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Books > Yoga > Kaivalyadhama > योगासन: (Yogasan)
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योगासन: (Yogasan)
योगासन: (Yogasan)
Description

भूमिका

 

मूकं करोति वाचालं पङंगु लङघयते गिरिम् ।

यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ।।

(जिसकी कृपा से गूंगा भी बोलने लगता है, और लंगड़ा भी पर्वत पारकर जाता है, उस परम आनन्द श्रीमाधव को शतशः प्रणाम।)

आसन' की पुस्तिका का यह हिन्दी रूप जनता के हाथों में प्रस्तुत करते हुए हमे अत्यन्त प्रसन्नता हो रही है । शारीरिक या आध्यात्मिक मूल्य के प्राय: प्रत्येक योगासन की विधि का इसमें विस्तृत वर्णन है । वर्णन को अधिक सुबोध और स्पष्ट करने की दृष्टि से प्रत्येक आसन को अच्छी प्रकार चित्रित किया गया है । इस प्रकार कैवल्यधाम द्वारा बनाये गये 'संक्षिप्त' ' पूर्ण' और 'सरल' अभ्यासक्रमों का अनुसरण करने वाले सभी योगाभ्यासियों के लिये यह पुस्तिका एक विश्वसनीय और सुयोग्य मार्गदर्शक हो गयी है । 'संक्षिप्त' ' पूर्ण', और 'सरल' अभ्यासक्रमों से सम्बन्धित, पूरे ही शरीरसंवर्धनात्मक पक्ष को समाविष्ट करने की दृष्टि से शास्त्रीय अर्थ में आसन न होते हुए भी, विपरीतकरणी, योगमुद्रा, उड्डियान और नौंलि की इस पुस्तिका में चर्चा की गयी है । यदि कोई पाठक इस पुस्तिका के साथ ही हमारी 'प्राणायाम' नामक पुस्तिका का भी अध्ययन करे, तो एक शरीरसंवर्धनेच्छु योगाभ्यासी के लिए जो कुछ भी जानने योग्य बाते हैं, उनका प्राय: पूरा ही लान उसे हो जायेगा।

हमने आत्मबलसवर्धनवादी के अधिकारों को भी ध्यान में रखा है । योगासनों की पूर्वसिद्धता' और ' ध्यानधारणात्मक आसन' इस पुस्तिका के ये दो अध्याय और 'सुलभयोग' की दूसरी पुस्तिका में दी गयी प्राणायाम के अध्यात्मिक पक्ष की चर्चा, ये तीनों मिलकर आध्यात्मिक विद्यार्थी को अपने कार्य का श्रीगणेश भली प्रकार कराने में पर्याप्त हैं ।

प्रत्येक अभ्यास के अन्त में, उसके शारीरिक तथा चिकित्सात्मक लाभ बहुत संक्षेप में दिये गये हैं । आसनों के महत्व को पाठकों के मनपर अंकित करने की दृष्टि से हमने यह किया है । फिर भी हम 'सुलभयेग' के पाठकों को सावधान करना चाहते हैं कि इस प्रकार प्राप्त ज्ञान का उपयोग यैगिक चिकित्सा करने की दृष्टि से कदापि न करे, क्योंकि ' अधूरा ज्ञान सदा ही भयंकर होता है', और यह साधारण तत्व यौगिक चिकित्सा में भी निरपवाद लागू है । साथ ही, पुस्तिका में स्थान स्थान पर दी गयी सावधानियों पर भी हम पाठकों का विशेष ध्यान आकर्षित करना चाहते है ।

यह पुस्तिका योगासनों की एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका के रूप में है । अत: इसमें समाविष्ट विविध अभ्यासों की विस्तृत सैद्धान्तिक चर्चा इसमें नहीं है । इसका अर्थ यह न लिया जाय कि पाठकों को आसनों का शरीररचना और शरीरक्रियाविषयक ज्ञान न होगा । प्रथम तथा अन्तिम अध्यायों द्वारा पाठकों को वैज्ञानिक पद्धति से आसनों के सभी कार्यात्मक (Functional) लाभों की बहुत कुछ स्पष्ट कल्पना निश्चितरूप से हो जावेगी । परन्तु फिर भी, विषय का प्रतिपादन मुख्यरूप से क्रियात्मक दृष्टि से है, सैद्धान्तिक दृष्टि से नहीं । आसनों के शरीरसंवर्धनात्मक और चिकित्सात्मक पक्ष का सैद्धान्तिक प्रतिपादन अधिक विस्तृतरूप में दूसरी पुस्तिका में किया जावेगा । एक सामान्य योगाभ्यासी से योगाभ्यासों का जो कुछ भी क्रियात्मक तथा सैद्धान्तिक ज्ञान अपेक्षित है, वह इन दो पुस्तिकाओं द्वारा प्राप्त हो सकेगा।

जिन्हें योगाभ्यासों का पूर्ण सैद्धान्तिक तथा क्रियात्मक ज्ञान प्राप्त करने की अभिलाषा है, उन्हें तो 'योग मीमांसा' का ही अध्ययन करना चाहिये, जिसमें आसनों के चिकित्सात्मक और शरीरक्रियात्मक मूल्यों की पूर्णतया प्रयोगशालीय मौलिक प्रयोगों पर आधारित विद्यत चर्चा से पृष्ठ के पृष्ठ भरे पड़े हैं । 'सुलभयोग के दो खण्ड तो योग में केवल क्रियात्मक रुचि रखनेवालों के ही अभिप्राय से हैं ।

इस पुस्तिका के प्रकाशन के पूर्व भी हमने 'योगासन चित्रपट' और उसी के साथ प्रत्येक आसन की विधि संक्षेप में स्पष्ट करनेवाली पत्रिका का प्रकाशन किया है । इस सम्बन्ध में भी हम पाठकों को यह ध्यान दिलाना चाहते हैं कि जिस प्रकार यह पुस्तिका, 'योगमीमांसा' का स्थान नहीं ले सकती, उसी प्रकार उपर्युक्त चित्रपट भी इस पुस्तिका का स्थान नहीं ले सकता । चित्रपट के साथ दी गयी विधि, योगाभ्यासी का मार्गदर्शन करने में निस्संदेह में पर्याप्त और शुद्ध है । परन्तु यह निरूपण इतना संक्षिप्त और शरीरक्रिया या चिकित्सा के विचार से भी इतना अभावपूर्ण है कि इस पुस्तिका में प्रस्तुत लान की तुलना में वह कुछ भी नहीं है।

योग मीमांसा, आसन चित्रपट या इस पुस्तिका में प्रस्तुत योगाभ्यासों की विधि का निरूपण प्राचीन संगत यौगिक पाठ्य ग्रंथों या प्राचीन यौगिक परंपराओं से अत्यन्त साधारण परिवर्तन करके लिया गया है।वैयक्तिक योगाभ्यास करते समय इसी विधि पद्धति का श्रद्धापूर्वक अनुसरण किया जाना चाहिये । इन योगाभ्यासों के शरीरक्रियात्मक और चिकित्सात्मक लाभ इसी पद्धति के अनुसरण के परिणाम (फल) होते हैं।

हमारे आश्रमें बन्धुओं को, उनके स्नेहपूर्ण सहकार्य के लिए, हम हार्दिक धन्यवाद देते है ।

हम लगभग चालीस वर्षों से संपादन कार्य में संलग्न हैं । हमारे अनेक दोष, कुछ साधारण तो कुछ गंभीर होते हुए भी जनता का हम पर सदा ही बड़ा दृढ़ अनुग्रह रहा । भविष्य में भी उसी प्रकार का अनुग्रह बना रहे, यही हमारी उत्कट अभिलाषा है । योग का मानवता के लिए एक पूर्ण सन्देश है । योग का मानवशरीर के लिए सन्देश है । उसका मानव मन और मानव आत्मा के लिये भी सन्देश है । तो क्या सुबुद्ध और सुयोग्य युवक इस सन्देश को, केवल भारत के ही नहीं अपितु विश्व के अन्य सभी भागों के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए आगे आवेंगे?

 

अनुक्रमणिका

भूमिका

अनुवादक के दो शब्द

प्रथम अध्याय

मनुष्य शरीर

1 23

विषय प्रवेश

1

कोशिका

1

अस्थियाँ

4

पेशी तन्त्र

5

परिसंचरण तन्त्र

7

श्वसन तन्त्र

11

पाचन तन्त्र

13

मूत्रण तन्त्र

18

तन्त्रिका तन्त्र

19

अन्त:स्स्त्रावी ग्रंथियाँ

21

उपसंहार

23

द्वितीय अध्याय

आसनों के लिये पूर्व सिद्धता

24 31

तृतीय अध्याय

ध्यान धारणात्मक आसन

32 39

नासाग्र दृष्टि

32

भ्रूमध्य दृष्टि

32

उड़ियान बन्ध

33

जालन्धर बन्ध

34

मूल बन्ध

34

पद्मासन

35

सिद्धासन

36

स्वस्तिकासन

37

समासन

39

चतुर्थ अध्याय

शरीर संवर्धनात्मक आसन

40 71

शीर्षासन

40

सर्वांगासन

47

मत्स्यासन

49

हलासन

49

भुजंगासन

52

शलभासन

54

अर्ध शलभासन

55

धनुरासन

56

अर्धमत्स्येन्द्रासन

57

वक्रासन

59

सिंहासन

60

वज्रासन

62

सुप्त वज्रासन

63

पश्चिमतान

64

मयूरासन

67

शवासन

68

पंचम अध्याय

चार और अन्य अभ्यास

72 80

योगमुद्रा

72

जिह्वाबन्ध

74

विपरीत करणी

75

नौलि

77

षष्ठम अध्याय

योगासनों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण

89 95

परिशिष्ट

1 यौगिक शरीरसंवर्धन का संपूर्ण अभ्यासक्रम

96 102

2 यौगिक शरीरसंवर्धन का संक्षिप्त अभ्यासक्रम

103 104

3 यौगिक शरीरसंवर्धन का सरल अभ्यासक्रम

105

शब्दावलि

106

 

 

 

योगासन: (Yogasan)

Item Code:
HAA132
Cover:
Paperback
Edition:
1992
ISBN:
818948530x
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
176
Other Details:
Weight of the Book:
Price:
$10.00
Discounted:
$8.00   Shipping Free
You Save:
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योगासन: (Yogasan)

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भूमिका

 

मूकं करोति वाचालं पङंगु लङघयते गिरिम् ।

यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ।।

(जिसकी कृपा से गूंगा भी बोलने लगता है, और लंगड़ा भी पर्वत पारकर जाता है, उस परम आनन्द श्रीमाधव को शतशः प्रणाम।)

आसन' की पुस्तिका का यह हिन्दी रूप जनता के हाथों में प्रस्तुत करते हुए हमे अत्यन्त प्रसन्नता हो रही है । शारीरिक या आध्यात्मिक मूल्य के प्राय: प्रत्येक योगासन की विधि का इसमें विस्तृत वर्णन है । वर्णन को अधिक सुबोध और स्पष्ट करने की दृष्टि से प्रत्येक आसन को अच्छी प्रकार चित्रित किया गया है । इस प्रकार कैवल्यधाम द्वारा बनाये गये 'संक्षिप्त' ' पूर्ण' और 'सरल' अभ्यासक्रमों का अनुसरण करने वाले सभी योगाभ्यासियों के लिये यह पुस्तिका एक विश्वसनीय और सुयोग्य मार्गदर्शक हो गयी है । 'संक्षिप्त' ' पूर्ण', और 'सरल' अभ्यासक्रमों से सम्बन्धित, पूरे ही शरीरसंवर्धनात्मक पक्ष को समाविष्ट करने की दृष्टि से शास्त्रीय अर्थ में आसन न होते हुए भी, विपरीतकरणी, योगमुद्रा, उड्डियान और नौंलि की इस पुस्तिका में चर्चा की गयी है । यदि कोई पाठक इस पुस्तिका के साथ ही हमारी 'प्राणायाम' नामक पुस्तिका का भी अध्ययन करे, तो एक शरीरसंवर्धनेच्छु योगाभ्यासी के लिए जो कुछ भी जानने योग्य बाते हैं, उनका प्राय: पूरा ही लान उसे हो जायेगा।

हमने आत्मबलसवर्धनवादी के अधिकारों को भी ध्यान में रखा है । योगासनों की पूर्वसिद्धता' और ' ध्यानधारणात्मक आसन' इस पुस्तिका के ये दो अध्याय और 'सुलभयोग' की दूसरी पुस्तिका में दी गयी प्राणायाम के अध्यात्मिक पक्ष की चर्चा, ये तीनों मिलकर आध्यात्मिक विद्यार्थी को अपने कार्य का श्रीगणेश भली प्रकार कराने में पर्याप्त हैं ।

प्रत्येक अभ्यास के अन्त में, उसके शारीरिक तथा चिकित्सात्मक लाभ बहुत संक्षेप में दिये गये हैं । आसनों के महत्व को पाठकों के मनपर अंकित करने की दृष्टि से हमने यह किया है । फिर भी हम 'सुलभयेग' के पाठकों को सावधान करना चाहते हैं कि इस प्रकार प्राप्त ज्ञान का उपयोग यैगिक चिकित्सा करने की दृष्टि से कदापि न करे, क्योंकि ' अधूरा ज्ञान सदा ही भयंकर होता है', और यह साधारण तत्व यौगिक चिकित्सा में भी निरपवाद लागू है । साथ ही, पुस्तिका में स्थान स्थान पर दी गयी सावधानियों पर भी हम पाठकों का विशेष ध्यान आकर्षित करना चाहते है ।

यह पुस्तिका योगासनों की एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका के रूप में है । अत: इसमें समाविष्ट विविध अभ्यासों की विस्तृत सैद्धान्तिक चर्चा इसमें नहीं है । इसका अर्थ यह न लिया जाय कि पाठकों को आसनों का शरीररचना और शरीरक्रियाविषयक ज्ञान न होगा । प्रथम तथा अन्तिम अध्यायों द्वारा पाठकों को वैज्ञानिक पद्धति से आसनों के सभी कार्यात्मक (Functional) लाभों की बहुत कुछ स्पष्ट कल्पना निश्चितरूप से हो जावेगी । परन्तु फिर भी, विषय का प्रतिपादन मुख्यरूप से क्रियात्मक दृष्टि से है, सैद्धान्तिक दृष्टि से नहीं । आसनों के शरीरसंवर्धनात्मक और चिकित्सात्मक पक्ष का सैद्धान्तिक प्रतिपादन अधिक विस्तृतरूप में दूसरी पुस्तिका में किया जावेगा । एक सामान्य योगाभ्यासी से योगाभ्यासों का जो कुछ भी क्रियात्मक तथा सैद्धान्तिक ज्ञान अपेक्षित है, वह इन दो पुस्तिकाओं द्वारा प्राप्त हो सकेगा।

जिन्हें योगाभ्यासों का पूर्ण सैद्धान्तिक तथा क्रियात्मक ज्ञान प्राप्त करने की अभिलाषा है, उन्हें तो 'योग मीमांसा' का ही अध्ययन करना चाहिये, जिसमें आसनों के चिकित्सात्मक और शरीरक्रियात्मक मूल्यों की पूर्णतया प्रयोगशालीय मौलिक प्रयोगों पर आधारित विद्यत चर्चा से पृष्ठ के पृष्ठ भरे पड़े हैं । 'सुलभयोग के दो खण्ड तो योग में केवल क्रियात्मक रुचि रखनेवालों के ही अभिप्राय से हैं ।

इस पुस्तिका के प्रकाशन के पूर्व भी हमने 'योगासन चित्रपट' और उसी के साथ प्रत्येक आसन की विधि संक्षेप में स्पष्ट करनेवाली पत्रिका का प्रकाशन किया है । इस सम्बन्ध में भी हम पाठकों को यह ध्यान दिलाना चाहते हैं कि जिस प्रकार यह पुस्तिका, 'योगमीमांसा' का स्थान नहीं ले सकती, उसी प्रकार उपर्युक्त चित्रपट भी इस पुस्तिका का स्थान नहीं ले सकता । चित्रपट के साथ दी गयी विधि, योगाभ्यासी का मार्गदर्शन करने में निस्संदेह में पर्याप्त और शुद्ध है । परन्तु यह निरूपण इतना संक्षिप्त और शरीरक्रिया या चिकित्सा के विचार से भी इतना अभावपूर्ण है कि इस पुस्तिका में प्रस्तुत लान की तुलना में वह कुछ भी नहीं है।

योग मीमांसा, आसन चित्रपट या इस पुस्तिका में प्रस्तुत योगाभ्यासों की विधि का निरूपण प्राचीन संगत यौगिक पाठ्य ग्रंथों या प्राचीन यौगिक परंपराओं से अत्यन्त साधारण परिवर्तन करके लिया गया है।वैयक्तिक योगाभ्यास करते समय इसी विधि पद्धति का श्रद्धापूर्वक अनुसरण किया जाना चाहिये । इन योगाभ्यासों के शरीरक्रियात्मक और चिकित्सात्मक लाभ इसी पद्धति के अनुसरण के परिणाम (फल) होते हैं।

हमारे आश्रमें बन्धुओं को, उनके स्नेहपूर्ण सहकार्य के लिए, हम हार्दिक धन्यवाद देते है ।

हम लगभग चालीस वर्षों से संपादन कार्य में संलग्न हैं । हमारे अनेक दोष, कुछ साधारण तो कुछ गंभीर होते हुए भी जनता का हम पर सदा ही बड़ा दृढ़ अनुग्रह रहा । भविष्य में भी उसी प्रकार का अनुग्रह बना रहे, यही हमारी उत्कट अभिलाषा है । योग का मानवता के लिए एक पूर्ण सन्देश है । योग का मानवशरीर के लिए सन्देश है । उसका मानव मन और मानव आत्मा के लिये भी सन्देश है । तो क्या सुबुद्ध और सुयोग्य युवक इस सन्देश को, केवल भारत के ही नहीं अपितु विश्व के अन्य सभी भागों के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए आगे आवेंगे?

 

अनुक्रमणिका

भूमिका

अनुवादक के दो शब्द

प्रथम अध्याय

मनुष्य शरीर

1 23

विषय प्रवेश

1

कोशिका

1

अस्थियाँ

4

पेशी तन्त्र

5

परिसंचरण तन्त्र

7

श्वसन तन्त्र

11

पाचन तन्त्र

13

मूत्रण तन्त्र

18

तन्त्रिका तन्त्र

19

अन्त:स्स्त्रावी ग्रंथियाँ

21

उपसंहार

23

द्वितीय अध्याय

आसनों के लिये पूर्व सिद्धता

24 31

तृतीय अध्याय

ध्यान धारणात्मक आसन

32 39

नासाग्र दृष्टि

32

भ्रूमध्य दृष्टि

32

उड़ियान बन्ध

33

जालन्धर बन्ध

34

मूल बन्ध

34

पद्मासन

35

सिद्धासन

36

स्वस्तिकासन

37

समासन

39

चतुर्थ अध्याय

शरीर संवर्धनात्मक आसन

40 71

शीर्षासन

40

सर्वांगासन

47

मत्स्यासन

49

हलासन

49

भुजंगासन

52

शलभासन

54

अर्ध शलभासन

55

धनुरासन

56

अर्धमत्स्येन्द्रासन

57

वक्रासन

59

सिंहासन

60

वज्रासन

62

सुप्त वज्रासन

63

पश्चिमतान

64

मयूरासन

67

शवासन

68

पंचम अध्याय

चार और अन्य अभ्यास

72 80

योगमुद्रा

72

जिह्वाबन्ध

74

विपरीत करणी

75

नौलि

77

षष्ठम अध्याय

योगासनों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण

89 95

परिशिष्ट

1 यौगिक शरीरसंवर्धन का संपूर्ण अभ्यासक्रम

96 102

2 यौगिक शरीरसंवर्धन का संक्षिप्त अभ्यासक्रम

103 104

3 यौगिक शरीरसंवर्धन का सरल अभ्यासक्रम

105

शब्दावलि

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