डॉ० वीणा झा जन्म : ६ मार्च १९५८ ई० जन्म-स्थान : ग्राम+पो०-बीहट, जिला-बेगूसराय (बिहार) शिक्षा : एम०ए०, पी-एच०डी० (वेदान्त) वर्तमान पता : 'प्रभात बेला', आकाशवाणी रोड खाजपुरा, पटना-८०००१४ (बिहार) प्रकाशित कृतियाँ : 'शंकर का अद्वैत वेदान्त' 'आगमन तर्कशास्त्र अप्रकाशित 'श्रीमद्भगवद्गीता : सम्पूर्ण योग' सम्प्रति प्रोफेसर, दर्शन विभाग, पटना महाविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय, पटना
'तीस सदियों से अधिक समय से इस तप्तभूमि देवों के सुलगते गर्भ से हजारों शाखाओं तथा लाखों पल्लवों के साथ दर्शन द्रुम उगा है। यह क्षय का कोई चिह्न दिखाए बिना अपने आपको पुनः पुनः नया करता रहता है।' रोम्याँ रोलौँ, लाईफ ऑफ रामकृष्ण, 1929 प्रसिद्ध पाश्चात्य लेखक की यह टिप्पणी निस्संदेह उपनिषद् ग्रन्थों में का वर्णित ज्ञान परंपरा की ओर संकेत करती है। उपनिषद् यथार्थवाद, तर्कशास्त्र, वैज्ञानिक भारतीय बुद्धिवाद, दृष्टिकोण, नीतिशास्त्र, अध्यात्म, दर्शन तथा सामाजिक न्याय के मूल स्रोत तथा पोषक हैं। आज के वैश्विक युग में उपनिषदों ने किसी न किसी रूप में समस्त विश्व के दर्शन, चिन्तन, रहन-सहन तथा परंपराओं को प्रभावित किया है। प्रस्तुत पुस्तक में उपनिषद्, उपनिषद्काल तथा इस काल के प्रतिनिधि दार्शनिकों की चर्चा की गई है तथा उपनिषद्कालीन दार्शनिकों के जीवन की विभिन्न अवस्थाओं तथा पहलुओं की एक सामान्य रूप रेखा प्रस्तुत करने की चेष्टा की गई है। इन दार्शनिकों की उपलब्धियों के विविध पक्षों यथा बौद्धिक, दार्शनिक, आध्यात्मिक, नैतिक व सामाजिक उपलब्धियों का विस्तृत चित्रण इस पुस्तक की विशिष्टता है। प्राचीन भारतीय इतिहास की समृद्ध संस्कृति, उच्च आदर्शों एवं नैतिक मूल्यों का प्रकाशन इस पुस्तक का उद्देश्य है। आशा है इससे न केवल इतिहास समृद्ध होगा बल्कि सामाजिक सौहार्द्र, शांति एवं कल्याण के लिए भी यह प्रेरक सिद्ध होगा। 'अहं ब्रह्मास्मि', सर्वं खल्विदं ब्रह्म' तथा 'तत् त्वम् असि' में प्रतिपादित विश्वबंधुत्व की कामना के साथ यह पुस्तक 'उपनिषद्कालीन दार्शनिक' पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है।
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