डॉ. सुधांशु कुमार नायक जन्म: 18 फरवरी, 1954, पुरी, ओड़िशा शिक्षा: अंग्रेजी, हिन्दी और भाषाविज्ञान में स्नातकोत्तर, ब्रह्मपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में प्रथम पी-एच.डी. (1981) एवं ओड़िशा से हिन्दी में प्रथम डी.लिट्. (1988)1 सेवा भारत सरकार, अन्तरिक्ष विभाग के हिन्दी अनुवादक, ओड़िशा के राज्यपाल के विशेष अधिकारी (हिन्दी) एवं ओड़िशा शिक्षा सेवा के अन्तर्गत विभिन्न शासकीय महाविद्यालयों में अध्यापना व शोध निर्देशन (अब तक 25 शोधार्थियों को पी-एच.डी. लाभ)। प्रकाशन: ओड़िआ नाथ साहित्य और संस्कृति (1994), वैकुण्ठ सागर मन्थन (2000), सामान्य हिन्दी (2003), प्राचीन हिन्दी और ओड़िआ काव्य-प्रवृत्तियाँ (2004), आधुनिक हिन्दी और ओड़िआ काव्य-प्रवृत्तियाँ (2004), सूरदास और जगन्नाथ दास की भक्ति (2005)। 70 से अधिक पुस्तकों का ओड़िआ में अनुवाद, ओड़िआ 'सनातन सारथी' (1983 से) और 'श्री सत्यसाइ बालविकास' (1992 से) पत्रिकाओं का संपादन।
मध्यकालीन भारतीय साहित्य में भक्ति की जो वेगमयी धारा प्रवाहित हुई, उससे समाज का अंग-अंग प्लावित हो गया। सगुण, निर्गुण, संत, सूफी, राम, कृष्ण आदि जो भी आधारभूत शिलाएँ उसमें दिखाई देने लगीं उनमें रूप भेद से समानता ही नजर आने लगी। कवि उत्तर का हो या दक्षिण का, पूरब का हो या पश्चिम का, सबकी मनोदशा में जो एकात्मता रही उसका संकेत हिन्दी के अष्टछाप कवि सूरदास और ओड़िआ के पंचसखा कवि जगन्नाथ दास की भक्ति भावना में देखा जा सकता है।
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