T.T.D. Religious Publications Series No. 1453
मनुष्य के जीवन में जब-जब कठिन समय आता है और उसे जीवन में अपनी समस्याओं को दूर करने का कोई रास्ता नहीं दिखाई देता है, तव वह परम पिता परमेश्वर की शरण में जाता है। वह उन्हीं के चरणों में अपने मन का कष्ट अर्पित करता है और वह उनसे अपने कष्टों से मुक्ति पाने एवं मोक्ष प्राप्ति की प्रार्थना करता है।
श्री मंचेल्न कृष्ण कवि भी ऐसे ही भक्त हैं जिन्होंने श्री बालाजी भगवान अर्थात् वेंकटेश्वर भगवान को अपना सर्वस्व माना एवं उनकी स्तुति में 'श्रीवेंकटनगाधिपति शतक' की रचना की।
इस शतक में कुल 112 पद्य हैं। उत्पल माला एवं चंपक छंदों में प्रस्तुत हैं। इस शतक के प्रथम 15 पद्यों में भगवान के 108 नामों का उल्लेख है। इसके बाद के पद्यों में कवि 'वेंकटनगाधिपति' से भक्त को अपने सेवक के रूप में स्वीकारने, दया रस प्लावित दृष्टि उन पर बरसाने की प्रार्थना करते हैं। कवि कहते हैं कि "मैंने जो भी अपराध किए हैं, मुझमें जो भी कमियाँ हैं, उनकी ओर मत देखिए। मेरी प्रार्थना पर ध्यान देकर मुझे तारिएगा।" मैं आपका शरणार्थी हूँ। कृपा करके मेरे अंतर शत्रुओं का नाश कर मेरी रक्षा कीजिए।
भक्ति की अतिशयता में कवि ने भगवान का 'अरे' कहकर भी संबोधन किया है। यह सहज स्वाभाविक है। इससे कवि का निर्मल हृदय झलकता है।
कवि के अनुसार भक्ति के बिना और किसी संपदा और ज्ञान का होना या न होना व्यर्थ है। कवि ने अपने पदों के माध्यम से यह वताया है कि अनन्य भक्ति उत्तमोत्तम है। 'अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम' कहने पर तिरुमलेश, वेंकटनगाधिपति करुणा दृष्टि बरसाएंगे। तब तक वे हमारी परीक्षा लेते रहेंगे। इसलिए हमें श्रीवेंकटेश पर कर्तव्य भार छोड़ उनकी सेवा में रत रहना चाहिए तभी हम पुनर्जन्म रहित मुक्ति पा सकते हैं। कवि ने अपने कई पदों में स्वामी को असमंजस की स्थिति में डालकर दास की रक्षा करने के लिए बाध्य किया है। यह भक्त का एक विशेष भक्ति रूप है। कवि ने लौकिक विषयों के आधार पर ध्यान की उपयुक्तता पर प्रकाश डाला है। कई छंदों में भक्त (कवि) भगवान से तीखे वचन की सहज प्रवृत्ति को भी अपनाया है। यह भगवान के प्रति निश्चियात्मिकता भक्ति का रूप माना जाता है जो भक्तों की अपनी सहज प्रवृत्ति होती है। भगवान पर दोष लगाने के साथ-साथ प्रार्थना करना, भक्त का सहज स्वभाव होता है। इस विधु अधिक भक्ति झलकती है।
इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद प्रो. वाई. वेंकटरमण राव जी ने 'श्रीवेंकटनगाधिपति शतक' नाम से किया है। इस कृति में कवि ने 112 छंदों के माध्यम से वेंकटनगाधिपति की स्तुति की है।
हमें पूर्ण विश्वास है कि इस पुस्तक को पढ़कर आपको श्री विष्णु के अवतार वालाजी भगवान की लीलाओं का एवं भक्त वत्सल भगवान की भक्त के प्रति वात्सल्य भाव का पता चल जाएगा। हम सब इस पुस्तक को पढ़कर भगवान बालाजी की कृपा के पात्र बनेंगे।
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