखते हैं, उनकी मानसिक प्रक्रियाएँ किस प्रकार कार्य करती हैं, तथा शिक्षण की कौन-सी विधियाँ विद्यार्थियों के लिए अधिक प्रभावी होती हैं। यह विषय शिक्षक, विद्यार्थी और अधिगम प्रक्रिया के बीच संबंधों को स्पष्ट करता है और शिक्षा को अधिक प्रभावी तथा उद्देश्यपूर्ण बनाने में सहायता प्रदान करता है। आज के समय में शिक्षा केवल ज्ञान प्रदान करने की प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि यह व्यक्ति के बौद्धिक, भावनात्मक, सामाजिक और नैतिक विकास का माध्यम बन चुकी है। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि शिक्षण प्रक्रिया को समझने के लिए वैज्ञानिक आधार अपनाया जाए। शिक्षा मनोविज्ञान इसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण को शिक्षा के क्षेत्र में स्थापित करता है और शिक्षकों को यह समझने में सहायता करता है कि वे किस प्रकार विद्यार्थियों की आवश्यकताओं, रुचियों और क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए प्रभावी शिक्षण कर सकते हैं। शिक्षा मनोविज्ञान का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि प्रत्येक विद्यार्थी अपने आप में विशिष्ट होता है। उनकी रुचियाँ, क्षमताएँ, मानसिक स्तर, अनुभव और सीखने की गति एक-दूसरे से भिन्न होती हैं। यदि शिक्षक इन भिन्नताओं को समझे बिना शिक्षण करता है, तो शिक्षा की प्रक्रिया प्रभावी नहीं हो सकती। शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षक को यह समझने में सहायता करता है कि विद्यार्थियों में पाई जाने वाली व्यक्तिगत भिन्नताओं को कैसे पहचाना जाए और उनके अनुरूप शिक्षण की विधियाँ कैसे अपनाई जाएँ। इसके माध्यम से शिक्षक यह जान पाता है कि सीखने की प्रक्रिया किस प्रकार होती है, सीखने को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन से हैं और किस प्रकार विद्यार्थियों की रुचि तथा प्रेरणा को बढ़ाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त यह विषय शिक्षक को यह भी सिखाता है कि वह कक्षा में किस प्रकार का वातावरण बनाए जिससे विद्यार्थियों में सीखने की उत्सुकता और सक्रियता बनी रहे। शिक्षा मनोविज्ञान के सिद्धांतों के आधार पर शिक्षक विद्यार्थियों की समस्याओं को समझ सकता है और उन्हें उचित मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है। इस प्रकार यह विषय शिक्षा को अधिक प्रभावी, वैज्ञानिक और विद्यार्थी केन्द्रित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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