स्कन्ध-मीमांसा : विशुद्धिमार्ग पर आधरित पालि साहित्य में विशुद्धिमार्ग का एक प्रमुख स्थान है। बौद्ध साहित्य की समस्त बातें जिस रूप से इस ग्रंथ में उपलब्ध है, वैसी और किसी भी अन्य ग्रंथ में नहीं देखी जाती है। साथ ही बौद्ध सिद्धान्तों का प्रतिपादन जिस सतर्कता से इस ग्रन्थ में देखा जाता है, वैसे अन्यत्र अनुपलब्ध है । जिस प्रकार एक सफल शिक्षक अपने अनुभूतियों के आधार पर विद्यार्थियों के मस्तिष्क में निहित समस्त शंकाओं को एक-एक कर निकाल कर वहाँ ज्ञान को स्थापना करता है उसी प्रकार बौद्ध साधना-विषयक जो शंकायें जिज्ञासुओं के मन को उद्वेलित कर सकती है, उन सभी शंकाओं का यहाँ परिप्रश्नात्मक रूप से बड़े ही सहज ढंग से उसका निराकरण किया गया है। जो प्रश्न व्याख्या की सीमा से दूर है, उन्हे उपमा, उदाहरण या अन्य प्रकार की कथाओं के माध्यम से स्पष्ट करने का यत्न यहाँ किया गया है। इस प्रकार भाषा, भाव एवं विषय, इन सभी मापदण्डों से विशुद्धिमार्ग प्रमुख ग्रंथ प्रतीत होता है। पुस्तक की उपादेयता के सम्बन्ध में अपनी सम्मति और इसके आगामी संस्करण में सुधार के लिए आप के सुझाव का स्वागत है।
डॉ० धीरेन्द्र कुमार, जन्म 1950 विशुनपुर वजीरगंज गया में हुआ। बी० ए०, एम० ए० एवं पीएच डी० की उपाधि मगध विश्वविद्यालय, बोधगया से प्राप्त की। विभिन्न शोध-पत्रिकाओं में इनके निबन्ध प्रकाशित हैं। वर्ष 1976 में व्याख्याता, पालि एवं प्राकृत विभाग में नियुक्ति के पश्चात सम्प्रति आचार्य एवं अध्यक्ष स्नातकोत्तर पालि एवं प्राकृत विभाग, मगध विश्वविद्यालय, बोधगया आसित है। इनकी प्रथम कृति भारतीय बौद्ध केन्द्र, वर्ष 2003, जानकी प्रकाशन, पटना द्वारा प्रकाशित है।
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