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प्राचीन भारतीय सामाजिक एवं सांस्कतिक व्यवस्था- Ancient Indian Social and Cultural System

¥4554
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Specifications
Publisher: JANAKI PRAKASHAN, PATNA
Author Archana Sinha, Surendra Prasad Sinha
Language: Hindi Text
Pages: 287
Cover: Hardcover
8.50x5.50 inch
Weight 432 gm
Edition: 2007
ISBN: 8189880373
BA0349
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Book Description

 

 

भूमिका


कई वर्ष पहले बिहार के विश्वविद्यालयों ने समाजशास्त्र विभाग के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में प्राचीन भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्था जैसे विषय को सम्मिलित करने का प्रस्ताव पारित किया। यद्यपि यह विषय प्राचीन भारतीय इतिहास विभाग में पढ़ाया जाता है। फिर भी सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्था पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है, जितना तत्कालीन राजनैतिक घटनाओं पर प्रकाश डाला जाता है। वैदिक काल में भारतीय सांस्कृतिक एवं सामाजिक व्यवस्था का स्वरूप यत्र-तत्र अंग्रेजी में लिखी पुस्तकों में वर्णित है, परन्तु उनमें सामाजिक हालात तथा वास्तविकता पूरी तरह नहीं झलकते। अतः इस कमी को पूरा करना बड़ा मूल्यवान कार्य होगा ऐसा हमने समझा तथा हमें इस पुस्तक लेखन में राष्ट्रीय महत्ता भी नजर आयी। स्वतंत्रता प्राप्ति के तीन दशक बाद ही भारत में दलगत नीति उभरने लगी। राष्ट्रीय आदर्श को वोट की राजनीति ने पीछे ढकेल दिया। अब सम्प्रदायवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, अगड़ा-पिछड़ावाद, दलितवाद आदि विषैले तत्व बिखर आये हैं, जो देश की जनता को विखंडित कर रहे हैं। बाहुबलियों की और धनपतियों की बन आयी है। हमारी सांस्कृतिक एवं सामाजिक चेतना धूमिल पड़ गई है। भारतीय संस्कृति के मूल तत्व की जानकारी कहीं दीख नहीं पड़ती। राजनैतिक स्वार्थपरता अनैतिकता के सहारे पनप रही है, सर्वव्यापी बन रही है। गाँधी विचारधारा जो सत्य के अनुशीलन पर आधारित है, मिथ्यावादिता से पूरी तरह ढंक चुकी है, उसे खोजे तो कौन ?

 

गाँधी के विचार वैदिक मान्यताओं की आधुनिकतम कड़ी है, श्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। सत्य शास्वत है, जीवों से आन्तरिक स्नेह, श्रेष्ठ मानव धर्म है। देश, काल, परिस्थिति से उत्पन्न विभिन्नता मानवीय एकता को काट नहीं सकती। मानव अमृतपुत्र है, देवगण उसके मित्र हैं, पृथ्वी उसकी माता है, आकाश पिता है। मानव अविभाज्य है, चूँकि वह एक ही पिता की सन्तान है, प्रेम श्रेष्ठ धर्म है, जीव मात्र की एकता श्रेष्ठ ज्ञान है। वैदिक वाङ्गमय में निराशा की छाया तक नहीं मिलती। कबैव्य सदा त्याज्य है: कैवल्य हमारा चरम लक्ष्य है- समाजिक समानता सुख का मूलाधार है। ईश्वर का दूसरा नाम सत्य है, प्रेम है। ईश्वर प्रणिधान के रास्ते अनेक है, परन्तु यात्रा का लक्ष्य एक है तत्सत् उस जगदीश्वर को पा लेना : ब्रह्मधर्म तक पहुँच जाना ।

 

पुस्तक के प्रथम खण्ड में इन्हीं विचारों की स्थापना की गयी है। मनुष्य चार वर्षों में बाँटा गया है, कर्म के अनुसार जन्म के अनुसार नहीं। सभी वर्ण अन्योन्याश्रित हैं, शरीर के अवयवों की तरह। मस्तक भले ही शरीर के उर्ध्व स्थान में हो, वह हाथ और पाँव के बिना क्रियाविहीन बन जाता है। उसी तरह ब्राह्मण और शूद्र सामाजिक समानता के पर्याय है।

 

स्त्री और पुरुष के मौलिक अधिकार एक हैं, विधवा विवाह व्यक्तिगत अधिकार का प्रयोग है, इसी प्रकार विधुर का पुनर्विवाह भी।

 

चारों वेद, वेदाङ्ग, ब्राह्मण, उपनिषद, आरण्यक में जो विचार व्यक्त किये गये हैं, उनका मूर्त स्वरूप दोनों महाकाव्यों में जानने देखने को मिलता है। यदि रामायण पूर्णतया सामाजिक आदर्शों का काव्य है तो महाभारत उस समाज को प्रतिबिम्बित करता है जहाँ सामाजिक आदर्श तथा सामाजिक विकृतियों का संघर्ष है। महाभारत में उस सत्य का उद्घरन है जिसमें हम आज जी रहे हैं, अर्थात् अध्यात्म और सांसारिक स्वार्थ के मानसिक युद्ध के बीच ।

 

यही विचार लौकिक कहानियों द्वारा पुराणों में वर्णित हैं। पुराण समय की आवश्यकता थी। वैदिक भाषा दुरुह होने लगी थी; लोकभाषा में बदलाव आ रहा था। पुराण कथाओं के जरिये धार्मिक सत्य का प्रतिपादन कर उन्हें लोक चेतना में स्थापित करता रहा।

 

हमारी आर्य संस्कृति एवं सामाजिक संरचना का पूर्ण चित्र इन ग्रन्थों में उभरता है जो आज भी हमारी विरासत हैं। परन्तु कालचक्र थमता कब है? अर्जुन ने श्री कृष्ण को युद्ध के भीषण परिणाम से सावधान किया था- स्त्रियाँ दुष्ट हो वर्णशंकर जनने लगती हैं (गीता प्रथम अध्याय) लेकिन इतना ही नहीं एक राजनैतिक परिणाम होता है जो भयंकर है, अर्थात् देश की सीमा विदेशियों के लिये, शत्रुओं के लिये, खुल जाती है। महाभरत युद्ध के बाद ऐसा ही हुआ होने लगा। भारतीय इतिहास में एक घटना घटी। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में नेपाल की तराइ में, वैशाली प्रमंडल में दो महामानवों का अविर्भाव हुआ-गौतम सिद्धार्थ और वर्धमान महावीर का। दोनों ने उच्च स्वर में अहिंसा को परम धर्म घोषित किया। बुद्ध ने अपने अनुयायियों को तीन शरणास्थल बताया- धम्म, संघ और बुद्ध को। राष्ट्र की बात नहीं कही गयी-वैदिक ऋषियों ने कहा था- ब्रह्म दृघं, क्षत्रं दृघं ब्रह्म की चिन्ता करो और राष्ट्र की चिन्ता करो। इन्हें भुला दिया गया। तभी ई० पूर्व 327 ई में ग्रीस देश से चला सिकन्दर महान द्वारा भारत पर चढ़ाई हुई। पोरस ने वीरता दिखाई तो बौद्ध युवकों ने कमण्डल दिखाते हुए अपने को अलग बताया। घटना छोटी थी, परन्तु प्रभाव विस्तृत हुआ। साहित्य, कला, ज्योतिष, गणित सब में अदान-प्रदान हुआ, परन्तु सीमा का द्वार अन्य विदेशी वनचारियों के लिये खुल गया। चीन और पूर्वी ईरान के मैदानों से निकलकर, हूण, शक, शुंग, पार्थियन, सीथियन और कुषाण बारी-बरी से घुस पड़े। इन्होंने उत्तर पश्चिम भारत पर राज्य किया, साथ ही बौद्ध धर्म को राजधर्म बनाकर बौद्ध मत का खूब प्रचार किया।

 

इस अवधि में कई घटनाएँ ऐसी घटी जो भारतीय सांस्कृतिक एवं सामाजिक व्यवस्था पर गहरा छाप छोड़ गयी-वे हैं चाणक्य चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा मगंध के नंदवंश का नाश कर वृहत्तर भारत को एक सूत्र में बांधने की चेष्टा, राजनीतिशास्त्र अथवा कौटिल्यशास्त्र का उदय, अशोक महान द्वारा धम्म विजय द्वारा बौद्ध धर्म का सुदूर दशों में प्रचार, कनिष्क द्वारा इसकी विशेष प्रगति और अन्त में पुनः ब्राह्मण धर्म की स्थापना जिसे पुष्यमित्र ने पूरा किया।

 

कुषाण काल के अन्त के बाद गुप्तकाल का प्रारम्भ होता है। समुद्रगुप्त, स्कन्दगुप्त के राज्यकाल को भारत का स्वर्णिम युग कहा जाता है। गुप्त सम्राट आर्य धर्मी थे, ब्राह्मण धर्म के संगरक्षक हुए। बौद्ध कुछ समय के लिये दब गये किन्तु दोनों भारतीय धर्मों के बीच टकराहट होती रही, यह निर्विवाद सत्य है। दक्षिण भारत में सातवाहन राजाओं के साथ चालुक्य आदि राजाओं का अच्छा सम्बन्ध बना हुआ था।


साहित्य, संगीत, कला, पुराने ग्रन्थों का नूतन सम्पादन, संस्करण, राज्य विस्तार और बृहत्तर भरत की कामनाएँ, कृषि-वाणिज्य, लघु उद्योग का विकास विस्तार इस युग की प्रमुख उपलब्धियाँ हैं।


गुप्त राज्यकाल ईसा के जन्मोपरान्त 320 ई० में प्रारम्भ होता है। इसी राज्यकाल में सन् 476 A.D. में भारतीय ज्योतिष विभूति आर्यभट्ट का जन्म हुआ था। गुप्तकाल में चीनी यात्री फाहियान 405 A.D. से 414 A.D. तक भारत में भ्रमण करता रहा। दक्षिण भारत में काँची में पल्लवों का राज्य स्थापित हुआ था, चालुक्य, चोला, पाण्डेय आदि राजवंश से सबों का अच्छा सम्बन्ध बना हुआ था। दक्षिण भारत में आर्यधर्म और संस्कार पुष्पित-पल्लवित हो रहा था। गुप्तकाल 511 A.D. के लगभग समाप्त हो गया, उसी समय कन्नौज में मुखारी वंश का उदय हुआ सर्वोत्तम राजा हर्षवर्द्धन (606 AD. - 647 AD.) हुआ। इसके शासनकाल में चीनी यात्री ह्यूनसांग भारत में आया था जो राजा हर्ष से 643 AD. में मिला था। हर्ष बौध धर्म के मानने वाले थे, परन्तु इस सम्पूर्ण काल में ब्राह्मण धर्म और बौद्ध धर्म के बीच समन्वय हो चुका था। एक ही परिवार में कोई बौध तो कोई ब्राह्मण बनकर रहता था। गुप्तकाल 327 AD. से लेकर हर्ष के समय तक 677 AD तक की प्रमुख घटना चक्र इस प्रकार हैं जो इन चार सौ वर्षों के सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिदृश्य को परिलक्षित करते हैं-


(1) गुप्तवंशीय नरेशों तथा मुखारी वंश के नृपतियों का दक्षिण भारत के सम्राटों के साथ प्रगाढ़ सम्बन्ध हो चला था, जिसके फलस्वरूप आर्य संस्कृति दक्षिण में भी फल-फूल रही थी। सांस्कृतिक दृष्टि से विन्ध्य के दोनों पार वेदों की ध्वनि सुनाई पड़ती है।

 

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