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बाल कहानियों का गुलदस्ता: Baal Kahaniyon Ka Guldasta

$26
Includes any tariffs and taxes
Specifications
Publisher: LITTLE BIRD PUBLICATIONS, DELHI
Author Prakash Manu
Language: Hindi
Pages: 152
Cover: PAPERBACK
8.5x5.5 Inch
Weight 210 gm
Edition: 2026
ISBN: 9789363066748
HCK947
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Book Description
भूमिका

इन बाल कहानियों में है बच्चों की अलबेली दुनिया कहानियाँ बच्चों को आनंदित करती हैं। वे कहानियाँ पढ़ते हैं तो बिना पंखों के उड़ते हुए किसी और ही दुनिया में पहुँच जाते हैं, जहाँ बहुत कुछ नया-नया-सा है। वहाँ उत्फुल्ल करने वाली कल्पनाएँ हैं जो हमारी इस यथार्थ की दुनिया में ही संभावनाओं के नए-नए कपाट खोल देती हैं, और हम खुद को एक ऐसी जगह महसूस करते हैं जहाँ उम्मीदों के दीए जल रहे हैं और लगता है, वह सब भी संभव है, जिसे हम करना तो चाहते हैं, पर वास्तव की दुनिया में हमें जिसकी गुंजाइश नहीं लगती। मैं समझता हूँ, कहानी की सबसे बड़ी ताकत यह है कि जिन चीजों की गुंजाइश वास्तव की दुनिया में नहीं है, कहानियाँ अपनी किस्सागोई के जादू से उसकी भी तनिक गुंजाइश पैदा कर देती हैं। और हम सोचते हैं, जो आज संभव नहीं है, वह समय की धारा में बहते हुए, कभी तो संभव होगा। जरूर होगा। और कहानियाँ हमारी इस उम्मीद को बड़ा सहारा देती हैं। यों कहानियाँ हैं तो जीवन है, कहानियाँ हैं तो हमारे जीने में भी रस है, आनंद है, उत्फुल्लता है। इसीलिए कहानियाँ हजारों बरसों से मनुष्य की सहयात्री रही हैं और उनका आनंद कभी किसी युग में कम नहीं हुआ। यह लिखते हुए याद आ रहा है कि मेरा बचपन तो कहानियों की छाँह में ही गुजरा। बचपन में माँ, नानी और अड़ोस-पड़ोस के आत्मीय जनों से सुनी कहानियाँ मैं आज भी भूल नहीं पाया। बल्कि सच तो यह है कि वे मेरी सबसे अच्छी दोस्त और हमसफर भी हैं। मेरे सुख-दुःख की साथी। उन्हीं के साथ मैंने सबसे पहले बिना पंखों के उड़ना सीखा था और जाना था कि जिस दुनिया में मैं जीता हूँ उसमें कितने रंग-रूप, कितने नए-नए गवाक्ष और कितनी अचरज भरी विविधताएँ हैं। यकीनन मैं आज लेखक न होता, अगर बचपन में मैंने माँ और नानी से इतनी सुंदर कल्पनाओं और आश्चर्यों से भरी वे कहानियाँ न सुनी होतीं। का आकर्षण मेरे सामने था। मैंने कोशिश की कि मेरी हर कहानी उसी तरह अपनी जब मैंने कहानियाँ लिखनी शुरू की, तो जाहिर है, दादी-नानी की कहानियों किस्सागोई से पाठकों को बाँध ले. जैसे बचपन में माँ और नानी कहानियों का मुझ पर असर पड़ा था। लेकिन तब और अब का जीवन तो कितना बदल गया है। तो मैंने अपने तई यह रास्ता निकाला कि जो भी मैं कहानी लिखूँगा, वह आज के में ढालकर कहूँगा जिसे मैंने अपनी माँ और नानी से सीखा। केवल मेरी माँ और समय और आज की जीवन-स्थितियों की कहानी होगी, पर उसे में उसी किस्सागोई नानी ही नहीं. हमारे वक्त की हजारों-लाखों दादी-नानियाँ इस कला में उस्ताद थीं। लिहाजा खुद-ब-खुद मेरी कहानियों का रास्ता मेरे दौर के दसरे कहानीकारों से कुछ अलग होता चला गया। और मैं कहँगा अपनी ही राह चलकर मैंने कहानियों का यह रास्ता खोजा है, जिसमें कल्पना और फंतासी भी है, मेरे समय के अक्स और जीवन-यथार्थ भी। साथ ही, आज का बचपन और उसकी बहुतेरी मुश्किलें भी। कैसे वह मेरी कहानियों में एकरूप होता है, यह तो ठीक-ठीक मैं भी नहीं जानता। अलबत्ता मेरी बाल कहानियों की कोई पचहत्तर पुस्तकें हैं, और उन पर बीच-बीच में बाल पाठकों की इतनी मीठी, रसपूर्ण चिट्ठियाँ और फोन पर संवाद होता रहता है कि लगता है, मैं और लिखूँ। बहुत कुछ लिखूँ, और नन्हे-नन्हे पाठकों के साथ खुद भी अपना बचपन जीते हुए, एक बार फिर उसी तरह आनंदविभोर हो जाऊँ, जैसे नानी और माँ की कहानियाँ सुनते हुए आनंदित होता था। यह ठीक है कि आज स्थितियाँ बदल गई हैं। नए जमाने के साथ बहुत कुछ नया-नया-सा आ गया है। बहुत कुछ पुराना था, जो छूट रहा है। पर जो पुराना था, वह सब कुछ बेमानी था और जो नया है, वह-अच्छा-ही अच्छा है, ऐसा मैं नहीं मान पाता। पुराने समय में दादी-नानी की कहानियों की जो परंपरा थी, वह मुझे अनमोल लगती है। और पुराने वक्तों की दादी-नानियाँ सिर्फ कहानियाँ ही नहीं सुनाती थीं, वे बच्चों की सच्ची दोस्त बनकर उनका हर सुख-दुःख बाँटतीं और साथ ही कोई मीठी सलाह भी दे देती थीं। वे बातें रोशनी के टिमटिमाते दीयों की तरह आज भी हमारे साथ हैं। और दादी-नानी की कहानियाँ..! भले ही उनमें कल्पना कुछ अधिक हो, लेकिन एक ही दुनिया के भीतर कितनी दुनियाएँ हो सकती हैं, यह मैंने पहली बार माँ और नानी से कहानी सुनते हुए ही जाना था। तभी जाना कि एक राजा और एक हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले लकड़हारे की दुनिया एक नहीं है। राजा की दुनिया ताकत, वैभव और अभिमान की दुनिया है, तो लकड़हारे की दुनिया एक मेहनतकश आदमी की दिन-रात रोटी के लिए तरसती दुनिया है। सारे दिन हाड़-तोड़ काम करने के बाद भी भूख हर क्षण उसे अपने सामने बैठी नजर आती है। तो भी उसके भीतर का स्वाभिमान हार नहीं मानता, और किसी बड़े-से-बड़े सिहासन के आगे झुकना नहीं जानता। फिर कहानी की दुनिया में बहुत कुछ उलट-पलट भी होता है। यहाँ तक कि एक झोंपड़ी में रहने वाली बुढ़िया भी अगर अपनी पर आ जाए तो वह राजा को लताड़ सकती थी। याद पड़ता है कि बचपन में यह कहानी सुनते हुए मैंने कैसा रोमांच महसूस किया था। असल दुनिया में यह सब था या नहीं, कितना था, कितना नहीं मैं नहीं जानता। पर कहानी में था, यह बड़ी बात है। और फिर इसी कहानी में हम राजा को उस बुढ़िया माई के आगे हाथ जोड़े, विनम्रता से माफी माँगते हुए देखते हैं, "ठीक है, माई, तेरी झोंपड़ी को अब कोई हाथ भी नहीं लगाएगा। मेरा नया महल कहीं और बन जाएगा, और न भी बनेगा तो कोई बात नहीं। पर तेरी झोंपड़ी को कोई अपनी जगह से हिलाएगा नहीं...!" कितनी उम्मीद, कितनी ताकत कितना उजाला देती है यह कहानी! और सच पूछिए तो यही कहानी की उम्मीद, कहानी की ताकत और कहानी का उजाला भी है, जिससे हर कहानी एक नई संभावना की तरह हमारे सामने आती है। और यह कहानी की उम्मीद की दुनिया ही है जो हमें बताती है कि एक गरीब की दुनिया के भी कुछ माने हैं। वह गरीब है, कहीं असहाय भी, पर उस गरीब आदमी का भी एक सुख है जो राजा के पास नहीं है, और हो भी नहीं सकता।

लेखक परिचय

प्रकाश मनु सुप्रसिद्ध साहित्यकार, संपादक और बच्चों के प्रिय लेखक। मूल नाम: चंद्रप्रकाश विग। 12 मई, 1950 को शिकोहाबाद (उ.प्र.) में जनमे प्रकाश मनु के लीक से हटकर लिखे गए उपन्यासों 'यह जो दिल्ली है', 'कथा सर्कस', 'पापा के जाने के बाद की जबरदस्त चर्चा हुई। इसी तरह कहानी और कविताओं का अपना एक अलग रंग। अभी हाल में प्रकाशित आत्मकथा का पहला खंड, 'मैं मनु' तथा 'यादें घर-आँगन की', 'बड़े साहित्यकारों के साथ' (संस्मरण) पुस्तकें भी काफी सराही गई। 'यादों का कारवाँ में हिंदी के शीर्ष साहित्यकारों के संस्मरण। साहित्य अकादेमी के लिए देवेंद्र सत्यार्थी और विष्णु प्रभाकर पर मोनोग्राफ । सत्यार्थी जी की संपूर्ण जीवनी 'देवेंद्र सत्यार्थी : एक सफरनामा' प्रकाशन विभाग से प्रकाशित। बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं में डेढ़ सौ से अधिक पुस्तकें, जिन्हें बच्चे ही नहीं, बड़े भी खोज खोजकर पढ़ते और सराहते हैं। हिंदी में बाल साहित्य का पहला बृहत् इतिहास 'हिंदी बाल साहित्य का इतिहास' लिखा, जो स्वयं में मील के पत्थर सरीखा ऐतिहासिक कार्य है। इसके अलावा 'हिंदी बाल कविता का इतिहास', 'हिंदी बाल साहित्य के शिखर व्यक्तित्व', 'हिंदी बाल साहित्य के निर्माता', 'हिंदी बाल साहित्य : मेरे कुछ साक्षात्कार' और 'हिंदी बाल साहित्य संभावनाओं का आकाश' पुस्तकें भी। कई महत्त्वपूर्ण संपादित पुस्तकें और संचयन। कई पुस्तकों का पंजाबी, सिंधी, मराठी, गुजराती, कन्नड़ समेत अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद। पुरस्कार : बाल उपन्यास 'एक था ठुनठुनिया' पर साहित्य अकादेमी का पहला बाल साहित्य पुरस्कार। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के 'बाल साहित्य भारती पुरस्कार और हिंदी अकादमी के 'साहित्यकार सम्मान' से सम्मानित। कविता. संकलन 'छूटता हुआ घर' पर प्रथम गिरिजाकुमार माथुर स्मृति पुरस्कार।

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