भूमिका
भारतीय दार्शनिक परम्परा का यदि सूक्ष्म, तात्त्विक तथा ऐतिहासिक अनुशीलन किया जाए, तो यह तथ्य अत्यन्त स्पष्टता के साथ उद्घाटित होता है कि यहाँ ज्ञान का परम प्रयोजन मात्र बौद्धिक तुष्टि या वाद-विवाद की विजय न होकर, अपितु जीवन की संपूर्ण सत्ता में एक गहन अस्तित्वगत रूपान्तरण रहा है। इस परम्परा में ज्ञान को केवल 'जानने' की प्रक्रिया के रूप में न देखकर 'होने' की अवस्था के रूप में ग्रहण किया गया है। इसी कारण वे ग्रन्थ, जो साधक को केवल सिद्धान्तों के जाल में उलझाने के स्थान पर उसे प्रत्यक्षानुभूति की भूमि पर प्रतिष्ठित करने की सामर्थ्य रखते हैं, सर्वोच्च महत्त्व के अधिकारी माने गए हैं।
इसी श्रेणी में विज्ञानभैरव का स्थान अत्यन्त विशिष्ट, अद्वितीय एवं अप्रतिम है। यह ग्रन्थ न केवल तन्त्रागमिक परम्परा का एक महत्वपूर्ण अंग है, अपितु यह उस सम्पूर्ण आध्यात्मिक चिन्तनधारा का सार संक्षेप भी है, जिसमें अनुभव को तत्त्व से अधिक प्रामाणिक माना गया है। इसकी संरचना, शैली तथा प्रतिपादन प्रक्रिया यह स्पष्ट करती है कि इसका लक्ष्य किसी दार्शनिक मत का प्रतिपादन मात्र नहीं, बल्कि साधक को चेतना के उन परम आयामों तक पहुँचाना है, जहाँ समस्त द्वैत-विभाजन स्वतः लीन हो जाते हैं।
यह ग्रन्थ अपने स्वरूप में न तो केवल तन्त्रशास्त्र का एक अंग है, न ही यह योगशास्त्र की किसी एकांगी पद्धति का सीमित विवेचन प्रस्तुत करता है; अपितु यह उन समस्त साधना-मार्गों का समन्वित एवं परिष्कृत उत्कर्ष है, जिनका परम उद्देश्य आत्मतत्त्व की प्रत्यक्ष उपलब्धि है। यहाँ साधना को किसी बाह्य अनुशासन, विधि-विधान अथवा अनुष्ठानिक संरचना में आबद्ध न रखकर, उसे जीवन की स्वाभाविक धारा में ही प्रतिष्ठित कर दिया गया है। इस दृष्टि से यह ग्रन्थ अत्यन्त उदार, समावेशी तथा व्यावहारिक है, क्योंकि यह साधना को जीवन से पृथक न मानकर उसी का आन्तरिक आयाम स्वीकार करता है।
इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह साधना को किसी एक निश्चित पथ या प्रणाली में सीमित नहीं करता, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षण, प्रत्येक अनुभव, प्रत्येक संवेदना तथा प्रत्येक मनोवृत्ति को आत्मबोध के संभावित साधन के रूप में उद्घाटित करता है। यहाँ तक कि वे अवस्थाएँ, जिन्हें सामान्यतः बन्धन या विक्षेप का कारण माना जाता है, उन्हें भी सूक्ष्म दृष्टि से साधना के उपकरण के रूप में रूपान्तरित कर दिया गया है।
इस प्रकार यह ग्रन्थ साधना के क्षेत्र में एक प्रकार की कान्ति का सूत्रपात करता है. जहाँ जीवन और अध्यात्म के मध्य स्थापित कृत्रिम विभाजन स्वतः निरस्त हो जाता है ।
'विज्ञान' शब्द का प्रयोग यहाँ अत्यन्त विशिष्ट और गूढ अर्थों में किया गया है। यह मात्र सामान्य बौद्धिक ज्ञान, सूचना या तर्कबुद्धि से प्राप्त निष्कर्ष का ही द्योतक नहीं है, अपितु यह उस परिपक्व, अनुभूत, आत्मसिद्ध तथा अविच्छित्र बोध का भी संकेत है जिसमें ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय की त्रिविध संरचना विलीन हो जाती है। यह 'विज्ञान' न तो अर्जित किया जाता है और न ही बाह्य साधनों से प्राप्त होता है; यह तो चेतना के अपने ही स्वरूप का अनावरण है, जो सदैव विद्यमान रहते हुए भी अज्ञान के आवरण से आच्छादित रहता है।
इसी प्रकार 'भैरव' शब्द का भी यहाँ अत्यन्त सूक्ष्म एवं दार्शनिक अर्थ ग्रहण किया गया है। यह किसी बाह्य देवता, प्रतीकात्मक रूप या पौराणिक सत्ता का निर्देश नहीं करता; अपितु यह उस परम चैतन्य का द्योतक है, जो समस्त सृष्टि का मूलाधार, नियन्ता, धारक एवं संहारकर्ता होते हुए भी इन समस्त अवधारणाओं से परे है। वह न केवल जगत् का कारण है, बल्कि कारण-कार्य की समस्त संरचना का भी अतिक्रमण करता है। इस प्रकार 'भैरव' एक ऐसी परम सत्ता का संकेत है, जो सर्वत्र व्याप्त होते हुए भी किसी भी सीमा में आबद्ध नहीं है।
ग्रन्थकार और शिव-प्रणीत परम्परा
विज्ञानभैरव के रचयिता का नाम मूल ग्रन्थ अथवा टीकाओं में स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है। तथापि आगम-परम्परा के अनुसार इसे 'शिव-प्रणीत' माना जाता है। इस परम्परा में भगवान् शिव को ज्ञान का आद्य स्त्रोत और उपदेशक स्वीकार किया गया है- 'स्वयं परमेश्वरः सिद्धान्तोपदिष्टा' ।
इस आधार पर यह निष्कर्ष स्वाभाविक है कि यह ग्रन्थ शिव के उपदेशरूप में अवतरित हुआ, जो गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से जगत् में प्रसारित हुआ ।
प्रस्तुत संस्करण, परम्परा और तात्त्विक स्थिति का समन्वित विवेचन
शैवदर्शन के मर्मज्ञ अध्येताओं ने 'विज्ञानभैरव' का सूक्ष्म परीक्षण करने के उपरान्त इसे काश्मीर-शैवदर्शन की परम्परा के अन्तर्गत स्थापित किया है। यह स्थापना केवल परम्परागत स्वीकृति पर आधारित नहीं है, अपितु इसके प्रतिपाद्य विषय, साधना-पद्धति तथा तात्त्विक आधार की गहन एकात्मता पर आश्रित है। विज्ञानभैरव में प्रतिपादित चेतना-दर्शन, स्पन्द-सिद्धान्त तथा प्रत्यभिज्ञा की अन्तर्दृष्टि- ये सभी काश्मीर-शैव अद्वैत के मूलाधार तत्त्वों के साथ पूर्णतः सामंजस्य रखते हैं।
काश्मीर-शैवदर्शन के उद्भव और विकास पर विद्वानों ने पर्याप्त प्रकाश डाला है; अतः यहाँ उसका विस्तार अपेक्षित नहीं । तथापि यह अवश्य कहा जा सकता विज्ञानभैरव उस परम्परा का जीवित अनुभवात्मक पक्ष है, जहाँ दर्शन केवल विचार का विषय नहीं रहता, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभूति का मार्ग बन जाता है।
अभिनवगुप्त जैसे महान् आचार्य द्वारा विज्ञानभैरव का अन्य तन्त्रग्रन्थों के साथ उल्लेख किया जाना इसकी प्रामाणिकता और प्रतिष्ठा का सशक्त प्रमाण है। चूंकि इसका प्रतिपाद्य तत्त्व तन्त्र-साधना के अनुभवात्मक आयामों से सम्बद्ध है, अतः इसे तांत्रिक शैवमत का आधारभूत ग्रन्थ स्वीकार करना सर्वथा उचित है। अभिनवगुप्त ने इस ग्रन्थ को आगम, शिवविज्ञानोपरिषद् एवं रुद्रयामलसार के नाम से भी उद्धृत किया है। इनके द्वारा रचित परमार्थसार के टीकाकार योगराज ने इसका उद्धरण शैवोपनिषद् के नाम से दिया है। अमृतानन्द योगी ने इस ग्रन्थ को विज्ञानभैरवभट्टारक एवं महेश्वरानन्द ने विज्ञानभट्टारक के नाम से कहा है।
यह ग्रन्थ पूर्व में सन् १९१० में 'त्रिवेन्द्रम् संस्कृत ग्रन्थमाला' में विद्याचक्रवर्ती के द्वारा की गई विवृति टीका के साथ प्रकाशित हुआ था जो कि अब अनुपलब्ध है। इस ग्रन्थ का एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रकाशन काश्मीर-ग्रन्थमाला के ८-९ ग्रन्थांक के रूप में संवत् १९७५ में श्रीनगर से हुआ था। इस संस्करण की विशिष्टता यह थी कि इसमें दो प्रमुख टीकाओं- शिवोपाध्यायकृत 'विवृति' तथा भट्ट आनन्दकृत 'विज्ञानकौमुदी' - का समावेश किया गया था। इसके अतिरिक्त, आचार्य क्षेमराज की 'विज्ञानोद्योत' नामक व्याख्या के उपलब्ध अंश भी उसमें सम्मिलित किए गए ।
यद्यपि क्षेमराज की यह व्याख्या केवल प्रारम्भिक २४ श्लोकों तक ही प्राप्त होती है, तथापि उसका महत्त्व अत्यन्त गूढ़ है। शिवोपाध्याय की विवृति के अन्तिम श्लोकों से ज्ञात होता है कि उनके समय में भी क्षेमराज की पूर्ण व्याख्या उपलब्ध नहीं थी । सम्भवतः शेष भाग काल की धारा में नष्ट हो गया- कागज अथवा भूर्जपत्र पर लिखित ग्रन्थों का विनाश समय, अग्नि या अन्य कारणों से हो जाना असामान्य नहीं है।
इस प्रकार श्रीनगर संस्करण में वस्तुतः तीन टीकात्मक परम्पराओं का संगम दृष्टिगोचर होता है- क्षेमराज, शिवोपाध्याय और भट्ट आनन्द । यह त्रिविध समन्वय विज्ञानभैरव की व्याख्यात्मक परम्परा को अत्यन्त समृद्ध बनाता है।
काश्मीर-शैवदर्शन के उपलब्ध साहित्य को सामान्यतः तीन विभागों में वर्गीकृत किया गया है- (१) आगमशास्त्र, (२) स्पन्दशास्त्र, (३) प्रत्यभिज्ञाशास्त्र ।
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