नारी में 'स्वीत्व' उसकी चिर स्वतंत्रता का प्रतीक है, उस पर कोई बन्धन हो ही नहीं सकता। पति, परिवार, समाज और राज्य द्वारा आरोपित मर्यादाएँ उसके लिए व्यर्थ हैं। भारत में पति-पत्नी का दाम्पत्य जीवन छोटे-मोटे अपवादों को छोड़कर अधिकारपूर्वक एवं सम्मानजनक रूप से आनन्दपूर्वक सुरक्षित ही रहा है। एक दूसरे को आजीवन निबाहते थे, सप्तपदी के श्लोकों में वर एक पत्नीव्रत धारण करने, अपनी शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक गतिविधियों में बराबर की भागीदारी, तथा भरण-पोषण का दायित्व वहन करने और उसके मान-सम्मान की रक्षा का भार ग्रहण करता है। वधु भी परपुरुष के साथ संसर्ग ना करने, पति से बिना पूछे कोई काम ना करने तथा पति के परिवार की वंशवृद्धि और यश के अनुकूल कार्य करने का वचन देती पर बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद के कारण पति पत्नी के रिश्ते भी बिकाऊ वस्तु में बदल रहे हैं। वैवाहिक जीवन में टूटन पैदा हो गई है बल्कि विवाह संस्था के औचित्य पर ही प्रश्न चिह्न लगे हैं और तो और अब तो संविदा विवाह तथा 'लिव-इन' प्रणाली का प्रचलन दिनों दिन बढ़ रहा है। आशा अरोड़ा कृत यह उपन्यास नारी-दीपिका, केन्द्रित है। दीपिका ने सम्मानपूर्वक जीवन जीने की लालसा में स्नातक की उपाधि प्राप्त की, शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त किया और फिर संस्कृत भाषा में स्नातकोत्तर की उपाधि भी प्राप्त की। सुशिक्षित होने के कारण दीपिका को भीमनगर में अध्यापिका की नौकरी मिल गयी। और वह माधव छाबड़ा, ए.सी.एम., की ओर आकृष्ट हो गयी और नौबत विवाह तक आ गई। यद्यपि विवाह के समय माधव छाबड़ा, भाग खड़ा हुआ और माधव के चाचा साँवरे मोहन के परामर्श पर विवाह की रस्म लोटे के साथ सम्पन्न हुई, जैसा कि पहले लोटे, तलवार के साथ फेरे डाल कर विवाह होता रहा है। दीपिका से विवाह के चार वर्ष उपरान्त ही माधव को दीपिका से विरक्ति होने लगी और वह उसे तलाक दे कर सन्तोष के साथ जीवन व्यतीत करना चाहता था. माधव को जी जान से चाहती थी और वह उसके प्यार में सब कुछ बरदाश्त करते को तैयार थी किन्तु माधव उसे अपमानित करने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देता। वह सदैव उसे बदजुबान, बेगैरत, जवानदराज, अलेख्य गालियों से प्रताड़ित करता रहता। कभी रीढ़ की हड्डी पर जोरदार घूसा मारता, कभी गर्दन पर सरिया से ताबड़तोड़ वार करता। हद तो तब हो गयी जब माधव ने एक बार कहा कि, "कहे तो गुण्डे बुलवा दूँ, तेरे ऊपर जबरदस्ती करने के लिए।" एक बार तो उसने साफ साफ कहा भी कि "मैं सन्तोष को प्राप्त करना चाहता हूँ, या तो तुम मुझे तलाक दे दो, या कहीं जा मरो खपो, मेरी बला से।" फिर भी दीपिका यही कहती रहती कि "तुम्हारे बिना मेरी ज़िन्दगी में रह ही क्या जाएगा?" मैं ज़िन्दगी की सारी खुशियों से वंचित हो कर भी जी लूँगी पर तुम्हारे बिना रह नहीं सकती। किन्तु माधव था कि अपने विकृत सम्बन्धों की हिफाजत तथा समाज में प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए दीपिका को मानसिक रूप से विक्षिप्त घोषित करने हेतु षड्यंत्रपूर्वक डॉ. पाठक की सहायता ले चुका था, जो वस्तुतः 'फाल्स मेडिकेशन' का प्रकरण बन गया। माधव को यह विश्वास था कि दीपिका स्वयं पहल कर माधव के विरुद्ध कहीं भी, कोई कार्यवाही नहीं करेगी। ऐसे में दीपिका माधव से क्या उम्मीद करती? उसमें कहाँ प्यार ढूँढ़ती? कहाँ ज़िन्दगी ढूँढ़ती ? अत्यधिक मद्यपान से माधव को लीवर सिरोसिस हो गया। ऐसी विषम परिस्थितियों में सास बहू के बन्धन यदि आदर, ममता के धागों से बने हों तो भी जीवन को सरस बनाने के लिए पर्याप्त हैं। पर ऐसा हैं कहाँ? दहेज विरोधी कानून, और घरेलू हिंसा कानून के होते हुए तथा राष्ट्रीय एवं राज्य महिला आयोग तथा महिला थानों के बाद भी महिलाएँ पति के अमानवीय व्यवहार का प्रतिकार करने का साहस नहीं बटोर पाती, उपन्यास हर महिला के लिए पठनीय है और मार्गदर्शक भी
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