भूमिका
निःसंदेह वैदिक संस्कृति अतिशय प्राचीन है। इसके साथ ही यह भी सच है कि विश्व की अनेक संस्कृतियाँ कुछ कम प्राचीन नहीं है, पर वैदिक संस्कृति में ऐसी विलक्षणताएँ हैं, जो विश्व की संस्कृतियों में इसे अनुपम बनाती है। यदि विश्व के सांस्कृतिक विकास का पर्यालोचन किया जाय तो यह अनायास सिद्ध होगा कि भारत ने दर्शन, काव्य, सदाचार और उच्च विचार के सांस्कृतिक महासागर के रत्नों का उदारतापूर्वक वितरण किया है। आज भी संसार के विभिन्न भागों में जगमगाते हुए ये रत्न संस्कृति का प्रकाश फैला रहे हैं। ऐसी विश्वजनीन संस्कृति का अध्ययन-अध्यापन समीचीन है।
किसी देश के सांस्कृतिक विकास पर राजनीतिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है। प्राचीन भारत में राजा संस्कृति का संरक्षक होता था। भारतीय दृष्टिकोण में 'यथा राजा तथा प्रजा' अर्थात् राजा के गुणों का आदर्श प्रजा में प्रतिष्ठित होता है। राष्ट्रीय संस्कृति के प्रति राजा की अभिरूचि होने पर अनायास ही सांस्कृतिक संस्थाओं की संख्या बढ़ने लगती है और यदि राजा कहीं राष्ट्रीय संस्कृति के प्रति उदासीन हो अथवा राष्ट्रीय संस्कृति का विरोधी हो तो संस्कृति के क्षीण होते देर नहीं लगती। भारत के सांस्कृतिक इतिहास में इस प्रकार की राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उत्पन्न हुई विषमताएँ प्रत्यक्ष ही हैं। किसी भी राष्ट्र में शान्ति और सुव्यवस्था होने पर स्वर्णिम संस्कृति का अभ्युदय होता है।
भारतीय विचारकों ने बाहुल्य, उच्चता और सदाशयता में सुख माना है। छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार 'भूमैव सुखम् अर्थात् बाहुल्य ही सुख है। भूमा को आत्मसात् करने के लिए भूः, भुवः और स्वः को अपनी उपभोग की परिधि में रखा गया। सायं प्रातः गायत्री पाठ करते समय मानव को प्रतीत हो सकता था कि वह अपने शरीर, कुटुम्ब, ग्राम, राष्ट्र आदि परिधियों से सीमित नहीं है, वह निःसीम है। कम से कम भूः (पृथ्वी); भुवः (वायुलोक) और स्वः (आकाश-मण्डल) उसकी संचरण शीलता की परिधि में है। इस निःसीमता की कल्पना से मानव का व्यक्तित्व अतिशय उदात्त बन सका था। भारत के विशाल प्राङण में प्रायः सदा ही मनीषियों को अपने संदेश प्रसारित करने का विपुल क्षेत्र मिल सका है।
भारतवासी के मानस पटल पर पृथ्वी और आकाश की समृद्धिशालिता और सौन्दर्य का प्रतिबिम्ब पड़ा है। आकाश तो आज भी प्रायः पूर्ववत् हमारा आवरण है। दिन के समय उसकी नीलिमा और रात्रि के समय अगणित तारों की दीपावली अत्यन्त रमणीय है, पर भारत की प्राचीन वसुन्धरा आज की अपेक्षा अधिक गौरवशालिनी और मनोरम थी। अथर्ववेद के ऋषि ने पृथ्वी की वन्दना की है-
ग्रीष्मस्ते भूमे वर्षाणि शरद्धेमन्तः शिशिरो वसन्तः।
ऋतवस्ते विहिता डायनीरहोरात्रे पृथिवि नो दुहाताम् ।।
(हे भूमि। आपके ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर और वसन्त ऋतु दिन और रात्रि हमें दुग्ध प्रदान करें)
भारत भूमि अतिशय उदारतापूर्वक मणि, हिरण्य आदि निधियों का वितरण करती थी। भारत की प्राचीन संस्कृति की रूप-रेखा के निर्माण में ऐतिहासिक परिस्थितियों का महत्व सुदूर प्राचीन काल से ही रहा है। वैदिक साहित्य के उल्लेखों के अनुसार भारत में अनेक भाषाओं के बोलने वाले तथा अनेक धर्मों (संस्कृतियों) के लोग निवास करते थे। इन सभी लोगों के पारस्परिक मेल-जोल और सम्मिश्रण का परिणाम हुआ कि एक राष्ट्रीय संस्कृति बनी, जो हिन्दू-संस्कृति है और एक राष्ट्रभाषा बनी, जो संस्कृत है।
वैदिक साहित्य में देव, असुर, आर्य, राक्षस, गन्धर्व, नाग आदि जातियों की चरित-गाधा के उल्लेख मिलते हैं। इनके अतिरिक्त अन्य पहाड़ी या जंगली सैकड़ों जातियों के नाम और साधारण परिचय बौद्ध साहित्य, रामायण, महाभारत नाट्यशास्त्र आदि में मिलते हैं। आधुनिक आचार्यों ने वैज्ञानिक अनुशीलन के आधार पर निर्णय किया है कि भारत में आर्यों के अतिरिक्त नेग्रिटो, प्रोटो-आस्ट्रालायड, मंगोल, भूमध्यसागरीय, ब्राविड़ आदि वर्गों का सम्मिश्रण है। इनमें से प्रत्येक वर्ग की अपनी विशेष सत्ता और संस्कृति थी। आज इन सबका अस्तित्व केवल वैज्ञानिकों के लिए ही रह गया है। हिन्दू-संस्कृति की विशालधारा में इन सभी संस्कृतियों का संगम हुआ और सभी वर्ग एक हिन्दू-समाज में घुल मिल गए।
समय-समय पर वैदिक संस्कृति के उन्नायक कुछ महापुरुष होते आए हैं, जिनके व्यक्तित्व की अमिट छाप परवर्ती संस्कृति पर पड़ी है। संभव है, वैदिक देवताओं में से कुछ अपने युग के संस्कृति निर्माता महापुरुष ही रहे हों। इन्द्र, शिव, विष्णु आदि के स्वरूप का जो निरूपण वैदिक काल से ही भारतीय साहित्य में मिलता है, उससे प्रकट होता है कि वे वास्तव में अपने युग के संस्कृति निर्माता ही थे। और कालान्तर में उनके व्यक्तित्व को दिव्य गुणों से समन्वित करके उन्हें वैसे ही देवता मान लिया गया। इन सबों के अलावा आदिकाल से ही भारतवासियों ने अपनी सभी उपयोगी वस्तुओं को देवता मान लिया। देव कोटि की परिधि अतिशय विस्तीर्ण रही है। उपनिषदों में 'सर्व खल्विदं ब्रह्म' अर्थात् सब कुछ ब्रह्म है।
वैदिक धर्म हमें सुख-शांति, सरल-व्यवहार एवं सदाचरण की प्रेरणा देता है। वेद हमारे वैदिक धर्म के मूल ग्रंथ हैं। उनके अध्ययन से तद्युगीन उदात्त आचार-विचार, रहन-सहन, सदाचार इत्यादि का पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है। वेदों ने मानव-धर्म को सर्वश्रेष्ठ माना है। अतः मनुष्य बनो 'मनुभर्व', वेदों का मूल संदेश है। आधुनिक युग में व्यक्ति में प्रगतिशीलता तो है, परन्तु स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा का अभाव है। आज मानव येन-केन-प्रकारेण अपने लक्ष्य की प्राप्ति चाहता है। स्वार्थ से वशीभूत हो मनुष्य नैतिक पतन की ओर प्रवृत्त हो रहा है। हम अपनी जीवन-शैली, संस्कार सब भूलते जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में हमें अपने प्राचीन धर्म एवं ज्ञान को स्मरण करने की आवश्यकता है, जिससे हम अपने जीवन और समाज दोनों को एक नई दिशा दे सकें।
इस उद्देश्य से 'वैदिक संस्कृति एक अवलोकन' इस पुस्तक के लेखन को मैं प्रेरित हुई। विभिन्न अध्यायों में विभाजित कर वैदिक युग की संस्कृति के विभिन्न पहलुओं का चित्रण किया गया है। यह प्रयास कितना सही होगा इसका निर्णय विद्वदजन करेंगे। पुस्तक की त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ।
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